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भगवान के माल से प्रशासन माला माल और भगवान बदहाल

mandla templeमंडला- आदिवासी बाहुल्य मंडला जिले के करिया गाँव में अमीर भगवान के बदहाली में रहने का अजीबोगरीब मामला सामने आया है। दरअसल गाँव में भगवान शिव का प्राचीन मंदिर है और इस मंदिर के नाम पर करीब 160 एकड़ जमीन है।

हैरत की बात यह है कि मंदिर और भगवान की देखरेख और पूजापाठ के नाम पर प्रशासन द्वारा हर साल मंदिर की जमीन को लाखों रुपयों में नीलाम किया जाता है लेकिन नीलामी में मिले लाखों रुपयों से एक रूपये भी मंदिर और भगवान पर खर्च नही किया जाता है। आलम यह है कि मंदिर की हालत जर्जर हो चुकी है। जगह जगह से दरारें भी निकल आयी है। भगवान शिव के इस प्राचीन मंदिर से जहाँ गाँव के लोगों की आस्था जुडी हुई है वहीँ प्रशासन द्वारा मंदिर और भगवान की उपेक्षा किये जाने से ग्रामवासियों में आक्रोश व्याप्त है।

साधारण सा दिखने वाले प्राचीन शिव मंदिर के नाम पर अरबों की बेशकीमती संपत्ति तो जरूर है मगर देखरेख के अभाव में मंदिर की हालत जर्जर हो चुकी है। कैलाश पटेल सहित अन्य ग्रामीणों का आरोप है कि मंदिर के देखरेख और भोलेनाथ की पूजापाठ के नाम पर हर साल प्रशासन द्वारा जमीन की नीलामी तो की जाती है लेकिन नीलामी से मिलने वाले लाखों रुपयों का एक हिस्सा भी न मंदिर में लगाया जाता है और न ही भगवान के पूजापाठ में खर्च किया जाता है।

ग्रामीणों ने मंदिर की मरम्मत और मंदिर में विराजे भोलेनाथ की पूजापाठ के लिये पुजारी की व्यवस्था के लिये कई बार जिलाप्रशासन से शिकायत भी की है लेकिन मंदिर से हर साल लाखों रूपये कमाने वाला प्रशासन मूकदर्शक बना हुआ है। राधा कृष्ण मंदिर ट्रस्ट की करीब आधी ज़मीन पर अतिक्रमणकारियों ने कब्ज़ा कर रखा है। हेरत की बात तो यह है कि जिस गाँव का यह ट्रस्ट है उस ट्रस्ट में एक भी स्थानीय ग्रामीण नहीं है।
स्थानीय जानकार पीयूष पांडेय बताते हैं कि सैंकड़ों वर्षों पूर्व गाँव के मालगुजार बोधन पटेल ने इस मंदिर का निर्माण कराया था। उनका कोई बेटा नहीं होने के कारण अपनी सारी चल और अचल संपत्ति मंदिर के नाम कर ट्रस्ट बनाया था ताकि आगे चलकर मंदिर और भगवान शिव की देखरेख और पूजापाठ में कोई दिक्कत न आये। बोधन पटेल के निधन के बाद ट्रस्ट का मालिकाना हक जिला प्रशासन के पास है। ट्रस्ट का अध्यक्ष पदेन कलेक्टर और प्रशासक की जवाबदारी पदेन तहसीलदार मंडला की हैं। नीलामी के जरिये मंदिर की जमीन खरीदने वाले किसान भी प्रशासन के इस रवैये से हैरान हैं।

नीलामी में ज़मीन लेने वाले कृषक आत्माराम ने बताया कि प्रशासन जमीन के बदले उनसे तुरंत रूपये जमा करा लेता है लेकिन जिस मंदिर की जमीन के नाम पर प्रशासन को हर साल लाखों रूपये मिलते हैं उसी मंदिर में एक रूपये भी खर्च नहीं किया जाता है।
इस पूरे मामले में मंडला तहसीलदार कमलेश राम नीरज जो ट्रस्ट के प्रशासक भी है का कहना है कि मंदिर की जमीन से प्रतिवर्ष मिलने वाली आय करीब साढ़े सात लाख रूपये को जमीन के सुधार कार्य जैसे समतलीकरण, मेड बंधान, जल व्यवस्था आदि कार्यों में खर्च किया जाता है। इसके अलावा मंदिर की देख रेख व पूजा – पाठ में भी नीलामी से मिलने वाली राशि खर्च की जाती है। मंदिर में प्रशासन ने कितना पैसा खर्च किया है जिसका अंदाज़ा मंदिर की तस्वीरों को देखकर बड़ी आसानी से लगाया जा सकता है।

रिपोर्ट- @सैयद जावेद अली

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