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आदिवासीयों ने शुरू किया पर्यावरण के हल का अनोखा अभियान

 

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बैतूल  [ TNN ]८ अगस्त, इस समय पूरी दुनिया पर्यावरण के बिगड़ते हालत, रोजगार और भुखमरी कि समस्या से झूज रही हैं. साल दर साल मौसम जिस तरहसे करवट बदल रहा है; उससे से साफ़ जाहिर है, हमें रोजगार के ऐसे तरीके ढूढने होंगे जो पर्यावरण का बिगाड़ करने कि बजाए उसका सुधार करे. और इस काम को अंजाम देने का बीड़ा बैतूल जिले के आदिवासियों ने उठाया है. अपने ‘हरियाली अभियान’ के तहत, इस साल आदिवासीयों ने बैतूल जिले में ५० हजार फलदार पौधे लगाने का संकल्प लिया है. इस हरियाली अभियान में बैत्तूल जिले कि आम-जनता और जिला प्रशासन के सहयोग को लेकर उन्होंने आज बैतूल में कावण में फलदार पौधे लेकर ‘हरियाली यात्रा’ निकली. उनका कहना था, फलदार पौधे लगाने को लेकर जिला प्रशासन उन पर केस लगाने और जेल में डालने कि बजाए, उन्हें मदद करे तो वो जिले कि सूरत बदल सकते है.

वो मानते है, बड़ी से बड़ी समस्या के हल, छोटे से प्रयास से हो सकते है इस बात को वो समझते है. १९७० के दशक में अपनी पुस्तक ‘स्माल इज ब्यूटिफूल’ में अमेरिका के प्रसिध्द अर्थसस्त्री ‘ ई. एफ. शूमाकर’ ने भी यह दिशा दिखाई थी. उन्होंने कहा था, बिना किसी विदेशी कर्जे या मदद के भारत कि बेरोजगारी का ईलाज गांधीजी के बताए रास्ते पर चलकर अरबों कि संख्या में पौधे लगाने में है, ना कि अंधे औधोगीकरण में . उनके इस सुझाव को चरितार्थ करने का काम बैतूल जिले के आदिवासीयों कर रहे है. उनका नारा है “ फलदार पौधे लगाएंगे – हरियाली लाएंगे और भुखमरी भगायेंगे”. आदिवासीयों के सबसे बड़े और नए मौसम के पहले त्यौहार – हरि-जिरोतीजो जुलाई माह में आता है- को आदिवासी एक महीने के “हरियाली अभियान के रूप में मना रहे है.

इस अभियान को सफल बनाने के लिए, आदिवासीयों ने, श्रमिक आदिवासी संगठन और समाजवादी जन परिषद के बैनर तले, दो हफ्ते पहले बैतूल कलेक्टर को ज्ञापन दे आम, जाम, जामुन, आंवला, सीताफल आदि के ५० फलदार पौधे मुफ्त देने कि मांग की थी. उनका कहना था कि, उनका हर सदस्य इन पोधों को खेत- बाडी और गाँव में बेकार होती सार्वजानिक भूमी पर लगाएगा. इस अभियान में लोग खुद मेहनत करते है, इसलिए कोई सरकारी बजट कि जरूरत नहीं है. इस अभियान में अगर सबका सहयोग मिले तो देखते ही देखते कुछ सालों में जिले के हर गाँव में फलदार पौधों का बगीचा हो सकता है; जिसमे करोड़ों कि संख्यां में फलदार पौधे हो सकते है. इससे से आगे चलकर न सिर्फ एक बार फिर जिले कि नदी में पानी बढेगा, बल्कि लोगों को सस्ते फल मिलने से लोगों का पोषण का स्तर सुधरेगा. आने वाले समय में जिले में इन फलों के पल्प, रस आदि निकालने कि फेक्ट्री भी लगाई जा सकती है.

समाजवादी जन परिषद (सजप) के प्रदेश अध्यक्ष राजेन्द्र गढ़वाल ने कहा कि, १९९९ के पर्यावरण और वन मंत्रालय के आंकड़े बताते है कि ३ करोड़ हेक्टर से उपर जंगल जमीन पर समाजिक वनीकरण के तहत प्लान्टेशन किया जा चूका था. लेकिन, आज हमें देश में कही भी इसकी सफलता नहीं दिखती. श्रमिक आदिवासी संगठन के ग्राम मरकाढाना के सुमरलाल ने कहा कि वन विकास निगम ने उनके ईलाके पिछले ३० सालों में लाखों कि सख्यां में प्राकृतिक रूप से लगे महुए, आचार और तेंदु आदि फलदार पेड़ों को जड़ से साफकर सागौन के पेड़ लगा रहा है . इन पेड़ों से ना तो पर्यावरण सुधरता है, ना उस ईलाके के लोगों को कोई फायदा होता है. उनके गाँव वालों ने अपने पैसे और मेहनत से गाँव में नर्सरी बना, उसमें पांच हजार फलदार पौधे तैयार किए है.पिछले साल भी उन्हें ने गाँव के पास कि जमीन पर इतने ही पोधे लगाए है, और इसकी देखभाल भी कर रहे है. चिचोली ब्लाक के बोड ग्राम के मुन्ना ने बताया कि उनके गाँव में भी वो ऐसा कर रहे है. दोनों गाँव के दर्जनों आदिवासी पर इस बात को लेकर वन विभाग ने अपराधिक प्रकरण दर्ज किए है.

सजप के राष्ट्रीय सचिव अनुराग मोदी ने कहा कि देश में जहाँ तरफ ५०% आदिवासी कुपोषित है, वहीं शहर में बड़े पैमाने पर कुपोषण है. दूसरी तरफ बड़े पैमाने पर वन और राजस्व विभाग कि जमीन पड़त पडी है. अनेकों जगह तो राजस्व जमीन पर गाँव के रसूखदार लोगों के अवैध कब्जे है. उन्होंने आगे कहा कि अगर उनकी पार्टी के अभियान को सरकार का सहयोग मिले, तो आने वाले पांच साल में देश के पर्यावरण, रोजगार और कुपोषण के हालात काफी हद तक सुधर सकते है.


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