Home > India > डी.पी. बोरा का निधन ,जीवन संघर्ष की कहानी

डी.पी. बोरा का निधन ,जीवन संघर्ष की कहानी

Old leader DP Bora passed awayलखनऊ [ TNN ] राजधानी की सियासत में दशकों तक दबदबा रखने वाले वयोवृद्ध नेता डी.पी. बोरा अब हमारे बीच नहीं रहे। लखनऊ विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष तथा लगातार दो बार लखनऊ पश्चिम विधान सभा क्षेत्र से विधायक रहे श्री बोरा ने गुरूवार तड़के सीतापुर रोड स्थित सेवा अस्पताल परिसर में अन्तिम सांस ली। शुक्रवार की प्रातः भैसाकुण्ड स्थित बैकुण्ठधाम में उनका अन्तिम संस्कार किया जायेगा।

छात्र जीवन में समग्र राजनीति तथा छात्र राजनीति में गहरी रूचि और पैठ होने के कारण बोरा 1966-67 में लखनऊ विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष चुने गये। इस दौर में अपने प्रगतिषील सोच के कारण वे जयप्रकाश नारायण सहित देश के प्रमुख राजनेताओं के सम्पर्क में आये। 70 के दशक में वे राष्ट्रीय छात्र संघर्ष समिति के अध्यक्ष चुने गये और देषव्यापी छात्र आन्दोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए उत्तर प्रदेश में इस आन्दोलन का नेतृत्व किया। 1966-67 में अध्यापक,छात्र, कर्मचारी,संयुक्त मोर्चे के संयोजक के रूप में राज्य कर्मचारियों के ऐतिहासिक आंदोलन में भाग लेने के कारण उन्हें आंतरिक सुरक्षा कानून में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। स्वतंत्रता के बाद यह पहले छात्र नेता थे जिनकी गिरफ्तारी के लिए सरकार ने नगद इनाम की घोषणा की थी। 1969 में सम्पन्न विधानसभा चुनाव में लखनऊपश्चिम से बोरा विधायक चुने गये।

वे 1969 में गठित उत्तर प्रदेश विधानसभा के सबसे कम उम्र के विधायक थे। बोरा 1977 में पुनः लखनऊ पष्चिम से विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए। विधानसभा के भीतर जिस प्रभावी ढंग से इन्होंने जनहित के मामले उठाए वह आज भी यादगार है। राजनीतिक क्षेत्र में श्री बोरा ने कभी समझौता नहीं किया।

गरीब,दलित, अल्पसंख्यक और कमजोर वर्ग के लोग उनकी प्राथमिकता के के न्द्रबिन्दु रहे और उन्होंने आजीवन उनके हितों की लड़ाई लड़ी। इस राह में जब भी राजनीतिक अड़ंगेबाजी हुई तो उन्होंने राजनीतिक खेमे को ठोकर मारकर जनता के बीच जाना स्वीकार किया। बोरा छात्र-अध्यापक तथा राज्य कर्मचारी संगठनों के अतिरिक्त लखनऊ के अनेक मजदूर आन्दोलनों से जुड़े रहे। उन्होंने लखनऊ एवरेडी कर्मचारी यूनियन के अध्यक्ष के पद पर रहते हुए,सफल ऐतिहासिक हड़ताल का नेतृत्व किया।

इस हड़ताल के बाद हुए समझौते से प्रत्येक कर्मचारी को कम से कम 750 रूपये की वेतन वृद्वि का लाभ मिला। समय-समय पर शहर के सौन्दर्यीकरण अभियान तथा गोमती बांध परियोजना से उजाड़े गये दलित तथा कमजोर वर्ग के लोगों के पुनर्वास के प्रष्न को लेकर बोरा ने 1970-80 के दषक में कठोर संघर्ष किया और अन्ततः उनके वैकल्पिक आवास के लिए भूखण्ड दिलाने में सफल रहे। अम्बेडकर नगर,नेहरू नगर, इंदिरापुरी,अशफाकुल्ला नगर, मायानगर, गोपाल नगर, अकबर नगर, इन्दिरा नगरी, शंकर नगर,निशाद नगर आदि दलित तथा कमजोर वर्गों की बस्तियां श्री बोरा के संघर्षों की देन है। गोमती नदी में मछली मारने के मछु आरों के परम्परागत अधिकार की रक्षा के लिए बोरा ने ऐतिहासिक मछु वारा आन्दोलन का नेतृत्व किया और अन्ततोगत्वा सरकार को मछु आरों के इस अधिकार को स्वीकार करना पड़ा।

अब लखनऊ जिले में गोमती नदी में मछली मारने की नीलामी नहीं होती है। मछु आरे निःशुल्क मछली पकड़ते हैं और इससे मछु आरों के 40 हजार परिवार लाभ उठा रहे हैं। लखनऊ निवासियों की नागरिक सुविधाआंें के लिए किये गये बोरा के संघर्षों को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। गर्मियों में पीने के पानी की समस्या की ओर सरकार का ध्यान आकृ ष्ट करने के लिए बोरा ने ”घड़ा फोड़ो आन्दोलन“,‘‘बम्बा काटो आन्दोलन’’ चलाया जिसमें जनता की भारी भागीदारी उल्लेखनीय रही। इस आन्दोलन के परिणाम स्वरूप ही 1989 में तत्कालीन मुख्यमंत्री ने दूसरे वाटर वक्र्स तथा तत्कालीन राज्यपाल ने तीसरे वाटर वक्र्स का षिलान्यास किया।

इसी तरह सफाई, बिजली, पानी तथा पर्यावरण आदि से सम्बन्धित समस्याओं को उजागर करने तथा उसका हल ढूंढने के लिए “लखनऊ की जन अदालत“ नामक संगठन के मंच से बोरा ने लखनऊ के कई हिस्सों में जन अदालतें आयोजित की जिसमें उच्च न्यायालय के अवकाष प्राप्त न्यायाधीषों ने अध्यक्षता की तथा अनेक समाजसेवी संगठनों तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भाग लिया।

निष्चय ही इन जन अदालतों ने जनमत बनाने तथा सरकार पर जनसमस्याओं को हल करने के लिए पर्याप्त दबाव बनाने में भारी सफलता प्राप्त की। मीडिया ने भी इसमें भरपूर सहयोग दिया। वैष्य समाज ने भी इनकी सक्रिया को देखते हुए इन्हें उत्तर प्रदेष वैष्य समाज का अध्यक्ष चुना। श्री बोरा पिछले पांच दषकों से लखनऊ जनपद ही नहीं प्रदेष के सभी प्रमुख जन आंदोलनों से जुड़े रहे।

रिपोर्ट :- शाश्वत तिवारी

Copyright @teznews.com. Designed by Lemosys.com