खंडवा : इस्लामी साल का पहला महीना यानि मुहर्रम हजरत इमाम हसन – हुसैन की याद में मनाया जाता हैं। आप ही के दिन सचाई और ईमानदारी पर कायम रहते हुए इमाम हुसैन ने अपनी जान कुर्बान कर दी थी। तब से हर बरस इमाम हसन – हुसैन की याद में शहादत का यह पर्व मनाया जाता हैं। लेकिन इसबार कोरोना महामारी के चलते इस पर्व पर भी असर पड़ा हैं। भारत में यह पर्व गंगा जमुनी तहजीब की मिसला कायम करता हैं। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी आज इमाम हुसैन शहादत को किया याद, उन्होंने कहा कहा- उनके लिए इमाम हुसैन न्याय सर्वोपरि था।

मुहर्रम का महीना शुरू होते ही भारत और भारत के पडोसी मुल्कों में ताजियादारी का सिलसिला शुरू जाता हैं। इमामबाड़ों में मर्सिया पढ़े जाते हैं।कहीं छबील पिलाया जाता हैं तो कहीं लंगर खिलाया जाता हैं। मुहर्रम का यह पर्व शहादत से जुड़ा हुआ हैं इस माह में शिया मुसलमान मातम करते हैं। भारत में ताजियादारी हिन्दू मुस्लिम एकता का प्रतीक हैं। आज भी कई हिन्दू ताजिया बनाते हैं तो कई लोग ताजिया बनाने में मदद करते हैं। खंडवा के चौधरी परिवार में ताजिया बनाने के सिलसिला लगभग 70 से भी पुराना हैं। चौधरी परिवार को आज भी ताजिया बनाने और प्रसाद के लिए हिन्दू लोग मदद करते हैं। हर बार यह 8 से 10 फिट का ताजिया बनाते थे लेकिन covid 19 के चलते इसबार इन्होने थर्माकॉल शीट की मदद से छोटा ताजिया बनाया हैं। इतना ही नहीं लगभग 21 बरस पहले इनके भाई की मन्नत पूरी होने पर इन्होंने चाँदी का ताजिया बनाया था जो आज भी मुहर्रम में जियारत के लिए रखा जाता हैं। पेशे से वकील वाहिद चौधरी बताते हैं कि आज भी मुहर्रम में चढ़ावा और प्रसाद हिन्दू समाज के लोगों की और से ही आता हैं। इतना ही नहीं कई हिन्दू यहाँ आकर अपनी मुरादें मांगते है जो पूरी होती हैं।

कहारवाड़ी के रियाज पठान ने बताया पठानों के इमामबाड़े में रखा बुराख़ वाला ताजिया खंडवा के सबसे खूबसूरत ताजियों में सुमार होता हैं। लेकिन इसबार इसके दर्शन करने वाले कोरोना महामारी के चलते नहीं आ पाए ऐसे में इस ताजिये के दर्शन वीडियो कॉल के जरिए कराए गए।