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महाराष्ट्र हिंसा के पीछे है इन दो लोगो का दिमाग ?

मुंबई ने मंगलवार को जो आफत झेली और बुधवार को पूर्ण बंद के मंजर के पीछे दो शख्स हैं जो पूरे राज्य में अराजकता फैलाने को किसी पुरस्कार के रूप में देखते हैं। भिड़े गुरुजी के नाम से मशहूर 85 वर्षीय संभाजी भिड़े और 56 साल के मिलिंद एकबोटे ने कोई पहली बार ‘हमारे और उनके’ बीच की जंग नहीं छेड़ी है।

साल 2008 में भिड़े राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में छा गए थे जब उनके समर्थकों ने फिल्म जोधा-अकबर रिलीज होने के विरोध में सिनेमा घरों में तोड़फोड़ मचाई थी। 2009 में उन्होंने अपने गृहनगर सांगली को पूरी तरह से बंद करा दिया था, जब एक गणेश मंडल में एक कलाकार की रचना को प्रदर्शित करने की अनुमति नहीं दी गई थी। कलाकार ने शिवाजी महाराज द्वारा आदिल शाह के सेना कमांडर अफजल खान की हत्या के बारे में अपनी धारणा को प्रस्तुत किया था।

एकबोटे के खिलाफ दंगा, बिना अनुमति के प्रवेश, आपराधिक धमकी और दो समुदायों के बीच घृणा फैलाने की कोशिश करने समेत 12 केस दर्ज हैं। इनमें से पांच मामलों में उन्हें दोषी करार दिया गया है। 1997 से 2002 के बीच पुणे में बतौर बीजेपी नगर निगम पार्षद के अपने पहला कार्यकाल के दौरान, वह हज हाउस के निर्माण मुद्दे पर एक मुस्लिम पार्षद के साथ मारपीट की थी।

इस बार, भिड़े और एकबोटे ने राज्य में हिंदुत्ववादी ताकतों को दलितों के खिलाफ खड़ा कर किया है। एक महार गोविंद गायकवाड़ की समाधि का अपमान करके वे ऐसा कर पाए। गोविंद गायकवाड़ को शिवाजी महाराज के पुत्र संभाजीराजे भोसले के अंतिम संस्कार का श्रेय दिया जाता है। उन्होंने उस समय में ऐसा कर दिखाया जब कोई भी संभाजीराजे भोसले के शव को छूने की हिम्मत नहीं कर सकता था। क्योंकि ऐसा करने से वह मुगलों के क्रोध का शिकार बन सकता था।

गोविंद गायकवाड़ की किवंदती को लेकर भिड़े और एकबोटे का कहना है कि यह अंग्रेजों की गढ़ी हुई कहानी है। भिड़े और एकबोटे का मानना है कि संभाजी भोसले का अंतिम संस्कार मराठों ने किया था और दोनों ने इन तथ्यों को स्थापित करने के लिए सरकारी अनुदान पर एक अध्ययन कराए जाने की मांग की है।

पुणे जिले के वाधू गांव स्थित समाधि को जिस समय में अपमानित किया है वह अपने आप में सारी कहानी बयां करती है। उन्होंने गोविंद गायकवाड़ की समाधि का अपमान 29 दिसंबर को किया, यह जानते हुए कि पहली जनवरी को वहां नजदीकी गांव भीमा-कोरेगांव में हजारों दलित इकट्ठा होंगे और ब्राह्मण शासक पेशवा बाजीराव द्वितीय की सेना के हारने का जश्न मनाएंगे। पेशवा को अंग्रेजों की सेना ने हारया था जिसमें ज्यादातर दलित शामिल थे।

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