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ये सच उड़ा रहे नीतीश के बेदाग और लोक-लाज की राजनीति के दावों की धज्जियां

छठी बार बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने से पहले और गठबंधन सरकार से इस्तीफा देने के बाद नीतीश कुमार ने सार्वजनिक तौर पर कहा था कि लोकतंत्र लोक-लाज से चलता है। यानी लोकतंत्र में राजनैतिक शूचिता और पारदर्शिता आवश्यक है।

इसके साथ ही यह भी कहा गया कि नीतीश कुमार का सुशासन बेदाग रहा है। लिहाजा, दागी लोगों का उसमें कोई स्थान नहीं होना चाहिए। उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव पर लगे करप्शन की दाग की वजह से ही उन्होंने गठबंधन तोड़ते हुए नई सरकार बनाई लेकिन अब उनके बेदाग और लोक-लाज की राजनीति के दावों पर सवाल उठने लगे हैं।

जानकारों का कहना है कि नीतीश कुमार ने सिर्फ राजनीतिक फायदे के लिए गठबंधन तोड़ा है क्योंकि उनकी नई सरकार में नया कुछ भी नहीं है, जिससे कहा जा सके कि उन्होंने राजनैतिक पारदर्शिता, शूचिता और सुशासन की बेदाग छवि गढ़ी है।

नीतीश की नई सरकार पर परिवारवाद को बढ़ावा देने, दागियों को मंत्री बनाने, अवसरवाद को हवा देने, जनादेश का अपमान करने और सोशल इंजीनियरिंग को ध्वस्त करने के आरोप लग रहे हैं, जबकि नीतीश हमेशा से इन सबों का विरोध करते रहे हैं।

परिवारवाद: नीतीश कुमार की सबसे ज्यादा आलोचना परिवारवाद को बढ़ावा देने के लिए हो रही है। उन्होंने लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) अध्यक्ष रामविलास पासवान के छोटे भाई पशुपति कुमार पारस को मंत्रिमंडल में जगह दी है जबकि पारस किसी भी सदन के सदस्य नहीं हैं। हालांकि, लोजपा कोटे से किसे मंत्री बनाना है या किसे नहीं, यह लोजपा का आंतरिक विषय है लेकिन मुख्यमंत्री का यह विशेषाधिकार भी है कि वो किसे अपनी टीम में रखना चाहते हैं और किसे नहीं। सीएम चाहते तो पारस के नाम को रिजेक्ट कर सकते थे लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया, जबकि रालोसपा कोटे से सुझाए गए नाम को उन्होंने रिजेक्ट कर दिया था।

दागी मंत्रिमंडल: नीतीश कुमार ने जिस सबसे बड़े आरोप के चलते गठबंधन सरकार तोड़ी और बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाई, वह है दागी होना। तेजस्वी यादव को आपराधिक मामलों में दागी बताकर नीतीश ने इस्तीफा दे दिया जबकि उनके नई मंत्रिमंडल में करीब दर्जन भर मंत्री ऐसे हैं जो किसी ना किसी मामले में दागी हैं। खुद सीएम नीतीश पर मर्डर के केस हैं और पटना हाईकोर्ट से उन्होंने उस पर स्टे ले रखा है। नीतीश के नए उप मुख्यमंत्री और लालू परिवार पर सबसे ज्यादा आरोप लगाने वाले सुशील कुमार मोदी भी बेदाग नहीं हैं। 2012 के एमएलसी चुनावों के दौरान सौंपे हलफनामे में मोदी ने खुद उल्लेख किया है कि उन पर भागलपुर के नौगछिया कोर्ट में आईपीसी की 500, 501, 502 (मानहानि), 504 (शांति भंग) और 120B (आपराधिक साजिश) के तहत केस दर्ज हैं।

अवसरवाद: नीतीश कुमार ने राजनैतिक अवसरवाद की नई परिभाषा बिहार में गढ़ी है। वो जिन दलों और जिन लोगों का पिछले तीन-चार वर्षों से विरोध कर रहे थे। वे सभी अचानक उन्हें अच्छे लगने लगे। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि नीतीश कुमार ने कुर्सी के खातिर राजनैतिक शूचिता और राजनैतिक सिद्धांत दोनों को तिलांजलि दे दी है। नीतीश पर साम्प्रदायिक दलों के साथ गठजोड़ के आरोप लग रहे हैं। अल्पसंख्यकों के मन में जो सम्मान नीतीश के लिए था वो अब पहले जैसा नहीं रहा। लोगों का कहना है कि 2013 में जिस नरेंद्र मोदी के नाम पर उन्होंने एनडीए से किनारा कर लिया था, अब वही मोदी उन्हें अचानक अच्छे लगने लगे हैं।

जनादेश का अपमान: तेजस्वी यादव लगातार आरोप लगा रहे हैं कि नीतीश कुमार ने बिहार के जनादेश का अपमान किया है। जानकारों का भी कहना है कि बिहार की जनता ने भाजपा के खिलाफ महागठबंधन को जनादेश दिया था लेकिन नीतीश ने उसका अपमान कर विपक्षी दलों के साथ हाथ मिला लिया, जिसे जनता ने नकार दिया था।

सोशल इंजीनियरिंग की रस्म अदायगी: नीतीश जिस सोशल इंजीनियरिंग का पहरुआ बने थे, अब उसकी सिर्फ रस्म अदायगी कर रहे हैं। उन्होंने नई सरकार में सिर्फ एक महिला और एक मुस्लिम को मंत्री बनाया है, जबकि पिछली सरकारों में ऐसा नहीं था। सामाजिक सद्भाव का ख्याल रखते हुए नीतीश कई मुस्लिम चेहरों को तरजीह देते रहे हैं लेकिन इस बार उन्होंने सिर्फ रस्मअदायगी की है। जातीय समीकरणों को साधने में भी नीतीश ने कई जातियों को प्रतिनिधित्व नहीं दिया है। किसी भी कायस्थ को मंत्री नहीं बनाया गया है। उनकी सरकार के स्वरूप में दलित-महादलित अभी भी बहुत पीछे हैं।

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