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सरकारी क़र्ज़ ने ली मूरत आदिवासी की जान

baitul kisaan

बैतूल- सामान्य किसान के बाद, अब म. प्र. में एक के बाद आदिवासी किसान फसल ख़राब होने पर कर्जे से बचने के लिए आत्महत्या की राह पर है और सरकार ना तो इन आदिवासी किसानों को कोई मदद दे रही है और ना ही गाँव में कोई रोजगार के काम खोल रही है।

विगत हफ्ते, अकेले बैतूल जिले में भीमपुर ब्लाक में झाकस के बाद अब बासिंदा गाँव के आदिवासी किसान ने आत्महत्या की।  समाजवादी जन परिषद के दल ने म. प्र. के बैतूल जिले के बासिन्दा गाँव का दौरा करने के बाद यह पाया कि मूरत आदिवासी ने सरकारी कर्ज ना चूका पाने के कारण आत्महत्या की थी।

गाँव में हर किसान की फसल पिछले दो साल से खराब हो रही है। और बासिन्दा में एक साल से ग्रामीणों के लिए रोजगार के कोई साधन नहीं खोले गए।  महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार योजना के पुराने काम भी बंद पड़े है।

मूरत बटके ने सेंट्रल बैंक की भीमपुर शाखा से 50,000 रुपए का कर्ज किसान क्रेडिट कार्ड पर लिया था; जो वो नहीं चूका पाया। इसके अलावा इसी शाखा से मुख्यमंत्री आवास के लिए 45000 का लोन लिया था।  उसने 6 साल पहले साहूकारों का लगभग डेढ़ लाख़ रुपया क़र्ज़ चुका दिया था।

मूरत बीते 17 से बी जे पी का सक्रिय सदस्य है, इसके बावजूद पार्टी ने उसकी कोई मदद नहीं की। मूरत वन अधिकार समिति का भी सदस्य था; लेकिन वहां से भी उसे कोई मदद नहीं मिली।

मूरत के पास डेढ़ एकड़ ज़मीन है जो भाई बंटवारे में मिली थी इस ज़मीन में पिछले साल भी कोई फसल नहीं हुई थी।जो मक्के की एक बोरा फसल हुई है, उसमें बा मुश्किल एक माह भी भोजन का जुगाड़ नहीं हो पाएगा।  मूरत ने गर्मी में मूंग लगा दी थी लेकिन फसल में एक दाना भी नहीं आया ।

जैसे तैसे मूरत ने 70 हजार खर्च क़र ईट बनवाई जिसमे आधी वो खुद घर के उपयोग के लिए रखना चाहता था क्योंकि मुख्यमंत्री आवास स्वीकृत हो गया था। बाकी बची ईट बेच कर अन्य सामान और लड़की की शादी करने की सोच रखा था।

लेकिन भटटा लगाते ही तेज़ बारिश हुई, और भट्टा बैठने से सारी ईट बेकार हो गई।  जिसमे मूरत को भारी नुक्सान हो गया। मूरत के तीन बेटों में सतीश और सुनील को काम की तलाश में गुजरात जाना पड़ा । सतीश के पहले सुनील ने अहमदाबाद में सेंटरिंग लगाने काम लिया । लेकिन, अब पिता के मरने की खबर मिलने के बाद वापस लौट आये ।

अभी भी सतीश और सुनील का पैसा ठेकेदार से हिसाब होने के बाद मिलेगा। मूरत को आज से पहले ज़रूर टी बी थी जिसका लम्बा इलाज बैतूल जिला चिकित्सालय में भी चला। बासिन्दा गाँव में ग्रामीणों को कोई काम नहीं मिला।

रिपोर्ट:- अनुराग मोदी

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