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फोटो डेली मेल ऑनलाइन के सौजन्य से

बीड – महाराष्ट्र के बीड में एक मुस्लिम परिवार वह भी जाति से कसाई। जिसका भरापूरा परिवार और आप जान कर हैरान हो जाओगे कि इस परिवार की सदस्य के रूप में 165 गाय-बछड़े भी है। भयंकर सूखे से जूझने के बाद भी ये मुस्लिम परिवार गाय और बछड़ो के लिए खान-पान का प्रबंध करना नहीं भूलता।

बीड जिले के दहीवांडी गांव में रहने वाले 55 साल के शब्बीर सैयद कहते हैं, ‘जब भी किसी बछड़े या गाय की मौत होती है, दर्द होता है। ऐसा लगता है मानो परिवार के किसी सदस्य को खो दिया।’

एक अंग्रेजी अखबार में छपी खबर के अनुसार शब्बीर का परिवार न तो दूध बेचता है और न ही गौमांस का बिजनस करता है। ये लोग बैलों को बहुत ही कम कीमत पर स्थानीय किसानों को बेचते हैं। हालांकि खरीदने वाले को यह लिखित में देना होता है कि इसे कसाइयों को नहीं बेचा जाएगा और बूढ़े होने के बाद उसे वापस सैयद परिवार को लौटाना होगा।

शब्बीर और उनका पूरा परिवार अपने जानवरों की सेवा में लगा रहता है। परिवार को चलाने के लिए ये लोग स्थानीय किसानों को गोबर वाली खाद बेचते हैं। इससे इन्हें प्रति वर्ष 70000 रुपये की आय होती है। हालांकि 6 बालिग लोगों के परिवार के लिए यह रकम कम मालूम पड़ती है पर इस क्षेत्र के लोगों की औसत आमदनी है- 19 रुपये प्रतिदिन। इस हिसाब से इनकी आमदनी ठीक-ठाक है।

परिवार में पशुपालन की शुरुआत शब्बीर के पिता बुदन सैय्यद ने सत्तर के दशक में की थी। खुद को खटीक (कसाई) कहे जाने पर होने वाली शर्मिंदगी से बचने के लिए बुदन सैय्यद ने कसाइयों से दो गायों की जान बचाई थी और उसका पालन-पोषण किया था। इसके बाद शब्बीर ने 1972 में कसाईयों से ही 10 गायें खरीदी थीं। स्थानीय लोग इनकी सेवा को देखते हुए इनके पास अपनी बूढ़ी गायें रख जाते थे और आज इनकी संख्या 165 तक पहुंच गई है।

भयंकर सूखे के कारण पैदा हुई पानी और चारे की कमी इन जानवरों के जीवन पर भारी पड़ रही है। पिछली बार आई भयंकर बारिश ने दो गायों और तीन बछड़ों को लील लिया था, जबकि पांच सालों से पड़ रहे सूखे के कारण 12 गायों ने अपना दम तोड़ दिया है।

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