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नर्मदा किनारे बने मंदिरों का ऐतिहासिक महत्व नहीं !

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बड़वानी- नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण द्वारा नर्मदा के तटों पर स्थित मंदिरों को ऐतिहासिक महत्व का न बताने का ब्यौरा देने की रिपोर्ट की जानकारी के बाद नर्मदा बचाओ आंदोलन कार्यकर्ताओं ने इसे धार्मिक भावनाएं आहत करने वाला बताया।

आंदोलन की ओर से जारी विज्ञप्ति में इन्होंने इसका विरोध भी किया है। नर्मदा बचाओ आंदोलन के राहुल यादव, भागीरथ कवछे और भागीरथ धनगर ने बताया कि नर्मदा घाटी में सरदार सरोवर डूब क्षेत्र में क्या कोई राष्ट्रीय महत्व का मंदिर नहीं है। ऐसे दावे कर एनसीए लोगों की धार्मिक भावनाओं के साथ खिलवाड़ कर रहा है।

इन्होंने बताया कि सरदार सरोवर क्षेत्र में बड़वानी, धार, खरगोन व अलीराजपुर जिलों के 244 गांव व 1 नगर बसे हुए हैं। इसमें से कुछ गांव जो पहाडी में हैं, वो खाली हुए हैं। वर्तमान में पश्चिम निमाड़ में करीब 125 गांव वहीं बसे हुए हैं, जहां पहले से लोग रह रहे हैं। इन मूलगांव में ही कई सार्वजनिक स्थल, सांस्कृतिक केंद्र, हजारों घर, खेत तथा लाखों पेड़ हैं। इनमें कई मंदिर और मस्जिद तो ऐसे हैं, जो सदियों पुराने हैं। नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण की 2016 में हुई बैठक में अनेक पर्यावरणीय और मंदिरों के स्थानांतरण की बात हुई है।

इसकी रिपोर्ट अब सामने आई तो एनसीए ने ये ब्योरा दिया कि नर्मदा घाटी में सरदार सरोवर के डूब क्षेत्र में 260 मंदिर तथा 151 धर्मशाला है, लेकिन उसमें से एक भी मंदिर राष्ट्रीय महत्व का नहीं है।

आंदोलन कार्यकर्ताओं ने इस पर सवाल खड़े किए हैं कि डूब क्षेत्रों में स्थित 100 साल से भी अधिक पुराने मंदिरों का कोई राष्ट्रीय महत्व नहीं है। इन्होंने बताया कि चिखल्दा के नीलकंठेश्वर महादेव मंदिर, पशुपति महादेव व बोधवाड़ा देवपथ शिवलिंग मंदिर आज भी धार्मिक आस्था का केंद हैं। ये ग्रामीणों के लिए अमूल्य धरोहरें हैं। शासन नमामी नर्मदा यात्रा निकाल रहा है तो फिर इन सांस्कृतिक धरोहरों का महत्व क्यों नहीं समझा जा रहा।




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