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आदिवासी महिला ने रचा इतिहास, मोदी भी कहेंगे “वाह”

खंडवा : देश में स्टार्ट अप को लेकर सरकार युवाओं को कौशल करने के लिए प्रोग्राम चला रही हैं वही खंडवा के आदिवासी ब्लॉक खालवा के सुदूर अंचल में 26 आदिवासी महिलाओं ने ग्रामीणों और परिवार के विरोध के बावजूद न सिर्फ अपना स्टार्ट अप शुरू की बल्कि गांव के खेतों को सिंचित कर गर्मी में मवेशियों और ग्रामीणों को अपनी आवश्यकता पूरी करने के लिए भरपूर पानी की भी व्यवस्था कर दी साथ ही गांव से ग्रामीणों के पलायन को भी रोक दिया ।

खालवा के चबूतरा गांव की रहने वाली बुधिया बाई ने ठाना की वह अपने गांव की तस्वीर बदल कर रहेंगी। क्यों की इनके गांव में पानी की कमी से इंसान ही नहीं मवेशी भी परेशान थे। पानी की कमी के चलते कई मवेशी अपनी जाने गंवा चुके थे जिसके चलते गांव के लोग पलायन करने को मजबूर हो गए थे। फिर क्या था बुधि बाई ने अपनी साथी महिलाओं को साथ लेकर गांव के अंतिम छोर पर बने तालाब को गहरा कर उसमें पानी संग्रहण का बीड़ा उठा लिया। शुरू में परिवार और गांव के पुरुषों ने ही उनके इस काम का विरोध किया। बुधिया बाई अपनपढ हैं उसे समझ नहीं आ रहा था की क्या करें ऐसे में उसे स्पंदन समाज सेवा समिति एनजीओ का पता मिला। एनजीओ ने उन्हें काम के बदले अनाज देने की बात कही गांव की महिलाए बात मान गई और लगभग दो एकड़ के क्षेत्र में फैले तालाब को गहरा करने में जुट गई। पांच सप्ताह में गांव की 26 महिलाओं ने तालाब को गहरा कर उसमें लगभग 13 फिट पानी जमा कर लिया। पानी जमा होने के बाद भी बुधि बाई रुकी नहीं उन्होंने एक समिति बना कर तालाब में मछली के बीज डाले और अब मछली बेच कर अपने साथ साथ गांव की अन्य महिलाओं को भी स्वरोजगार उपलब्ध करा। तालाब से रोज आधा से एक किवंटल मछली निकल आसपास के ग्रामीणों को बेच रही हैं।

पुरे गांव ने किया विरोध,फटे कपड़ों पर कसा तंज

बुधिया बाई ने तेज़ न्यूज़ नेटवर्क से बात करते हुए बताया कि जब उन्होंने इस काम को लेकर गांव में चर्चा की तो पूरा गांव मेरे (बुधिया बाई ) खिलाफ हो गया। मेने हिम्मत नहीं हारी और गांव की लगभग 35 महिलाओं को तालाब को गहरा करने के लिए तैयर किया। गांव वालों ने मेरे फटे कपड़ों पर तंज कसते हुए कहा कि ” ये फटे पहन कर तुम शहर जाओ ही तो कोई भी अधिकारी तुम्हारी सहायता नहीं करेंगे उल्टा तुम्हें दरवाजे से ही भगा देंगे”। आखिर में छब्बीस महिलाओं ने तालाब को गहरा करने में मदद करी। जिसके बाद आज यह तालाब इतना गहरा होकर हम उसमें इतना पानी इन दिनों भी इकठ्ठा कर पाए हैं। पहले इस तालाब में पानी बारिश के समय ही खत्म हो जाता था। आज भी गांव का एक मोहल्ला हमारे इस काम से खुश नहीं है यहाँ तक की वह अब भी हमें बुरा मानता है।

पुरे गांव के बनवाए राशन कार्ड
बुधिया बाई खुद अनपढ़ हैं लेकिन उसने अपने बेटे को अच्छी शिक्षा के लिए हमेशा सहयोग किया। यही बात उसके लिए और पुरे गांव के लिए फायदे की बात साबित हुई। बुधिया बाई जब तालाब गहरीकरण के लिए संघर्ष कर रही थी उसी समय उसे सरकार की अन्य योजनाओं के बारे में भी जानकारी मिली। जब बुधिया बाई ने गांव में सर्वे किया तो पता चला की अधिकतर ग्रामीणों के पास राशन कार्ड नहीं हैं जिसके चलते वह सरकार की योजनाओं का लाभ नहीं ले पा रहे हैं। बुधिया बाई ने अपने बेटे की मदद से गांव वालों आवेदन भर कर सभी के राशन कार्ड बनवा दिए।

अनाज और पुराने कपड़ों के बदले किया काम
बुधिया बाई जब स्पंदन के सीमा प्रकाश के संपर्क में आई तो उसने अपने गांव की समस्या उनके समाने रखी। सीमा प्रकाश ने बुधिया बाई सहित सभी महिलाओं से चर्चा कर उन्हें काम के बदले दो किलों चावल और एक पाव दाल के साथ पहनने के लिए कुछ पुराने कपड़े देने की बात कहीं। सभी महिलाओं ने उनकी इस बात को माना और तालाब गहरीकरण में जुट गई।

पांच सप्ताह में तैयार कर दिया तालाब
आदिवासी महिलाओं ने कुदाल फावड़े लेकर तालाब की खुदाई शुरू की। इस दौरान स्पंदन के कार्यकर्त्ता और राष्ट्रीपति अवार्ड से सम्मानित स्पंदन की सीमा प्रकश इन महिलाओं का हौसला बढ़ाने के लिए इनके साथ कार्य करती रही। जब आदिवासी महिलाओं को हौसला मिला तो उन्होंने पांच सप्ताह में ही तालाब को दस से बारह फिट गहरा कर दिया। अच्छी बारिश होने से उसमें लगभग 18 फिट पानी जमा हो गया। मौजूदा समय में भी तालाब में लगभग बारह फिट पानी जमा हैं।

खुश हैं गांव वाले

बुधिया बाई ने कहा कि पहले जब पानी सुख जाता था तो गांव के मवेशी पानी की कमी के चलते मर जाते थे साथ ही गांव के लोग भी गांव छोड़ कर पलायन कर जाते थे। लेकिन जब से तालाब में पानी जमा हुआ हैं तब से पूरा गांव खुश हैं। अब इन्हें अपनी जरुरत के लिए पानी लाने भटकना नहीं पड़ता है। तालाब पर आसपास के गांव के मवेशी पानी पी कर अपनी प्यास बजाते हैं। तो वहीं खेतों में सिंचाई के लिए भी तालाब का पानी काम आ रहा है। कुल मिला कर कहा जाए तो गांव वाले अपनी आवश्यकता के लिए अब पलायन नहीं कर रहे।

बेरोजगारी थी बड़ी समस्या

खालवा ब्लॉक का चबूतरा गांव जंगलो के बीच बसा हुआ हैं जहां पहुंच मार्ग भी सही नहीं हैं। यहाँ के आदिवासी किसानों के पास खेती और मवेशी पलने के आलावा कोई रोजगार नहीं हैं। रोजगार को लेकर गांव वाले पलायन कर जाते थे। गांव में जब से तालाब में पानी संग्रहण होने लगा हैं यहाँ की महिलाओं ने उस से रोजगार करने की योजना बनाई। लेकिन उनके पास पर्याप्त धन नहीं था ऐसे में स्पंदन ने फिर आगे बढ़ कर स्वयं का रोजगार स्थापित करने में उनकी मदद की। स्पंदन कि सीमा ने बताया की जब बुधिया बाई और उनके ग्रुप की अन्य महिलाओं ने रोजगार को लेकर उनसे चिंता जताई तो उन्होंने तालाब में मछली पालन की सलाह दी। उनके पास पैसे नहीं थे तो हमने उनका एक समूह बना कर उन्हें मछली के बीज दिलाए। यही मछली के बीज आज बड़े हो गए हैं। तालाब की मछलियां बेच कर अब ये महिलाए अपना स्वयं का रोजगार कर रही हैं। तालाब से रोज आधा से एक किवंटल मछली निकल कर बेची जा रही हैं। जिससे इन महिलाओं को आर्थिक फायदा भी हो रहा है।

बिना सरकारी मदद लिए रच दिया इतिहास
बुधिया बाई जब तालाब की समस्या को लेकर ब्लॉक ऑफिस गई तो उन्हें जनपद और फिर जिला कलेक्टर कार्यालय भेज दिया गया। बुधिया बाई ने बिना हार माने सभी सरकारी दफ्तरों की खाक छानी। आखिर में बुधिया बाई ने फैसला किया की वह बिना किसी सरकारी मदद के ही इस कार्य करेंगी। और उन्होंने आज अपनी इस जिद को कामयाबी में बदल ही दिया।

ग्राउंड रिपोर्ट @ निशात सिद्दीकी

 

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