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राजभाषा की सार्थकता

भारत के आजाद होने के बाद देश में एक संवैधानिक भाषा की आवश्यकता थी। इस आवश्यकता को देखते हुए 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा द्वारा राजभाषा संबंधी संवैधानिक उपबंध पारित किए गए। इस उपलक्ष्य में प्रतिवर्ष 14 सितंबर को हम राजभाषा दिवस मनाते है। इसे हम हिंदी दिवस के नाम से भी जानते है।

hindi-diwas-हमारे देश में हिंदी को राजभाषा का दर्जा प्राप्त है। हिंदी ऐसी भाषा है जो हमारे देश में सर्वाधिक लोगों द्वारा बोली जाती है। आज वैश्विक मंच पर भी हिंदी की उपस्थिति बेहद सम्मानजनक स्थिति में पहुंच चुकी है। फिर भी हिंदी की वैश्विक व्यापकता के लिए हमें अभी मीलों का फासला तय करना है। 1977 में वैश्विक संस्कृति के सबसे बडे मंच संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में तत्कालीन विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपना उदबोधन पहली बार हिंदी में ही दिया था। हिंदी में भारतीय विदेश मंत्री के उदबोधन से जहां सारे विश्व में हिंदी के विशेष संचारत्व से विश्व बिरादरी परिचित हुआ वहीं प्रत्येक भारतीय के अंदर भाषाई आत्म गौरव का भी आभास हुआ। आज भी हम अटलजी के उस हिंदी उदबोधन को बेहद सम्मान के साथ याद करते है। 1988 में विदेश मंत्री के तौर पर ही नरसिम्हा राव ने भी संयुक्त राष्ट्र के जनरल असेम्बली को हिंदी मे ही संबोधित किया था। वह पल भी हमारे लिए अद्वितीय था।

भारत विविध संस्कृतियों, भाषाओं व बोलियों का देश है। इसी भाषाई विविधता के कारण हिंदी को अपने ही देश में कई जगहों पर प्रतिकार भी झेलना पडता है। यही कारण है कि आजादी के सढ़सठ साल बाद भी हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं प्राप्त हो सका हैं। आज भी राष्ट्रभाषा के सिंहासन पर अंग्रेजी ही विराजमान है। इसका मुख्य कारण सभी गैर हिंदी राज्यों में अंग्रेजी की वैश्विक व्यापकता व सारगर्भिता को माना जा सकता है। मुगलों के शासन काल से ही भारत गुलाम रहा है। शारीरिक गुलामी के साथ – साथ हमें भाषाई गुलामी भी स्वीकार करनी पडी थी । जिससे हमे आज तक आजादी नहीं मिल पायी है। अंग्रजों ने हम पर दो सौ वर्षों से अधिक शासन किया। अंग्रेजों ने हमें इस तरह अपना दास बनाया कि हम अपनी अभिव्यकि भी उनकी सोच के अनुसार करने को मजबूर हुए। मैकाले की शिक्षा नीति इसका सबसे बडा उदाहरण है। इसी कारण गैर हिंदी राज्यों में हिंदी की जगह अंग्रेजी मान्य हुई। गैर हिंदी राज्य केरल,तमिलनाडू, आंध्र प्रदेश , कर्नाटक, महाराष्ट्र, वहीं उत्तर में जम्मू कश्मीर , हिंमांचल प्रदेश तो, पूर्वात्तर के सभी राज्य व पश्चिम बंगाल, उड़ीसा के वासियों को हिंदी बोलने व समझने में काफी परेशानियों का सामना करना पडता हैं । मैकाले की भाषा नीति की वजह से ये सभी राज्य अंग्रेजी के चंगुल में इस तरह जकडे गए कि आजादी के 67 साल बाद भी इससे आजाद नहीं हो पा रहे है। जब भी हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की बात कही जाती है तो देश के कई हिस्सों से स्थानीय भाषा व बोली के नाम पर विरोध के स्वर सुनाई देने लगते है।

भारत एक ऐसा देश है जहां सर्वाधिक बोलियां व भाषाएं है। सभी राज्योें की अपनी अलग अलग भाषाएं व बोलियां है। ये सभी भाषाएं व बोलियां कहीं न कहीं संस्कृत व द्रविणियन की सहायक रही है। संस्कृत से जहां हिंदी,बांगला, गुजराती व मराठी उपजी है वहीं द्रविड़ियन से तमिल, तेलगु, कन्नड व मलयालम का विकास हुआ है। द्रविड़ प्रदेशों की आम जनता जहां हिंदी की आवश्यकता को समझ व अपना रही है वहीं कुछ लोग राजनैतिक लाभ के कारण हिंदी की व्यापकता में रोडे़ साबित हो रहे है। इस मानसिकता को छोड पश्चिम से हम सीख सकते है। वहां की स्थानीय भाषाओं के विकास के साथ- साथ अंग्रेजी को किस तरह स्वीकार किया जा रहा है। वैसे ही हम हिंदी के लिए कार्य व प्रयास कर सकते है।

हिंदी के संवैधानिक स्थिति की जब हम बात करते है तो संविधान का अनुच्छेद343 कहता है कि संघ की राजभाषा हिंदी व लिपी देवनागरी होगी। संविधान के लागू होने के 15 वर्षाें तक सरकारी काम काज के लिए अंग्रेजी भाषा का उपयोग किया जाएगा। परंतु अगर राष्ट्रपति चाहे तो उक्त अवधि के अंतरगत सरकारी कामकाज के लिए अंग्रेजी भाषा के साथ साथ हिंदी भाषा का प्रयोग अधिकृत कर सकेगा। मगर हमारे आपसी गतिरोध के कारण यह अब तक संभव नहीं हो सका है।

इन्हीं परेशानियों को देखते हुए सरकार ने राजभाषा विभाग की स्थापना जून 1975 में गृह मंत्रालय के अंतर्गत हिंदी के विकास के लिए की । तभी से यह विभाग सरकारी कार्यालयों में हिंदी के विकास के लिए कार्य कर रहा है।यह विभाग हिंदी की व्यापकता के लिए लगातार प्रयासरत है वह इसके विकास के लिए हिंदी पखवाडा, हिंदी प्रशिक्षण शिविर, हिंदी भाषाई पत्र पत्रिकाओं का प्रकाशन भी करता है। राजभाषा विभाग प्रत्येक तीन महीने में सभी विभागों से हिंदी के विकास सें संबंधित रिपोर्ट भी मंगवाता है। रिपोर्ट में जो कमियां राजभाषा विभाग को प्रतीत होती है वह उस पर काम भी करता है। तमिल तेलगु कन्नड मलयालम बांगला असमिया मणिपुरी मराठी उडिया नेपाली पंजाबी कश्मीरी गुजराती बोडो एवं अंग्रेजी माध्यमों के लिए हिंदी सीखने हेतु इंटरनेट सॉफटवेयर का निर्माण राजभाषा विभाग के द्वारा कराया गया है। जिससे उक्त भाषाओं के लोग निशुल्क हिंदी सीख सकें। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में गृहमंत्रालय के अंतरगत केंद्रीय हिंदी समिति का गठन सितंबर 1967 में किया गया। इसका गठन हिंदी के प्रचार तथा प्रसार के लिए किया गया। यहा राजभाषा नीति के संबंध में महत्वपूर्ण दिशा निर्देश निर्धारित करने वाली सर्वोच्च समिति है। समिति में प्रधानमंत्री के अलावा कुछ केंद्रीय मंत्री, राज्यों के मुख्यमंत्री, संसद सदस्य, हिंदी व अन्य भाषाओं के विशेषज्ञ शामिल होते है।

हिंदी के विकास के लिए सरकार द्वारा कई पुरस्कार योजनाएं भी चलायी जा रही है। इसमें मुख्य रूप से इंदिरा गांधी राजभाषा पुरस्कार योजना, राजीव गांधी ज्ञान विज्ञान मौलिक पुस्तक लेखन पुरस्कार योजना, गृह पत्रिका पुरस्कार योजना इत्यादि शामिल है। इंदिरागांधी राजभाषा पुरस्कार योजना के तहत प्रति वर्ष विभिन्न मंत्रालयों, विभागों, वित्तीय संस्थाओं,ट्रस्टों, सोसाइटियों इत्यादि को सरकार की राजभाषा नीति को बढावा देने के लिए शिल्डों व व्यक्तियों को हिंदी में मौलिक पुस्तक लेखन के लिए नकद पुरस्कार दिए जाते है। राजीव गांधी ज्ञान विज्ञान मौलिक पुस्तक लेखन पुरस्कार योजना का मूल उददेश्य तकनीकी व आधुनिक ज्ञान की विभिन्न विधाओं में मौलिक रूप से हिंदी भाषा में पुस्तक लेखन को बढावा देना है।

हिंदी के विकास के लिए सरकार लगातार प्रशिक्षण, कंप्यूटर शिक्षा, त्रैमासिक अनुवाद प्रशिक्षण कार्यक्रम चला रही है। भारत सरकार के कार्यालय पूरे भारत वर्ष में फैले हुए है। पहले अनुवाद प्रशिक्षण कार्यक्रम केवल दिल्ली में कराया जाता था मगर 1985 के बाद से यह प्रशिक्षण पूरे भारत वर्ष में कराया जा रहा है। सरकार द्वारा चलाए जा रहे पाठयक्रमों में प्रबोध,प्रवीण,प्राज्ञ इत्यादि प्रमुख पाठयक्रम है। प्रबोध प्रारंभिक पाठयक्रम है इसका स्तर प्राथमिक स्कूलों की हिंदी के बराबर है, प्रवीण बीच का पाठयक्रम है इसका स्तर मीडिल स्कूलों के हिंदी के बराबर का है। प्राज्ञ आखिरी पाठयक्रम है। इसका स्तर हाईस्कूल के हिंदी के बराबर का है। हिंदी टंकण का प्रशिक्षण छह माह का होता है इसको करने के बाद शिक्षणार्थी 25 शब्द प्रतिमिनट की गति टंकण में प्राप्त कर लेता है। हिंदी आशुलिपिक इसके अंतरगत 80 शब्द प्रति मिनट की गति यह एक वर्ष का पाठयक्रम है। इसके अलावे भी सरकार हिंदी के सर्वव्यापक विकास के लिए अन्य कई योजनाएं चला रही है।

जब हम आजादी की लडाई के समय को याद करते है तो हिंदी की व्यापकता का हमें भान होता है। उस वक्त हिंदी ही वह भाषाई माध्यम था जिसकी सहायता से हमारे क्रांतिकारी व नेता सारे देश को संदेश पहुंचाते थे । उस वक्त ना तो कोई राजनैतिक लोभ था और ना ही कोई भाषाई लडाई। उददेश्य बस एक ही था कि अंग्रेजों से भारत को कैसे आजाद कराया जाए।

वर्तमान में देखें तो सोशल मीडिया में हिंदी का प्रयोग व विकास सर्वाधिक देखा जा रहा है। अधिकांश लोग अपनी अभिव्यक्ति अब हिंदी में कर रहे है। हिंदी में स्क्रैप, कमेंट ,पोस्ट इत्यादि देखने , पढने वाले को एक अगल ही आत्मीय भाषाई आनंद की अनुभूति होती है। सोशल मीडिया में हिंदी के प्रयोग को बढावा देने में विभिन्न ट्रांसलिट्रेलेशन सॉफटवेयर का योगदान अविसमरणीय है। इसकी ही सहायता से लोग अब अपनी अभिव्यकित हिंदी में कर रहे है। हालांकि इसमें कुछ तकनीकी खामियां जरूर सामने आ रही है। कई जगहों पर लिपिय अशुद्धता से लोगों को दो चार होना पडता है। फिर भी यह हिंदी की अभिव्यक्ति में काफी सहायक है। पहले जहां सोशल मीडिया पर अंग्रेजी का एकछत्र राज था आज वह कहीं न कहीं भारत में धरासायी होता दिख रहा है। कंप्यूटर प्रयोग के दौरान संपूर्ण अंग्रेजीयत के बीच हिंदी की उपस्थिति इसके विकास की एक शास्वत आशा दिखाती है। सरकार इसके तकनीकी विकास पर विशेष तौर से कार्य कर रही है। सरकार अगर कंप्यूटर के उपयोग में हिंदी के संपूर्ण उपयोग पर सफलता पा लेती है तो मित्रों वैश्विक संचार में यह एक मील का पत्थर साबित होगा।

हिंदी जब तक राष्ट्रभाषा के रूप मेें स्थापित नहीं हो जाती तब तक भाषाई तौर पर भारत कभी अपने आप को आत्मनिर्भर नहीं मान सकता। अंग्रेजी भाषा इस देश के लिए बैशाखी से कम नहीं है। 565 रियासतों को जोड कर बना यह देश कब तक भाषाई आजादी की सार्वभौमिकता के लिए आपस में लडता रहेगा। यह लडाई भी ऐसी नहीं है जो अंतः करण से लडी जा रही हो। ये लडाई तो मात्र राजनैतिक आकांक्षा के लिए प्रतीत होती है। हिंदी की मूलभूत आवश्यकता द्रविडियन लोगों को भी साफ नजर आ रही है क्योंकि भारत में रोजगार के लिए हिंदी भी अब उतनी ही आवश्यक जान पडती है जितनी गैर हिंदी लोगों को अंग्रेजी। जिस अंग्रेजी के लिए हम लड़ रहे है वह ऐसी भाषा है जिसकी अपनी लिपि तक नहीं है वह रोमन लिपि से अपना काम चला रही है। आखिर ऐसी भाषा को हम अपने देश की राष्ट्रभाषा की गददी पर बैठाकर कब तक चुप रह सकते है।1400 वर्षाें पुरानी भाषा हिंदी आज अपने ही देश में उत्थान का बाट जोहती हुई हर वर्ष राजभाषा दिवस कब तक मनाती रहेगी?

:- कमल किशोर उपाध्याय

kamal kishor upadhyayलेखक परिचय :-
कमल किशोर उपाध्याय : माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय के विस्तार परिसर कर्मवीर विद्यापीठ में अतिथि व्यख्याता के तौर पर कार्यरत है । साथ ही पत्रकारिता से लम्बे समय से जुड़ कर विभिन्न सस्थानों में भी सेवा दे चुके है । और वर्तमान में असम विश्वविद्यालय से शोधार्थी है ।

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