Home > Hindu > इस देवता से होती हैं किन्नरों की शादी, क्या है इसका राज !

इस देवता से होती हैं किन्नरों की शादी, क्या है इसका राज !

transgendersकिन्नरों की दुनिया एक अलग तरह की दुनिया है जिनके बारे में आम लोगों को जानकारी कम ही होती है।

लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि हमारी तरह वे किस देवता की पूजा करते हैं। वास्तव में अर्जुन और उलुपी के पुत्र ‘अरावन’ किन्‍नरों के देवता है। खास बात ये है कि किन्नर इस देवता की सिर्फ पूजा ही नहीं करते बल्कि उनके साथ विवाह भी रचाते हैं।

तमिलनाडु में अरावन देवता की पूजा की जाती है। कई जगह इरावन के नाम से भी जाना जाता है। अरावन देव को किन्नरों का देवता माना जाता है इसलिए दक्षि‍ण भारत में किन्‍नरों को अरावनी के नाम से पुकारा जाता है। अरावन देवता महाभारत के प्रमुख पात्रों में से एक थे और युद्ध के दौरान उनकी महत्‍वपूर्ण भूमिका थी।

यहां मौजूद इस मंदिर की सबसे अनोखी बात यह है कि यहां पर अरावन देवता का विवाह किन्नरों से किया जाता है। यह विवाह साल में एक बार किया जाता है और विवाह के अगले दिन ही अरावन देव की मृत्यु हो जाने के साथ ही वैवाहिक जीवन भी खत्म हो जाता है। इसका संबंध महाभारत काल की एक अनोखी घटना से है।

महाभारत की कथा के अनुसार एक बार अर्जुन को, द्रोपदी से शादी की एक शर्त के उल्लंघन के कारण इंद्रप्रस्थ से निष्कासित करके एक साल की तीर्थयात्रा पर भेजा जाता है। वहां से निकलने के बाद अर्जुन उत्तर पूर्व भारत में जाते है जहां की उनकी मुलाक़ात एक विधवा नाग राजकुमारी उलूपी से होती है।

दोनों को एक दूसरे से प्यार हो जाता है और दोनों विवाह कर लेते है। विवाह के कुछ समय पश्चात, उलूपी एक पुत्र को जन्म देती है जिसका नाम अरावन रखा जाता है। पुत्र जन्म के पश्चात अर्जुन, उन दोनों को वही छोड़कर अपनी आगे की यात्रा पर निकल जाता है। अरावन नागलोक में अपनी मां के साथ ही रहता है। युवा होने पर वो नागलोक छोड़कर अपने पिता के पास आता है। तब कुरुक्षेत्र में महाभारत का युद्ध चल रहा होता है इसलिए अर्जुन उसे युद्ध करने के लिए रणभूमि में भेज देता है।

महाभारत युद्ध में एक समय ऐसा आता है जब पांडवो को अपनी जीत के लिए मां काली के चरणों में स्वेचिछ्क नर बलि हेतु एक राजकुमार की जरुरत पड़ती है। जब कोई भी राजकुमार आगे नहीं आता है तो अरावन खुद को स्‍वेच्छिक नर बलि हेतु प्रस्तुत करता है लेकिन वो शर्त रखता है की वो अविवाहित नहीं मरेगा। इस शर्त के कारण बड़ा संकट उत्त्पन हो जाता है

क्योकि कोई भी राजा, यह जानते हुए की अगले दिन उसकी बेटी विधवा हो जायेगी, अरावन से अपनी बेटी की शादी के लिए तैयार नहीं होता है। जब कोई रास्ता नहीं बचता है तो भगवान श्रीकृष्ण स्वंय को मोहिनी रूप में बदलकर अरावन से शादी करते है। अगले दिन अरावन स्वंय अपने हाथों से अपना शीश मां काली के चरणों में अर्पित करता है।

अरावन की मृत्यु के पश्चात श्री कृष्ण उसी मोहिनी रूप में काफी देर तक उसकी मृत्यु का विलाप भी करते है। श्री कृष्ण पुरुष होते हुए स्त्री रूप में अरावन से शादी रचाते है इसलिए किन्नर, जो की स्त्री रूप में पुरुष माने जाते है, भी अरावन से एक रात की शादी रचाते है और उन्हें अपना आराध्य देव मानते है।

अरावन देवता का सबसे प्राचीन और मुख्य मंदिर विल्लुपुरम जिले के कूवगम गांव में है। कूवगम गांव में हर साल तमिल नव वर्ष की पहली पूर्णिमा को 18 दिनों तक चलने वाले उत्सव की शुरुआत होती है। इस उत्सव में देशभर से और विदेशों से भी किन्‍नर आते हैं।

पहले 16 दिन खूब नाच गाना होता है और हंसी खुशी शादी की तैयारी करते हैं। 17वें दिन पंडित द्वारा विशेष पूजा होती है, जिसके बाद अरावन देवता के सामने मंदिर के पंडित भगवान की ओर से किन्नरों के गले में मंगलसूत्र पहनाया जाता है। अरावन की मूर्ति से शादी रचाते है।

अंतिम दिन यानि 18वें दिन सारे कूवगम गांव में अरावन की प्रतिमा को घूमाया जाता है और फिर उसे तोड़ दिया जाता है। उसके बाद दुल्हन बने किन्नर अपना मंगलसूत्र तोड़ देते है साथ ही चेहरे पर किए सारे श्रृंगार को भी मिटा देते हैं। सफेद कपड़े पहन लेते हैं और खूब रोते हैं। उसके बाद अरावन उत्सव खत्म हो जाता है।



Facebook Comments

Our News Network and website neither have any collaboration and connection directly nor indirectly with “India Today Group/ITG” ,TV Today Network, Channel Tez TV media group .