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राजनीति के संत थे अटल जी

25 दिसम्बर 1924 को भारत के मध्यप्रदेश ग्वालियर में जन्मा एक सूरज जिसने जन्म से ही संघर्ष का न केवल सामना किया बल्कि अपने को निखारा, अपने को तपाया तब जाके कुन्दन बने और 16 अगस्त को एकता, सदभावना का सूर्य अस्त हो गया।

अटल रूके नहीं, अटल झुके नहीं, अपनी शर्तों

पर अपनी ही तरह से जिये और अपनी ही शर्तों

पर देह भी त्यागी। राजनीति में न केवल उच्च

मानदण्ड स्थापित किये बल्कि उसे जिया भी।

प्रदूषित राजनीति से न केवल खुद अपर रहे,

बल्कि पार्टी को भी कर्मयोगी की तरह बचाते रहे,

सहेजते रहे। तभी तो ‘‘पार्टी विथ डिफरेंस’’ का

सूत्रपात किया! अटल जी ने जिंदगी में हार मानी

नहीं और राजनीति में राह किसी से ठानी नही।’’

वास्तव में अटल जी राजनीति के संत थे।

जनसंघ से लेकर भारतीय जनता पार्टी तक की यात्रा में अटल जी कभी भी विवादास्पद नहीं रहे और यही उनकी विशेषता भी रही। दीपक वाली पेटी से कमल का फूल तक के सफर में उन्होंने कभी भी सामने वाले को नीचा दिखा अपने को नहीं उठाया। यूं तो राजनीति में हर कोई शुचिता की बात तो करता है लेकिन अटल जी ने न केवल राजनीति में सुचिता की बात को शिद्दत से निभाया बल्कि उन्हीं से सुचिता शब्द भी गोरवान्वित हुआ, यदि ऐसा भी कहा जाये तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।

उनके जीवन में जिसने भी उसकी सहायता की चाहे वो पार्टी का हो या विरोधी दल पार्टी का हो से अलग ही रिश्ते निभाएं। फिर बात चाहे महाराज सिंधिया द्वारा उनकी पढाई में सहायता की बात हो या कांग्रेस के पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी द्वारा सन् 1987 में उनकी किडनी की बीमारी का इलाज अमेरिका में कराने का हो। अटल जी ने अपने मूल्यों को ही सर्वोपरि रखा। यदि मूल्यों के आड़े पार्टी भी आई तो उसे भी दरकिनार करने में नहीं हिचकिचाए। व्यक्तियों के साथ उनकी आत्मीयता ने ही अन्य नेताओं से उन्हें अलग रखा और यही उनके जीवन की कमाई भी है। कवि हृदय होने के कारण वे दिली तौर पर बड़े ही संवेदनशील थे। 2004 में अटल जी ने राजनीति से सन्यास ले लिया जो आज कोई भी मरते दम तक नहीं करता। यही बात उनको अन्य लोगों से ऊपर उठा देती है। अटल जी के सन्यास के बाद से पार्टी में विगत् एक दशक से राजनीति में और विशेषतः भाजपा में एक बड़ा ही आमूल चूल परिवर्तन आया ‘‘पार्टी विथ डिफरेंस’’ अपने को एक नये कलेवर में ढाल कारपोरेट कल्चर की राह पर चल निकली। कुछ स्थापित मान्यताएं तोड़ी तो कुछ नई स्थापित की। अब ‘‘जीत ही मेरा व्यवसाय’’ की तर्ज पर भाजपा ने अपना अश्वमेव का घोड़ा भारत में दौड़ाना शुरू कर दिया जिसका सुखद परिणाम 24 राज्यों में उनका परचम लहरा रहा है। जब भी हम तब और अब की बात करते है तो अनायास ही कार्यों की तुलना आ ही जाती है।

निःसन्देह अटल जी देश के तीन बार 1996, 98, 99 में प्रधानमंत्री बने। 1996 में तो मात्र 13 दिन की ही सरकार रही लेकिन उन्होंने राजनीति सरकार के लिए कभी भी अपने स्थापित उसूलों से समझौता नहीं किया, ऐसा भी नहीं कि मौके नहीं मिले, मिले पर नहीं किया। कवि हृदय कोमल होने के बावजूद निर्णय कठोर से कठोर लेते रहे फिर बात चाहे पोकरण में परमाणु बम विस्फोट परीक्षण की हो या इस बाजार में भले ही भारत को कई प्रतिबन्ध झेलने पड़े पर वे डिगे नहीं, भारत का सिर झुकने नहीं दिया। बैरी को भी अपना बनाने का उनमें हुनर था तभी तो पड़ौसी देश पाकिस्तान से अच्छे सम्बन्ध बनाने के लिये उन्होंने ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी मसलन बस से सफर लाहौर तक किया, बस चलाई। ये अलग बात है कि बदले में ‘‘कारगिल युद्ध’’ मिला। यूं तो अटल जी ने कई योजनाएं संचालित की लेकिन उनमें भी सबसे प्रमुख स्वर्णिम चतुर्भुज योजना, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, गांव तक पी.सी.ओ. की पहुंच ने भारत की तस्वीर ही बदल कर रख डाली।

निःसंदेह अटल जी ने जीवन में धन दौलत नहीं कमाई लेकिन जो कमाया वह अक्षय हैं मसलन नाम, शोहरत, ईमान, नेकी जो अन्य नेताओं से उन्हें सर्वोच्च शिखर पर रखता है और यही उनकी असली पूंजी भी है। लेकिन अब राजनीति में इतना दलदल हो गया है, इतनी कीचड़ हो गई है कि उसको उछाले बिना अब काम ही नहीं चलता। अब निगेटिव राजनीति का सूत्रपात हो गया है कुछ भारत में तो कुछ विदेश से प्रचार एक फेशन सा हो गया है। जिस राजमाता सिन्धिया ने भाजपा को कड़की के दिनों में वित्त पोषित किया, लालन-पालन किया, आज उसी परिवार पर हम कीचड़ उछालने से भी नहीं चूंकते। राजमाता तो ठीक खानदान खराब कैसे हो सकता है? लेकिन कलयुग है राजनीति जो न कराय कुर्सी के लिए। परिवार पर लगने वाले लांछन इसका जीता जागता सबूत हैं। ये अटल जी ने कभी नहीं किया ओर यही कृत्य अन्य नेताओं से उनको अलग करता है।

आज राजनीति सेवा नहीं धन्धे के रूप में चल रही है तभी तो एक वो व्यक्ति जो दो जून की रोटी के लिए परिवार चलाने के लिये तरसता था वह पार्षद, वह विधायक वह मंत्री बनते ही अल्प समय में करोड़पति-अरबपति कैसे बन जाता है? फिर पैसे का अहंकार सिर चढ़कर बोलता है फिर ऐसा व्यक्ति पार्टी को कपड़े की तरह बदलता है। अब राजनीति में न तो कोई नीति न कोई रीति बची है। केवल जीत ही मंत्र रह गया है जिससे अपराधी तत्वों की मौजा ही मौजा है। दूसरा परिवारवाद को कोसते-कोसते अब खुद ही अपनी बीवी, बच्चों, रिश्तेदारों के लिए टिकट मांगना एवं असली कार्यकर्ताओं के हक पर डाका डालने का एक रिवाज सा बन गया है।

भाजपा को यह कतई नहीं भूलना चाहिए कि उनकी पार्टी त्यागी लोगों की रही है जिसे दीनदयाल, श्यामाप्रसाद मुखर्जी, राजमाता सिन्धिया, कुशाभाऊ ठाकरे, लालकृष्ण आड़वाणी जैसे लोगों ने सींचा है। अब त्यागी नेता दर-दूर तक नहीं है पूरी पार्टी मे अब कुछ आशा नरेन्द्र मोदी से जरूर है लेकिन कुछ शातिर दिमाग के लोगों ने उन्हें भी जात-पात की राजनीति में उलझाकर ही रख दिया है।

शशि फीचर.ओ.आर.जी.

लेखिका सूचना मंत्र की संपादक हैं

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