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दादाजी धूनी वाले: गुरु -शिष्य परम्परा की अनोखी मिसाल

dadaji-dhuniwale-khandwaखंडवा [ TNN ] मध्यप्रदेश के खंडवा में संत  दादाजी धूनी वाले की समाधि है ,खंडवा अवधूत संत केशवानन्द की तपोभूमि कहलाता है । हमेशा अपने सामने “आग” की धुनी रमाये रखने वाले संत की समाधि खंडवा में है । जिन्हें भक्त   दादाजी धूनी वाले के नाम से जानते है। हर साल गुरुपूर्णिमा पर देश भर के लाखो भक्त सैकड़ो किलोमीटर की पैदल यात्रा करके इनके दरबार में माथा टेकने आते है । खंडवा में गुरुपूर्णिमा पर्व के दौरान आने वाले भक्तों को चाय ,नाश्ता , विभिन्न प्रकार के पकवान के अलावा आने -जाने के लिए टेक्सी और दवाइयां “मुफ्त” में मिलती है ।

पटेल सेवा ट्रस्ट के कोमलभाउ आखरे बताते है की दादा जी के चमत्कारों की अनुभूति आज भी भक्तों को होती रहती है । यही वजह है की भक्तजन नंगे पैर सैकड़ों किलोमीटर की दुरी तय करके खंडवा पहुंचे है , उनकी जुबान पर यही नाम रहता है , भज लो दादाजी का नाम , भज लो हरिहर जी का नाम अवधूत संत केशवानंद की कई लीलाए है , भक्तो को कई भी मत्कार दिखाए ।

गुरु -शिष्य परम्परा की अनोखी मिसाल सिर्फ खंडवा में देखने को मिलती है । खंडवा के दादा दरबार में बड़े दादाजी और छोटे दादाजी की समाधि है । बड़े दादाजी को भक्तजन शिव का अवतार, और छोटे दादाजी को विष्णु का अवतार मानकर पूजा जाता है। सेवा ट्रस्ट के मदन ठाकरे बताते है की ” बड़े दादाजी खंडवा में वर्ष 1930 में खंडवा आये और मात्र तीन दिन रहने के बाद खंडवा में समाधि ले ली।

उनके बाद छोटे दादाजी ने बारह वर्षों तक आश्रम का संचालन करने के बाद यही समाधि ले ली। उन्होंने जो चौबिस नियम बनाये उसमे गृहस्थ जीवन का सार समाया हुआ है , उन्होंने गुरु मर्यादा , गुरु भक्ति और गुरु की सेवा कैसे करना यह सिखाया। उन्होंने सुचिता ,पवित्रता और सत्यता की सीख दी । हवन पूजन और भोजन के बारे में भक्तों को नियम सिखाये।

मदन ठाकरे बताते है की अंग्रेज सरकार ने दादाजी को “गॉड” मानते हुए , उन्हें ताम्रपत्र देकर सम्मानित किया , दादाजी के द्वारा किये चमत्कार विज्ञान के लिए चुनौती साबित हुए , गुरुपूर्णिमा पर्व के दौरान नगरवासी , जात -पात और धर्म का भेद मिटाकर, बाहर से आने वाले भक्तों की सेवा करते है ।

गुरु पूर्णिमा पर खंडवा नगर में आने वाले मेहमानों का स्वागत , पूरा शहर मिलकर करता है ,शहर में प्रवेश करते ही श्रधालुओं की आवभगत शुरू हो जाती है, इस पर्व में लोगो का सेवा भाव और हिन्दू -मुस्लिम एकता का अनोखा रूप देखने को मिलता है । गुरुपूर्णिमा के दौरान खंडवा में दो सौ से अधिक भंडारे आयोजित किये जाते है । अगर आप की जेब में फूटी कौड़ी भी ना हो तो चिंता की कोई बात नहीं खंडवा में चल रहे गुरुपूर्णिमा के पर्व पर आप मनपसन्द खाना खा सकते है वह भी मुफ्त । सिर्फ खाना ही नहीं खंडवा में चाय ,नाश्ता , विभिन्न प्रकार के पकवान के साथ आने -जाने के लिए टेक्सी और स्वास्थ्य सेवाएं , दवाइयां भी मुफ्त मिलती है. मुफ्त की यह व्यवस्था सरकार नहीं बल्कि खंडवा के निवासी आपसी सहयोग से करते है , खंडवा के नागरिको के सेवाभाव को देखकर यह कहा जा सकता है की गुरुपूर्णिमा पर्व के दो दिनों तक खंडवा “दादाजी धाम” हो जाता है .

खंडवा के दादाजीधाम पर गुरूपूर्णिमा उत्सव में शामिल होने आ रहे भक्तों की आस्था देखते ही बनती है । जहां भक्तगण नंगे पैर हजारों किलोमीटर की यात्रा कर पहुंच रहे हैं । महाराष्ट्र के जलगांव जिले के भक्तगण पिछले साहठ वर्षों से खंडवा तक कुल 250 किलोमीटर की दुरी नंगे पैर पैदल चलकर तय करते है । भक्तों के कंधों पर होती है धर्म ” ध्वजा ” जिसे निशान के नाम से जाना जाता है । जिसे वे गुरुपूर्णिमा पर दादाजी के मंदिर के शिखर पर चढ़ाते है । कई भक्त अपने साथ रथ खींचकर खंडवा लाते है । जलगांव से अपने सौ साथियों के साथ सात दिनों की पैदल यात्रा करके खंडवा पहुंचे दादाजी भक्त रामकृष्ण पटेल बताते है की रास्ते में उनके पैरों के छाले हो जाते है कई प्रकार की मुसीबत सामने आती है लेकिन वे दादाजी नाम के सहारे आगे बढ़ते जाते है उन्हें इतना पैदल चलने की शक्ति दादाजी ही देते है। खंडवा आकर उन्हें जो ख़ुशी होती है वह बयान नहीं की जा सकती।

खंडवा में गुरुपूर्णिमा पर्व पर दादाजीधाम पहुंचने वाले भक्तों की संख्या , लाखों में होती है। इस महंगाई के जमाने में तीन लाख मेहमानों की मेजबानी करना आसान नहीं है . गुरुपूर्णिमा पर्व पर खंडवा वासियों द्वारा भक्तो की निस्वार्थ सेवा ” अतिथि देवो भव ” मानने वाली भारतीय संस्कृति का जीवंत उदाहरण है ।

Anant Maheshwari

 

 रिपोर्ट : -अनंत माहेश्वरी 

 खंडवा  [  मध्यप्रदेश ]

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