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खुला ख़त :वो खबर तो डिलीट करा दीजिये सम्पादक जी !

Write-a-Letterदेश में हलचल हो या न हो, दिल्ली में हलचल है। वैसे तो जब भी दिल्ली में कोई हलचल होती है तो मै गांव फोन करता हूं, ये जानने के लिए कि क्या गांव में भी कुछ ऐसा है? अक्सर जवाब “न” में ही होता है। अभी डेढ़ महीना पहले गांव गया था तो दादा जी ने पूछ दिया कि ये ‘सहिष्णुता’ क्या होती है? मैने बता दिया और वो हंस कर रह गये।

खैर, यह लेख कम और सम्पादक जी लोगों के नाम पत्र ज्यादा है। सर जी, साल दो साल में एक बार जब यमुना का पानी हल्का सा ओखला के किनारे पहुंचता है तो मेरे गांव से फोन आ जाता है कि तुम जल्दी गांव चले आओ! जानते हैं क्यों? क्योंकि आप एनिमेटेड विजुअल से ऐसी डरावनी तस्वीरें ‘दिल्ली में बाढ़’ की दिखाते हैं कि दिल्ली में रहने वाले को छोड़कर बाकी कहीं का आदमी डर जाय! ये आपकी न्यूज़ गढ़ने की काबिलियत है, मैं आपको सलाम करता हूं इस काबिलियत के लिए! खैर, अभी मामला जेएनयू में अटका पड़ा है। देश की सारी घटनाएं छुट्टी पर भेज दी गयी हैं! उनको इंतजार है कि कब आप उनकी छुट्टी ख़त्म करें और वो वापस काम पर लौटें।

सर जी, केरल में एक लड़का मरा है। मरा क्या है, मारा गया है। बताया जा रहा है कि संघ का स्वयं सेवक था और मारने वाले माकपा के कार्यकर्ता थे। अरे, वही माकपा, जिनका पीआर आप जेएनयू में आजकल संभाल रहे हैं। आप पीआर करिए, मुझे कोई दिक्कत नहीं लेकिन एक अनुरोध है। उम्मीद करूंगा आप मेरा दर्द समझते हुए अनुरोध स्वीकार करेंगे। आपके पास चैनल के अलावा एक वेबसाइट भी है, जिस पर लाखों-लाखों शेयर और हिट्स की पत्रकारिता आप करते हैं। दावा ऐसा है कि कोई खबर लगते ही मिनटों में गूगल न्यूज़ में आ जाती है। सर, संघ के कार्यकर्ता सुजीत की मौत की खबर सुना तो हिंदी मीडिया के वेब पर गूगल से सर्च किया। कीवर्ड लिखा, ‘केरल में संघ कार्यकर्ता की हत्या’! झूठ नही बोल रहा हूं, ऊपर से जो पांच-सात सर्च हुए उनके आईबीएन खबर को छोड़कर किसी और न्यूज चैनल की वेबसाइट एक लिंक या न्यूज़ नहीं दिखा जो हिंदी टीवी न्यूज़ के वेब में सबसे आगे और तेज होने का दावा करते हैं।

हालांकि बदलकर कुछ और की-वर्ड डाला तो कुछ अखबारों के लिंक टॉप में जरुर दिखे! लेकिन टीवी न्यूज़ के आगे रखने वाले ‘वेब पोर्टल” फिर भी नदारद ही थे! फिर की-वर्ड के साथ अन्य चैनल का नाम दे-देकर सर्च किया। सर जी, खोजते-खोजते जब एक टीवी चैनल के वेब पर पर खबर मिली बड़ी मुश्किल से तो वो खबर मात्र ‘पांच लाइन में लिखी गयी थी! जब वेब पर ये हाल है तो बुलेटिन में क्या हाल होगा! हालांकि वो पांच लाइन की खबर देखकर तो मै भाव-विभोर हो गया। लेकिन एक ख्याल और मन में आया। ये ‘पांच लाइन’ में खबरनवीसी का आपका मैराथन प्रयास देखकर मैं सोच रहा हूं कि अब सुजीत तो रहा नही, आपका यह एहसान कौन चुकाएगा? आपने इन पांच लाइनों से सुजीत पर जो एहसान लाद दिया है, उसके कर्ज में तो उसके गरीब मां-बाप भी दब जायेंगे!

सम्पादक जी, एक अनुरोध है…अभी भी समय है उस खबर को डिलीट करके मृतात्मा सुजीत को अपने कर्जे से मुक्त करिए। यह कर्ज वो कहां-कहां ढोयेगा? आपके पास स्पेस क्राइसिस है और कन्हैया का मुद्दा अभी मरा नही है। स्पेस बचाकर रखिये, इस सीजन अगर बाढ़ आ गयी तो हमारे गांव वालों को कैसे डरायेंगे?

आपका अपना ही बिरादर

शिवानन्द

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