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इस धरती पर गदा मार कर भीम ने किया था कुंड का निर्माण

खंडवा . पंधाना रोड पर आबना और छोटी नदी के बीच हे प्राचीन भीम कुंड मंदिर शहर के चारों कुंडों के समान इसकी भी पौराणिक मान्यताएं है। यह मंदिर द्वापर युग का है , हिंदू ग्रंथो के अनुसार भीम ने यहां शिव जी की पूजा की थी और अपनी गदा मार कर जमीन से पानी निकाला था । इससे कुंड का निर्माण हुआ था, तभी से इस स्थान को भीम कुंड कहा जाता हैं।

मंदिर के महंत दुर्गा नंद गिरी ने बताया यह मंदिर द्वापर युग का हैं। पांडव अज्ञातवास के समय यहां आए थे। भीम को प्यास लगने पर भीम ने जमीन में गदा मारा जिससे पानी निकला था। उन्होंने जलपान किया और यहां रुक कर शिवलिंग स्थापित कर भगवान की पूजा अर्चना थी। पांडव कई समय तक यहां रहे थे। इसलिए इस मंदिर को भीम कुंड कहा जाता हैं।

शहर की चारों दिशाओं में बने कुंड पदम कुंड, सूरजकुंड ,रामेश्वर कुंड और भीम कुंड इन गुंडों का उल्लेख पौराणिक ग्रंथों में किया गया है। इनकी अपनी मान्यताएं है। यह स्थापित शिवलींग अति प्राचीन हैं। शिवरात्रि और नागपंचमी पर शहर की आम जनता हजारों की तादात में इन मंदिरों पर जाकर भगवान की पूजा अर्चना करती हैं। यहां भंडारे का आयोजन भी किया जाता हैं।

– चारों ओर से पानी से घिरे टापू पर बना है, भीमकुंड मंदिर
शिव जी का यह मंदिर पर्यटन स्थल की तरह चारों ओर से पानी से घिरा हुआ हैं। इसकी एक और अबना नदी व दूसरी ओर छोटी नदी बढ़ती हैं। इससे यह स्थान बहुत ही सुंदर वह हरियाली भरा दिखाई देता हैं। नदियों के होने से यहां यहां लोग छुट्टियों के दिन पिकनिक मनाने अपने परिवार के साथ आते हैं

– नदी के बीच से होकर पहुंचना होता है , मंदिर पर दिर के चारों ओर पानी होने के कारण श्रद्धालुओं को नदी से हो कर मंदिर पर जाना पड़ता हैं। जब नदी का जल स्तर कम होता है , तभी दर्शन के लिए भक्त मंदिर तक पहूंच पाते हैं।

– बारिश के मौसम में कई बार नदियों के उफान पर होने के कारण रास्ता हो जाता है, बंद बारिश के मौसम में नदी का जल स्तर बढ़ा होता है , तो मंदिर पर आने जाने का रास्ता बंद हो जाता हैं। क्योंकि मंदिर पर जाने का एकमात्र रास्ता हे जो नदी से होकर गुजरता हैं। जलस्तर बढ़ने से वह भी बंद हो जाता हैं।

मंदिर में सेवा करने वाले महंत और यहां रहने वाले पुजारी मंदिर में पूजन करते है। बिना किसी सुविधा के रहते है,ओर सेवा करते हैं।दान में मिली राशि से मंदिर स्थल का रख रखाव करते हैं।
रिपोर्ट -तुषार सेन

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