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विश्व हिन्दी सम्मेलन में नहीं साहित्यकारो की पूछ परख

10th_logoNational Hindi Conferenceइंदौर – भोपाल में 10 सितंबर से शुरू होने वाले विश्व हिन्दी सम्मेलन के लिए आमंत्रितों की सूची में शहर के 442 के नाम हैं, लेकिन उनमें साहित्यकार कम और नेताओं के ज्यादा हैं। इसे लेकर साहित्यकारों में काफी गुस्सा है। उनका कहना है कि बुलावा आएगा तो भी नहीं जाएंगे। हिन्दी सम्मेलन में प्रदेश के हर जिले से 40 से 50 लोगों को आमंत्रित किए जाने की योजना है। इंदौर प्रदेश का बड़ा शहर है।

यहां से आमंत्रितों की संख्या 442 है। इसके लिए रविवार को भोपाल से आमंत्रण पत्र आए। प्रधामंत्री नरेन्द्र मोदी और ख्यात फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन भी सम्मेलन में होंगे, इसलिए कार्ड में बार कोडिंग की गई है और 10 और 12 सितंबर के कार्ड सील करके आमंत्रितों को भेजे जा रहे हैं।

अफसरों ने शहर के 3 हजार विशिष्ट अतिथियों की सूची में से आमंत्रितों के नाम छांटे हैं। पहले चरण में 100 से ज्यादा नाम चुने गए हैं, लेकिन उनमें हिन्दी साहित्यकारों के नाम कम और नेताओं व अन्य के ज्यादा हैं।

पार्षद पति, नेता, पदाधिकारियों को कार्ड

प्रशासन द्वारा तैयार की गई सूची में जिन लोगों को बुलाया जा रहा है, उसमें जनप्रतिनिधि, पार्षद, पार्षद पति, सामाजिक-धार्मिक संगठनों के पदाधिकारियों के नामों की भरमार है। सूची में पूर्व विधायक अश्विन जोशी, जीतू जिराती, तुलसी सिलावट, नारायणसिंह केसरी, उमाशशि शर्मा, कृष्णमुरारी मोघे, प्रमोद टंडन, कृपाशंकर शुक्ला, शोभा ओझा, पीडी अग्रवाल, संजय शुक्ला, शैलेन्द्र बरुआ, डॉ.गोकुलोत्सव महाराज, गोलू शुक्ला, महेश जोशी, सुरेश सेठ, कल्याण जैन, रामलाल यादव भल्लू, प्रदीप होलकर, प्रीतमलाल दुआ, मनजीतसिंह भाटिया, रमेश बाहेती, गौतम कोठारी, पंकज संघवी, आनंद मोहन माथुर, लक्ष्मीनारायण पाठक, सोहनलाल शिंदे, ओमप्रकाश खटके, प्रताप करोसिया, महेश गर्ग, विष्णुप्रसाद शुक्ला, बालकृष्ण अरोरा, गणपत गौड़, कमलेश नाचण, आलोक दुबे, संध्या यादव सहित अन्य नाम हैं।

प्रगतिशील लेखक संघ के कृष्णकांत निलोसे ने कहा कि सम्मेलन में जिन्हे बुलाना चाहिए, उन्हें आमंत्रण दिया ही नहीं और जिनका साहित्य से कोई लेना-देना नहीं, उन्हें सिर पर बैठा रहे हैं। हम तो हिन्दी की सेवा कर रहे हैं और अपना लेखन करते रहेंगे, लेकिन दुख होता है कि इस स्तर पर भी राजनीति हो रही है।

साहित्यकार नरहरि पटेल ने आक्रोशित होते हुए कहा कि हम तो गांव खेड़े के कवि हैं। बोली का प्रचार करते हैं। अभी मुझे कार्ड नहीं मिला है। मिलेगा तो भी अभी जाने का कुछ सोचा नहीं है।

कथाकार व चित्रकार प्रभु जोशी ने कहा कि सत्ता के लिए भाषा संस्कृति और साहित्य नहीं, राजनीति और व्यावसाय का उपकरण है। सत्ता से हमें ज्यादा अपेक्षा नहीं रखना चाहिए। मेरे ख्याल से सम्मेलन में हिन्दी के कार्पोरेट चिंतन पर ज्यादा सोचा जा रहा है।

इंदौर जिला सत्कार अधिकारी बीबीएस तोमर के अनुसार 26 जनवरी और 15 अगस्त को होने वाले शासकीय आयोजन में जिन श्रोताओं को बुलाया जाता है, उस सूची में से हमने नाम तय किए हैं। इन लोगों को श्रोताओं के रूप में ही बुलाया जा रहा है। अभी कार्ड बांटे जाएंगे।

 

सम्मेलन को भाषा के नजरिए से नहीं देखना चाहिए। यह सियासी सम्मेलन है। मुझे तो दुख होता है जब ऐसे सम्मेलनों में हिन्दी से जुड़े साहित्यकारों को दरकिनार किया जाता है। वैसे मुझे अभी तक कार्ड नहीं मिला है और इसका दुख भी नहीं है। मैं हिन्दी में भी लिखता हूं, लेकिन उर्दू का शायर हूं। मेरे अग्रज इस सम्मेलन का बहिष्कार कर रहे हैं तो मेरे जाने का सवाल ही नहीं। – राहत इंदौरी, ख्यात शायर

 

 

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