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आखिर क्यों बदली “भगवा आतंकवाद” में जाँच की दिशा

NIAनई दिल्ली – नवभारत टाइम्स में छपी खबर के अनुसार मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद कथित भगवा आतंकवाद मामले में जांच की दिशा बदलने का पहला ठोस संकेत नजर आया है। नैशनल इनवेस्टिगेशन एजेंसी (एनआईए) ने 2008 के मोदासा ब्लास्ट केस में जांच बंद करने का फैसला किया है। इस संबंध में रिपोर्ट पिछले महीने दायर की गई थी और अहमदाबाद के एनआईए स्पेशल कोर्ट ने हाल में इस रिपोर्ट को स्वीकार किया है। इसमें जांच बंद करने के लिए ‘अपर्याप्त सबूतों’ का हवाला दिया है।

यह कथित भगवा आतंकवाद केस से जुड़ी जांच बंद करने का पहला मामला है, जिसमें एनआईए की जांच में कुछ दक्षिणपंथी कट्टरपंथी ताकतों की संलिप्तता का शक था। यहां तक कि आरएसएस के कुछ पूर्व सदस्यों पर भी उंगली उठी थी। मोदासा ब्लास्ट 29 सितंबर 2008 को अंजाम दिया गया था। मालेगांव हमले के एक दिन बाद यह ब्लास्ट हुआ था। मोदासा ब्लास्ट में एक शख्स की मौत हुई थी, जबकि मालेगांव की घटना में 6 लोग मारे गए थे। दोनों धमाकों में इस्तेमाल किए गए बम एक तरह के थे और इन बमों को मोटरसाइकिल में प्लांट किया गया था।

एनआईए के प्रवक्ता ने इस मामले में जांच बंद किए जाने की पुष्टि की। उन्होंने कहा, ‘अगर भविष्य में हमें कोई सबूत मिलता है, तो दोबारा जांच के लिए दरवाजे हमेशा खुले हैं।’

एनआईए के एक सीनियर अधिकारी ने बताया, ‘जांच को इसलिए झटका लगा, क्योंकि हम इस मामले से जुड़े दो अभियुक्तों संदीप डांगे और रामजी कलसांगरा की खोज नहीं कर सके। हमारी तमाम कोशिशों के बावजूद इन दोनों को पकड़ा नहीं जा सका। इन दोनों पर मोदासा ब्लास्ट में अहम भूमिका निभाने का अंदेशा है।’ माना जा रहा है कि एआईए ने अपनी क्लोजर रिपोर्ट में यह भी कहा कि यह घटना 2008 में हुई थी और इसे 2011 में एनआईए को ट्रांसफर किया गया, जिससे इससे जुड़े अहम सबूत नष्ट हो गए।

साथ ही, जांच एजेंसी का यह भी कहना था कि ब्लास्ट में इस्तेमाल की गई बाइक का इंजन और चेसिस नंबर का पता लगाकर जांच शुरू की गई, लेकिन विस्फोट के कारण इससे जुड़ी आखिरी तीन डिजिट को पढ़ा जाना मुमकिन नहीं था। उस वक्त यह भी अंदाजा लगाया जा रहा था कि पहचान से बचने के लिए शायद नंबर से छेड़छाड़ की गई हो। जांचकर्ता नंबरों को लेकर कई तरह का गुणा-गणित करते रहे, लेकिन वे बाइक के मालिक का पता नहीं लगा सके।

जांच एजेंसी ‘भगवा आतंकवाद’ से जुड़े कई मामलों की जांच कर रही है। इनमें मालेगांव में 2006 और 2008 में हुए ब्लास्ट, समझौता एक्सप्रेस में हुआ धमाका, अजमेर ब्लास्ट और 2007 में हैदराबाद के मक्का मस्जिद में हुए ब्लास्ट जैसी घटनाएं शामिल हैं। सुनील जोशी, कालसंगारा और डांगे के साथ स्वामी असीमानंद, साध्वी प्रज्ञा ठाकुर और कर्नल श्रीकांत पुरोहित ऐसे कई मामलों में मुख्य अभियुक्त हैं।

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