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SC के फैसले का मतलब यह नहीं कि कुछ भी लिख दें

Facebook  नई दिल्ली – सुप्रीम कोर्ट ने आईटी ऐक्ट की धारा 66ए की संवैधानिक वैधता पर बड़ा फैसला देते हुए इसे रद्द कर दिया। इस के बाद सोशल मीडिया पर यह चर्चा आम हो गई के अब कुछ भी लिखा जाएं कानून की गिरफ्त में नहीं आयंगे पर ऐसा नहीं है कानून के जानकारों का कहना है कि यह फैसला सायबर ऐक्ट को लेकर दिया गया है लेकिन इस में अब भी प्रावधान है के कोई व्यक्ति सद्भाव बिगाड़ने ,धार्मिक भावनाओं को भड़काने ,या देश विरोधी बाते प्रसारित करता है तो उसे IPC या CrPC की धाराओं के तहत सजा का प्रावधान है।

यह कानून लागू है अभी
एक्ट ऑफ डिफेमेशन, IPC 499, सद्भाव बिगाड़ने पर लगने वाली धारा 153 A, धार्मिक भावनाओं को आहत करने पर लगने वाली धारा 295A, और CrPC 95A, ये सब अपनी जगह मौजूद हैं। कंटेप्ट ऑफ कोर्ट और पार्लियामेंटरी प्रिवेलेज के प्रावधान खत्म नहीं हो गए हैं। कानून के जानकारों का कहना है कि भारतीय संविधान का 19 (1) ख भी है, जिसके तहत विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर 6 तरह की पाबंदियां लगाई गई हैं।

लिखिए, लेकिन जोखिम को समझते हुए.
कानून की जानकारी न होना ही कोई डिफेंस नहीं है। विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अनलिमिटेड नहीं है. कानून और संविधान के दायरे में है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले अपने अंदाज से न देखे बल्कि कुछ भी लिखने से पहले कानून की समझ रखने वालो से चर्चा जरूर करलें।

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