Supreme Courtसर्वोच्च न्यायालय ने उत्तरप्रदेश पर लोकायुक्त थोप कर हमारी शासन व्यवस्था पर करारा तमाचा जड़ दिया है। अपने देश या किसी प्रदेश में लोकपाल या लोकायुक्त नियुक्ति जिन्हें करनी है, वे न कर पाएं और यह काम अदालत को करना पड़े, यह कम शर्म की बात नहीं है। अदालत की तीन चेतावनियों के बावजूद उ.प्र. में लोकायुक्त की नियुक्ति नहीं हो पा रही थी।

अंतिम चेतावनी के तौर पर बुधवार तक का समय दिया गया था लेकिन वह भी टल गया, क्योंकि पांच उम्मीदवारों में से किसी के नाम पर भी सर्वसम्मति नहीं हो रही थी।

सर्वसम्मति किनकी होनी थी? मुख्यमंत्री, विपक्ष के नेता और उ.प्र. के मुख्य न्यायाधीश की! इन तीनों में जब तक सहमति न हो, किसी भी व्यक्ति को लोकायुक्त नहीं बनाया जा सकता। तीन उम्मीदवारों पर पहले दो निर्णायकों की सहमति थी लेकिन किसी एक भी उम्मीदवार पर मुख्य न्यायाधीश राजी नहीं थे।

याने असली अड़ंगा मुख्य न्यायाधीश का हुआ। पता नहीं कि वह उनका अंडगा था या वास्तविक प्रामाणिक आपत्ति थी? लेकिन अनिर्णय का ठीकरा उन्हीं के सिर फूटा, क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने मुख्यमंत्री या विपक्ष या उप्र की सरकार को दोषी नहीं ठहराया है।

उसने जिन शब्दों का प्रयोग किया है, वे ये हैं कि ‘संवैधानिक अधिकारियों की अक्षमता’ के कारण यह नियुक्ति टलती रही। इसके पहले उप्र के राज्यपाल ने मुख्यमंत्री द्वारा भेजे गए कई नामों को रद्द कर दिया था। उनका कहना था कि लोकायुक्त किसी को अपनी मनमर्जी से नहीं बनाया जा सकता। विधिवत प्रक्रिया का अपनाया जाना जरुरी है। सर्वोच्च न्यायालय ने जिन सज्जन, वीरेंद्र सिंह यादव, को लोकायुक्त नियुक्त किया है, उन पर भी उप्र के मुख्य न्यायाधीश को गंभीर एतराज हो सकते हैं।

आश्चर्य है कि लोकायुक्त के पांचों उम्मीदवार उप्र उच्च न्यायालय के सेवा-निवृत्त न्यायाधीश हैं। वर्तमान मुख्य न्यायाधीश को इन सभी सेवानिवृत्तों की प्रवृत्तियों और निवृत्तियों के बारे में काफी कुछ पता होगा, जो शायद नेताओं को पता न हो लेकिन इसका अर्थ क्या यह हुआ कि लोकायुक्त का पद अनंत काल तक अधर में लटकाया जा सकता है? यह समस्या तो हर नियुक्ति के बारे में सामने आ सकती है।

सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला अपूर्व है। क्या अब केंद्र सरकार के लोकपाल की नियुक्ति भी वही करेगा? सच्चाई तो यह है कि नेता लोगों ने इतने काले-पीले धंधे कर रखे होते हैं कि उन्हें लोकपाल जैसी संस्थाओं से ही नफरत होती है और वह यदि निष्पक्ष और निर्भीक हो तो वह करेला और नीम चढ़ा बन जाता है।

लेखक:- वेद प्रताप वैदिक

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here