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पूर्व मुख्यमंत्रियों को खाली करने होंगे सरकारी बंगले : सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्रियों को ताउम्र सरकारी बंगला दिए जाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश देते हुए कहा कि पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी बंगले खाली करने होंगे। सुप्रीम कोर्ट ने यूपी कानून को रद्द कर दिया और कहा कि यह संविधान के खिलाफ है। यह कानून समानता के मौलिक अधिकार के खिलाफ है और मनमाना है।

सुप्रीम कोर्ट ने संविधान की प्रस्तावना का हवाला देते हुए कहा कि इस कानून ने नागरिकों के बीच स्पेशल क्लास बना दी। एक बार जब पब्लिक सर्वेंट दफ्तर छोड़ देते हैं तो वो साधारण नागरिक बन जाते हैं। गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्रियों को ताउम्र सरकारी बंगला दिए जाने के प्रावधान पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया है।

इससे पहले अमीकस क्यूरी गोपाल सुब्रमण्यम ने कहा था कि पूर्व प्रधानमंत्रियों व मुख्यमंत्रियों को आजीवन सरकारी बंगला नहीं दिया जाना चाहिए क्योंकि ये जनता के पैसे का दुरुपयोग है। अदालत ने इसे जनहित का मामला बताते हुए वरिष्ठ वकील गोपाल सुब्रमण्यम को अमीकस क्यूरी (न्यायालय मित्र) नियुक्त किया था।

दरअसल लोक प्रहरी नामक संगठन द्वारा इस मसले को लेकर दायर याचिका पर पहले ही उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया जा चुका था। बेंच ने कहा कि इसका असर विभिन्न राज्यों पर ही नहीं बल्कि केंद्रीय कानून पर भी पड़ेगा। इसे देखते हुए पीठ ने वरिष्ठ वकील गोपाल सुब्रमण्यम को अमीकस क्यूरी नियुक्त करते हुए अदालत की मदद करने के लिए कहा था।

मालूम हो कि यूपी में पूर्व मुख्यमंत्रियों को ताउम्र सरकारी बंगला दिए जाने के प्रावधान को अगस्त, 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त कर दिया था और दो महीने के भीतर तमाम पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी आवास खाली करने का आदेश दिया था। उत्तर प्रदेश सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री आवास आवंटन नियम, 1997 को कानून गलत बताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने साथ ही इन सभी से किराया भी वसूलने के आदेश दिया था।

लेकिन बाद में यूपी सरकार ने इसके लिए कानून बना दिया, जिसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। इस फैसले केबाद राज्य सरकार ने प्रावधान में संशोधन और नया कानून लाकर पूर्व मुख्यमंत्रियों के लिए ताउम्र सरकारी निवास देने का निर्णय लिया। याचिका में कहा कि राज्य सरकार ने कानून लाकर शीर्ष अदालत को फैसले को विफल करने की कोशिश की है। याचिका में संशोधन प्रावधान और नए कानून को चुनौती दी गई है।

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