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सुब्रमण्य रिपोर्ट पर्यावरण और आदिवासी हितों के खिलाफ

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भोपाल [ TNN ] टी एस आर सुब्रमण्यम कमेटी की रिपोर्ट प्र सरसरी नजर डालने स प्रथम दृष्टय यह स्पष्ट होता है कि, यह रिपोर्ट ना सिर्फ पर्यावरण हितों के खिलाफ है, बल्कि जंगल में रहने वाले आदिवासी और अन्य समुदायों के हितों के भी खिलाफ है. यह रिपोर्ट पर्यावरण मंजूरी को आसान बनाने के लिए लाई गई है. और यह ना सिर्फ आदिवासी से उनके ऐतिहासिक को छीनती है; अपने दैनिक जरूरतों से रोकेगी, बल्कि उनके अपने जंगल को बर्बाद करने की योजनाओं के मामले में उन्हें कुछ कहने का हक भी नहीं देती है. देश के जनसंगठन और वैकल्पिक राजनीति से जुडी पार्टियाँ इसका घोर विरोध करती है, और सरकार से मांग करती है की वो इस रिपोर्ट को नामंजूर करे.

समाजवादी जन परिषद, श्रमिक आदिवासी संगठन और किसान आदिवासी संगठन की और से जारी एक बयान में सजप के रष्ट्रीय सचिव अनुराग मोदी ने यह बात कही है. वहीं आदिवासी नेता मंगल सिंग और फागराम ने कहा की वो आदिवासी हितों पर कुठाराघात सहन नहीं करेंगे.
पहले जहां पर्यावरण मंजूरी मामलों को लग-अलग स्तर से गुजरने से जो एक विभाग दादागिरी, भ्रष्ट्राचार, गैर-समझ से निपटने में कुछ हद तक मदद मिलती थी, वही इस रिपोर्ट में इसमें पर्यावरण मंजूरी की प्रक्रिया को अत्यंत ही सरल बना एक ही स्तर पर सारी मंजूरी देने की की बात है. इसके लिए र राज्य के स्तर पर ‘राज्य पर्यावरण प्रबंधन प्राधिकरण’ और इसी तरह केंद्र के स्तर पर राष्ट्रीय प्राधिकरण बनाया जाएगा; जिसका फैसला अंतिम होगा. कोई भी कोर्ट का कोई भी निर्णय आदेश, या डिक्री इस प्राधिकरण के आधिकारों में आड़े नहीं आएगी. इस प्राधिकरण के 2/3 से ज्यादा सदस्य और अध्यक्ष नौकरशाह होंगा .

वहीं इस रिपोर्ट में लीनियर प्रोजेक्ट; जैसे, पाइप लाईन, महामार्ग के मामले में वन अधिकार कानून के तहत ग्रामसभा की मंजूरी की जरुरत नहीं होनी चाहिए. इतना ही नहीं, लीनियर प्रोजेक्ट माइनिंग, पावर और डिफेन्स से जुड़े प्रोजेक्ट को विशेष प्राथमिकता देने की बात कही गई है.
इतना ही नहीं इस रिपोर्ट में कहा गया है की जो भी अधिसूचित पांच या उससे अधिक पेड़ कटता है, उस पर एक करोड़ रुपए का जुर्माना या उसकी एक साल की कमाई, जो कम हो उस तक जुर्माना किया जाए. और, अर्नेश कुमार विरुद्ध बिहार सरकार के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 7 साल से की सजा के मामलों में जो विस्तृत दिशा निर्देश जारी किए गए थे, उसकी भी इसमें अनदेखी की गई है. इस रिपोर्ट में, दंड प्रक्रिया सहिंता में बदलाव कर इस मामले में जमानत जब तक ना दी जाने की बात कही गई है, जब-तक राज्य पर्यावरण प्राधिकरण के जमानत के विरोध को सुन ना लिया जाए. इस बदलाव से, अपना दैनिक निस्तार करने पर भी आदिवासी आए दिन जेल में होंगे और पर सजा होने पर अपनी एक साल की कमाई जुर्माने के रूप में चुकाने को मजबूर होंगे.

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