भोपाल : इंडियन फेडरेशन ऑफ मीडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष राधावल्लभ शारदा ने महाराष्ट्र में पत्रकार सुरक्षा कानून बनाये जाने पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस को बधाई देते हुये कहा कि देश में पहले मुख्यमंत्री है, जिन्होंने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की चिंता की। महाराष्ट्र में वर्षों से लंबित कानून को अमली जामा पहनाने में राजनेता डर महसूस करते थे तथा उनके मन में भय था कि इस कानून के बनने से मीडिया की ताकत में इजाफा हो जायेगा।

सारे कयासों को दरकिनार करते हुये फडणवीस सरकार ने जो फैसला लिया वह सराहनीय है। महाराष्ट्र सरकार के कदमों का अनुसरण अन्य सरकारों को भी करना चाहिए। एम.पी.वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन के प्रदेश अध्यक्ष राधावल्लभ शारदा पिछले दस वर्षों से मध्यप्रदेश सरकार के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से पत्रकार सुरक्षा कानून बनाने की मांग कर रहे है। जन जागरण के लिये लगभग 20 हजार किलोमीटर की यात्रा की तथा प्रत्येक जिले में बैठकें की। इतना ही नहीं इंदौर प्रेस क्लब में पत्रकार सुरक्षा कानून बनाने की मांग को लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस ली थी।

प्रदेश के मुख्यमंत्री ने एक बार पत्रकार द्वारा पत्रकार सुरक्षा कानून बनाये जाने के प्रश्न का उत्तर देते हुये कहा था कि बनाया जायेगा। परन्तु अभी तक धरातल पर कुछ नहीं दिख रहा है। मध्यप्रदेश सरकार से हमारी मांग है कि महाराष्ट्र सरकार का अनुसरण कर कानून बनाया जाये। मध्यप्रदेश सरकार कानून में प्रावधान रखें कि पत्रकार की शिकायत करने वाले की इस बिंदु पर जांच की जाये कि आखिर उसने पत्रकार की शिकायत क्यों की तथा शिकायतकर्ता के काम-धंधों की भी जांच होना चाहिए। जिससे यह स्पष्ट हो जायेगा कि दोषी कौन है।

महाराष्ट्र सरकार में बने कानून में सजा के प्रावधान
पत्रकारों, मीडिया संस्थानों के साथ कांट्रैक्ट पर काम करने वाले पत्रकारों पर हमला करना गैरजमानती अपराध होगा। इसके लिए तीन साल तक सजा और 50 हजार तक जुर्माना भी लगाया जाएगा। हमला करने वाले को इलाज का खर्च और मुआवजा भी अदा करना होगा। मुआवजा न देने पर आरोपियों के खिलाफ दीवानी न्यायालय में मुकदमा चलाया जाएगा।

झूठी शिकायत करने पर मिलेगी सजा
विधेयक में कानून का दुरुपयोग रोकने का भी प्रावधान है। यदि जांच में शिकायत झूठी पाई गई तो पत्रकार के खिलाफ भी मामला दर्ज कर कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

बारह साल से की जा रही थी मांग
महाराष्ट्र में पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग 2005 से ही हो रही थी। तत्कालीन गृहमंत्री दिवंगत एनसीपी नेता आरआर पाटिल ने पत्रकारों की सुरक्षा से जुड़ा कानून बनाने का वादा किया था। इसको लेकर नारायण राणे की अध्यक्षता में समिति गठित की गई थी, लेकिन कांग्रेस-एनसीपी की गठबंधन सरकार इस कानून को पारित करने में टालमटोल करती रही।