स्वच्छता का सन्देश देती – अनोखी परम्परा

खंडवा – अक्सर आपने देखा होगा की खान-पान के आयोजन में लोग जूठी सामग्री उठाने से कतराते है , और जब बात जूठी हो चुकी पत्तलों को उठाने की हो , तो हर कोई एक दूसरे का मुंह देखता है। और इस बात की आशा करता है की कोई दुसरा आकर इस कार्य को करे , लेकिन हम आपको बताने जा रहे है एक ऐसी ही अनोखी परम्परा के बारे में , जहाँ जूठी पत्तलों को उठाने के लिए बोली लगाई जाती है , बोली में सर्वाधिक रूपये देने वाले व्यक्ति और उसके परिजनों को ही जूठी पत्तलों को उठाने अधिकार होता है । अर्थात जूठन को उठाने और साफ़ -सफाई करने वाला व्यक्ति ,अपने कार्य के एवज में समाज को पैसा देता है।

message to sanitation - unique traditionमध्यप्रदेश में रहने वाले प्रत्येक समाज में आपको एक ना एक ऐसी अनोखी परम्परा जरूर मिलेगी , जो उस समाज के पुरखों ने समाज सुधार के लिए बनाई थी , समाज की वर्तमान पीढ़ी आज भी ऐसी अनोखी परम्पराओं का बखूबी निर्वाह कर रही है। आज हम आपको बताने जा रहे है , मध्यप्रदेश के खंडवा में रहने वाली गुरवा समाज की परम्परा के बारे में , जहां स्वच्छ्ता का सन्देश देती – एक अनोखी परम्परा पिछले कई वर्षों से निभाई जा रही है। सामूहिक भोज के बाद जूठी हो चुकी पत्तल को उठाने की परम्परा। हेय समझे जाने वाले इस कार्य को समाज की एक परम्परा ने सम्मान का रूप दे दिया , और यह नियम बनाया की जूठी हो चुकी पत्तलों को उठाने के लिए मंच से बोली लगाई जायेगी , समाज का जो व्यक्ति सबसे उची कीमत की बोली लगाएगा , जूठी हो चुकी पत्तलो को उठाने का अधिकार उसको और उसके परिजनों को होगा , जब पहली पंगत भोजन करने बैठती है तो उनके भोजन पश्चात की झूठी पत्तलो को उठाने की जिसने बोली लगाई थी वही उस पंगत की पत्तल उठाता है , सोमनाथ काले ने बताया की समाज ने एक और व्यवस्था कर रखी है , वह यह की सामूहिक भोज में जब दूसरी बार पंगत बैठेगी , तो उसकी पत्तलो को उठाने के लिए अलग बोली लगेगी , इस तरह यह बोली बार-बार लगाईं जाती है। जिससे हर बार नए व्यक्ति को सेवा कार्य करने का अवसर मिलता है ,

इस परम्परा की शुरुआत चैत्र मॉस की नवरात्रि से हुई , निमाड़ में गणगौर का पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है , जिसके समापन पर माता के नाम से भंडारे आयोजित किये जाते है , खासतौर पर कन्या को भोजन कराने की प्रथा प्रचलित है , कन्या अर्थात छोटी बालिका को देवी स्वरूप में पूजा जाता है , उन्हें भोजन कराने के बाद , उन्हें जिस पत्तल में “प्रसाद स्वरूप” भोज कराया जाता है , उसे उठाने पर पुण्य लाभ की प्राप्ति होती है , ऐसी धार्मिक मान्यता के चलते भंडारे में पत्तल उठाने के लिए आपस में होड लगने लगी , तो समाज के बुजुर्गों ने अनोखी परम्परा ईजाद करते हुए , जूठी पत्तलों को उठाने के लिए बोली लगाना शुरू कर दी। तब से यह परम्परा आज भी चली आ रही है , फर्क सिर्फ इतना है की अब भंडारे में वाले सभी भक्तों की जूठी पत्तल उठाने के लिए बोली लगाई जाती है। सोनू गुरवा ने बताया की जिसे बोली के जरिये जूठी पत्तलों को उठाने का अवसर मिलता है , वह अपने को भाग्यशाली समझता है। बोली से मिलने वाली राशि सामाजिक आयोजन में खर्च की जाती है ,

इस अनोखी परम्परा से समाज को प्रत्याशित -अपत्याशित लाभ मिला , एक तो समाज में स्वच्छ्ता के लिए लोग जागरूक हुए , दूसरे उससे समाज आय भी होने लगी। और हेय समझे जाने वाला कार्य सम्मान में बदल गया।

रिपोर्ट :- अनंत माहेश्वरी

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