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भाजपा को सत्ता का सुख मिला राम मंदिर की बदौलत !

The pain of Ayodhyaमुदस्सिर खान

लोकसभा चुनाव की तैयारियां अपने शबाब पर है पहले चरण के मतदान में कुछ ही दिन शेष रहा गए है। सारी पार्टिया पूरे जोर से सोर के साथ चुनाव प्रचार कर रही हैं। देश की सबसे बड़ी पार्टियों में भाजपा नरेंद्र मोदी की आगुवाई में चुनाव लड़ने को तैयार है। वर्ष 2002 में हुए गुजरात दंगों की दाग 11 साल बीत जाने के बाद भी नरेंदमोदी का पीछा नहीं छोड़ रही है। सोनिया गाँधी ने उन्हें 2009 की लोकसभा चुनाव में मौत का सौदागर कहां था। मोदी जहां भी जन सभा करते है। वहां विकास की बात करते है। पार्टी में एक अहम भूमिका रखते है और अपनी बात बाखुबी मनवा लेते है।

जो भारतीय जनता पार्टी अपने चुनावी घोषणा पत्र में मंदिर मुद्दे को सबसे प्रथम पर रखती थी और जिसे पूरा करने के लिए पूरे देश में आडवाणी ने रथ यात्रा निकाला था। लोगों ने आडवाणी का स्वागत खून से तिलक लगा कर भी किए थे। जब वर्ष 1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री वी पी सिंह मंडल कमीशन की राजनीति कर रहे थे जब भाजपा ने कमंडल (राम मंदिर) की राग छोड़ कर अपना समर्थन वापस ले लिया था। आज नरेंद्र मोदी इस मुद्दे का विरोध कर रहे है भाजपा के घोषणा पत्र से आयोध्या मंदिर और धारा 370 को हटाने की वकालत कर रहे है।

सवाल यह उठता है कि जब वर्ष 1996 में तेरह दिन और 1998 से 2004 तक जो सत्ता का सुख भोगा है वह राम मंदिर के बदौलत ही थी। तो आज इस मुद्दे से समझौता क्यों ? दरअसल मोदी की छवि जो बनीं है वह विकास पुरुष के रूप में बनीं है। वह नहीं चाहते है कि संप्रदायिक नेता के रूप में उनका नाम जुड़े। गुजरात दंगे की दाग को वह मंदिर मुद्दा का विरोध कर के मिटाना चाहते है।

वर्ष 1990 से आयोध्या की सीट भाजपा के पास थी। लेकिन 2012 के उप्र में हुए विधान सभा चुनाव में यह सीट सपा के खाते में आ गई है। निष्चित रूप से जनता का आक्रोष देखा जा सकता है। वहां के लोग भी इस मुद्दे से तत्रस्त आ कर भाजपा का विरोध करना शुरू कर दिए है।

नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनने के लिए 272$ सीटें लानी होगी। ऐसे में मुस्लिम समुदाय के बिना यह संभव नहीं है क्योकि लोकसभा के 543 सीटें से 218 सीटों पर मुस्लिम समुदायों को प्रभाव है; इनमें से 35 सीटें ऐसे है जहां पर उनका मत 30 प्रतिषत से ज्यादा है। सीएसडीएस के आंकड़े पर नजर डाले तो वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में मुस्लिम समुदाय ने भाजपा को तीन प्रतिषत अधिक मत दिए है। ऐसे में मोदी का यह लालच है कि मंदिर मुद्दे का विरोध करने से मुस्लिम समुदाय इनके तरफ आकर्षित होंगे। लेकिन क्या मुस्लमान गुजरात दंगें को भूलाकर मोदी के तरफ रुख करेंगे यह कह पाना मुश्किल है।

सवाल यह उठता है कि जब वर्ष 1996 में तेरह दिन और 1998 से 2004 तक जो सत्ता का सुख भोगा है वह राम मंदिर के बदौलत ही थी। तो आज इस मुद्दे से समझौता क्यों ? दरअसल मोदी की छवि जो बनीं है वह विकास पुरुष के रूप में बनीं है। वह नहीं चाहते है कि संप्रदायिक नेता के रूप में उनका नाम जुड़े। गुजरात दंगे की दाग को वह मंदिर मुद्दा का विरोध कर के मिटाना चाहते है।

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