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बेंगलुरु – बेंगलुरु की ये सड़कें भले ही सोने की न बनी हो लेकिन यहां सीवर सोना उगलता है। बेंगलुरु के गार्डेन सिटी और आस-पास के अन्य इलाकों के गटर से सोना निकाला जा रहा है। लड़कों और आदमियों की टोली सुबह-सुबह जब इन सीवर के गटर में उतरती है तो लोगों को यही लगता है कि वे सफाई कर्मचारी है लेकिन असलियत ये नहीं है। इन गटरों में केवल घरों का सीवेज नहीं बहता है।

लड़कों और आदमियों की टोली सीवर के गड्ढों में उतरती है तो इन्हें तलाश रहती है-ऐलीमेंट-79 मतलब सोने की। सीवेज के इन गड्ढों से सुबह-सुबह कवर हटा दिया जाता है और सोने की तलाश में बड़ी संख्या में लड़कें अन्दर उतर जाते हैं। एवेन्यू रोड, कब्बनपेट, नागर्थपेट, एंचेपेट, सिद्दना लेन और किलारी रोड पर कुछ लड़के खड़े हो जाते है और वहां से गुजरने वालों को सिग्नल देते है कि वहां सीवेज का ढक्कन खुला हुआ है। लगभग 100 से ज्यादा की संख्या में मौजूद इन लड़कों को अक्सर लोग सफाई कर्मचारी ही समझते है।

इन सीवेज के गड्ढों में उतरे इन लड़कों की आंखों में चमक होती है और हाथ में एक मोटी सी झाड़ू। ये मैला ढ़ोने वाले बाकी सबसे अलग है।

दरअसल एवेन्यू रोड और इससे जुड़ी सड़कों पर जूलर्स का अड्डा है। यहां करीब 3000 से ज्यादा सुनारों की दुकानें है जो सोने की डिजाइन्स बनाकर शहर भर के जूलर्स शॉप्स को सप्लाई करते हैं। इन दुकानों से निकले कूड़ा जिसमें सोने की कतरने मिली होती है, सफाई के बाद सड़कों के इन सीवेज में बह जाता है और इसी की तलाश में ये लड़के सुबह-सुबह इकट्ठे हो जाते हैं।

45 सालों से सोने का काम कर रहे एम कृष्णाचारी कहते हैं, ‘जब हम सोना पिघलाते हैं, तो हर 10 ग्राम में से 1 ग्राम सोना कम हो जाता है। यह हमारे हाथ-पैरों में रह जाता है। हम जब हाथ-पैर धोते हैं तो यह गटर में बह जाता है।’

विश्वनाथ एंटीक डाइ वर्क्स के विश्वनाथ कहते हैं, यह बताना मुश्किल है कि ये लड़के रोज कितना सोना निकाल रहे हैं। सुनार कहते हैं, ‘यह वाकई किस्मत की बात है। कई बार जब हम अपने लोगों को पॉलिशिंग के लिए भेजते हैं, वे इसे अपनी जेब में रखते हैं और गुम कर देते हैं। हो सकता है, इन लड़कों को सोने के टुकड़े मिल रहे हों, लेकिन अक्सर गोल्ड पाउडर को धूल से अलग करना पड़ता है।’

बार टेंडर संतोष का कहना है, ‘हमें मैला फिल्टरिंग यूनिट तक लाने के लिए रोज 400 रुपए मिलते हैं। अगर सोने का कोई टुकड़ा मिल जाए तो इसे मार्केट रेट से थोड़ा कम दाम में खरीदने के लिए लोग भी हैं। कुछ घंटों के लिए यह काम बुरा नहीं है।’

संतोष के साथ ही 11 साल का अर्जुन भी काम करता है। संतोष सीवर में उतरता है तो अर्जुन बाहर रहता है। मैनहोल में ईंट लगाने पर इन लोगों को अक्सर स्थानीय लोगों की डांट भी सुननी पड़ती है, लोगों का कहना है कि इससे सीवर का प्रवाह बाधित हो जाता है।

24 साल के बाबू ने फिल्टरिंग स्टाफ डबल कर दिया है। उसका कहना है कि लोगों की संख्या बढ़ने से उसका काम प्रभावित हो गया है, अब मैले में से सोना ढूंढना मुश्किल हो गया है। बाबू के मुताबिक, ‘जब भीड़ कम थी तो हमें सोने के अलावा दूसरी धातु भी काफी मात्रा में मिल जाती थी। :-मुंबई मिरर

 

 

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