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है कोई इनके भविष्य को संवारने वाला?

bhikari in indian railwayकेंद्र में सत्तासीन देश की विभिन्न सरकारें समय-समय पर आंकड़ों की बाज़ीगरी के द्वारा देशवासियों को यह बताने की कोशिश करती रहती हैं कि देश तरक्की कर रहा है। देश की आर्थिक स्थिति सुधर रही है। देश की जीडीपी में इज़ा$फा हो रहा है। प्रति व्यक्ति आय बढ़ रही है। और जब किसी सरकार के कुछ प्रतिनिधि अत्यधिक उत्साहित होते हैं तो वे ऐसी बकवास भी करने लग जाते हैं कि हमारा देश अमेरिका या जापान बन रहा है। दिल्ली न्यूयार्क के रास्ते पर तो गुडग़ांव वाशिंगटन बन रहा है इत्यादि।

ज़ाहिर है जिन नेताओं के अपने पेट इतने भरे हों कि वह फटने को आ रहे हों, जिनके आगे-पीछे ज़ेड श्रेणी की सुरक्षा व्यवस्था हो, जो दिन-रात अपने घर का खाना खाने के बजाए बड़ी से बड़ी पार्टियों में लंच और डिनर फरमाते हों,जो लोग आम लोगों की पहुंच से बाहर रहते हों, विभिन्न माध्यमों से जिनके पास हर समय धनवर्षा होती रहती हो,जो हर समय आला अधिकारियों अथवा अपने चाटुकारों से घिरे रहते हों,वे लोग आखिर क्या जानें कि इसी देश में लाखों लोगों का बचपन रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म से शुरु होकर जीवन के अत्यंत खतरनाक व दयनीय रास्तों से गुज़रता हुआ यहीं पर खत्म भी हो जाता है। यदि इन बच्चों को यह बताया जाए कि हमारा देश दुनिया के विकसित देशों की तरह विकास की राह पर तेज़ी से आगे बढ़ रहा है तो आखिर इस लफ्फाज़ी का उन बच्चों के सामने क्या महत्व है? वे तो यह भी नहीं समझ सकते कि विकसित राष्ट्र कहते किसे हैं। और तरक्की या विकास किस चिडिय़ा का नाम है? दिल्ली,मुंबई या गुडग़ांव आदि जैसे महानगरों के न्यूयार्क,वाशिंगटन या मनचैस्टर बनने से इन बच्चों को आखिर क्या लेना-देना?

गौरतलब है कि देश का शायद ही कोई ऐसा रेलवे स्टेशन हो जहां भिखारियों ने अपना डेरा न जमा रखा हो। ज़ाहिर है इन्हीं भिखारियों में महिलाएं भी शामिल हैं। यह महिलाएं समय-समय पर बच्चे भी पैदा करती हें। जो बच्चा स्टेशन के परिसर में पैदा हुआ हो उसका पालन-पोषण भी उसी स्टेशन परिसर में ही इन्हीं भिखारी मां-बाप द्वारा या केवल भिखारी मां द्वारा किया जाता है। यह बच्चे पहले तो अपनी मां की गोद में सवार होकर मां के साथ भीख मांगते फिरते हैं, उसके पश्चात जब वे अपने पैरों पर चलने लगते हैं उसी समय उसके माता-पिता बच्चों को यात्रियों के पास जाकर गिड़गिड़ा कर पैर पकड़ कर अथवा हाथ जोडक़र पैसे या खाने की सामग्री मांगने का हुनर सिखा देते हैं। ज़ाहिर है आंख खोलते ही इस प्रकार के वातावरण में इस बच्चे का परवरिश पाना उसकी अपनी जीवन शैली में शामिल होने लगता है।

और जैसे-जैसे यह बच्चा बड़ा होता जाता है वैसे-वैसे उसके अंदर नशा,चोरी,पॉकेटमारी,यात्रियों का सामान उठाकर भागने की कला,नशीली सामग्री का सेवन तथा व्यापार जैसे अनेक अवगुण पैदा होने लगते हैं। यहां यह बताने की ज़रूरत नहीं कि किसी भिखारी महिला द्वारा पैदा किया गया बच्चा केवल उसके पति का बच्चा है अथवा भिखारी संगत में रहने वाले किसी दूसरे भिखारी का। इस लिहाज़ से इन भिखारियों में आपसी रिश्ते व उन रिश्तों में प्रेम तथा सद्भाव जैसी कोई बात नहीं होती। जिस प्रकार कोई भिखारी किसी भिखारिन के साथ संपर्क में आकर बच्चा पैदा कर चलता बनता है उसी तरह वह भिखारिन भी स्टेशन परिसर में बच्चे को जन्म देने के बाद कुछ ही समय तक उस बच्चे का ध्यान रखती है और जैसे ही वह बच्चा चलना-फिरना शुरु कर देता वह उसे प्लेट$फार्म पर ही भगवान भरोसे छोडक़र उसकी तरफ से अपना मुंह मोड़ लेती है। गोया इन बदनसीब बच्चों को होश संभालते ही ठीक से इस बात का ज्ञान भी नहीं हो पाता कि आखिर उसके माता-पिता हैं कौन?

अब ज़रा मनोविज्ञान को सामने रखते हुए इस बात की कल्पना कीजिए कि अनेक साधन-संपन्न,शिक्षित व प्रतिष्ठित परिवारों के बच्चे किस प्रकार बिगड़ते तथा सही रास्ते से भटकते हुए दिखाई देते हैं। जबकि ऐसे परिवारों में बच्चों पर पूरी निगरानी रखने की कोशिश की जाती है। कल्पना कीजिए कि जिन बच्चों के सामने कोई मां-बाप ही दिखाई न दें,जिन्हें कोई समझाने,सिखाने-पढ़ाने तथा शिक्षित करने वाला ही न हो,होश में आते ही जिन बच्चों को आम लोगों की उपेक्षा तथा दुत्कार का सामना करना पड़ता हो,प्यार-मोहब्बत,स्नेह तथा अपनत्व जैसी बातें जिनके करीब से भी न गुज़री हों,स्वच्छ वातावरण में रहना,नहाना-धोना,ढंग के कपड़े पहनना जैसी बातें जिन्हें बताने व सिखाने वाला भी कोई न हो ऐसे बचपन का भविष्य आखिर हो ही क्या सकता है? जैसे ही भिखारियों के यह बच्चे बड़े होते हैं उसी समय इनके साथ दुष्कर्म होने लग जाता है। इन्हें नशा करने व नशीली सामग्री का व्यवसाय करने में धकेल दिया जाता है।

भीख मांगने के साथ-याथ यही बच्चे चोरी करने लग जाते हैं। रेलगाड़ी में बैठकर देश के किसी भी कोने में बिना टिकट आना-जाना यह अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं। और युवा होने पर भिखारियों के यही लडक़े व लड़कियंा आपस में संपर्क स्थापित कर माता व पिता बन जाते हैं। कई बार तो यह भी देखा गया है कि ऐसे लावारिस भिखारी बच्चों के झुंड के झुंड प्लेटफार्म पर ट्रेन के आने के समय इधर से उधर दौड़ते-भागते तथा खेल-खेल में एक-दूसरे का पीछा करते हुए रेल के डिब्बे में एक ओर से घुसते हैं तथा दूसरे दरवाज़े से निकल जाते हें। और इसी भागदौड़ के बीच इनके हाथ किसी यात्री का यदि कोई सामान लग गया तो उसे भी यह साथ ले जाते हैं।

पिछले कुछ वर्षों से यह देखने को मिल रहा है कि इसी प्रकार के लावारिस बच्चे अपने हाथों में पॉलिथिन की एक छोटी थैली लिए होते हैं। उस थैली के भीतर सफेद रंग की कोई पेंटनुमा वस्तु रखी होती है। यह बच्चे अपने मुंह पर वह पॉलीथिन लगाकर उसमें ज़ोर से फंूक मारते हैं,फिर अपनी सांस अंदर की ओर खींचते हैं।

दरअसल वे किसी नशीली चीज़ का इस्तेमाल इस ढंग से करते हैं। आज देश के लाखों बच्चे इस बुरी लत का शिकार हो चुके हैं। इसी तरह इस प्रकार के बच्चे अपने हाथों में कोई भी पुरानी जुराब अथवा कोई रुमाल या कोई अन्य मैला-कुचैला कपड़ा लिए रहते हें। इस कपड़े के ऊपर वे सोल्यूशन अथवा थिनर या कोई दूसरी नशीली सामग्री कपड़े पर डाल लेते हैं। उसके बाद जक तब उस सामग्री की बदबू उस कपड़े में रहती है तब तक वे उसे सूंघते रहते हैं। और इस प्रकार वे स्वयं को नशे की अवस्था में रखने की कोशिश करते हैं।

आगे चलकर जब यह नशीली सामग्रियां इन बच्चों के शरीर पर असर करना बंद कर देती हैं फिर यही बच्चे नशीले इंजेक्शन अपने हाथों से अपने ही हाथ की नसों में लगाने लग जाते हैं। प्रतिदिन के तथा हर समय के इस प्रकार के उनके क्रिया-कलाप उन्हें बचपन से जवानी की दहलीज़ में कदम नहीं रखने देते। और किसी भी समय वे नशे की हालत में कहीं भी गिर-पड़ कर अपनी जीवनलीला सामप्त कर देते हैं। निश्चित रूप से इन सब नकारात्मक तथा समाज को दूषित करने वाले वातावरण के लिए यह बच्चे तथा इनके अभिभावक ही प्रथम दृष्टया जि़म्मेदार हैं।

 रेल विभाग,रेल सुरक्षा कर्मी तथा ऐसे हालात की अनदेखी करने वाली सरकार भी इन हालात के लिए कम जि़म्मेदार नहीं हें। इस प्रकार का पाप तथा अपराध तभी पूरी स्वतंत्रता के साथ पनपता है जब इन्हें रेल स्टेशन के प्लेटफार्म तथा स्टेशन के ओवर ब्रिज या रेल परिसर में किसी भी जगह पूरी स्वतंत्रता के साथ रहने की अनुमति दी जाती है। इनके अपराधों व कुकृतयों की अनदेखी की जाती है। इतना ही नहीं बल्कि यदि हम इन परिस्थितियों का पोस्टमार्टम करें तो हम यह भी पाएंगे कि इन अपराधों व इनमें संलिप्त अपराधियों को संरक्षण तथा बढ़ावा भी दिया जाता है।

मिसाल के तौर पर यदि कोई साधारण व्यक्ति दो-चार या 6 घंटे किसी प्लेटफार्म पर किसी भी कारणवश बैठे हों तो प्लेटफार्म पर गश्त लगाने वाली जीआरपी उसे टोक सकती है तथा उसके सामान की तलाशी ले सकती है। परंतु स्टेशन पर अपना पूरा जीवन बिताने वाले निठल्ले अपराधियों से कोई कुछ भी नहीं पूछने वाला? गोया सारे कायदे-कानून केवल साधारण व आम नागरिकों तक ही सीमित हैं? यदि हम देश को वास्तव में आगे ले जाना चाहते हैं तो इस प्रकार के लावारिस बच्चों तथा भिखारियों की संतानों की अनदेखी करना $कतई मुनासिब नहीं हें। जब देश के सभी बच्चों व युवाओं का भविष्य सुधरेगा तभी देश का भविष्य भी सुधरेगा। लिहाज़ा ज़रूरत है संपन्न लोगों के बच्चों के साथ-साथ इन लावारिस व भिखारी बच्चों के भविष्य को भी संवारने की।

:- निर्मल रानी

nirmalaनिर्मल रानी
1618, महावीर नगर
अम्बाला शहर,हरियाणा।
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