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पुण्य तिथि पर चित्रकार हैदर रज़ा को श्रद्धांजलि

मंडला – मशहूर चित्रकार पद्म विभूषण हैदर रज़ा की पहली पुण्य तिथि पर स्थानीय कब्रिस्तान पहुंचकर उनके चाहने वालों ने श्रद्धांजलि दी। उनकी पुण्य तिथि पर उनके ही रज़ा फाउंडेशन द्वारा रज़ा स्मृति समारोह के रूप में मनाया गया,इसमें नर्मदा तट पर चित्रकला कार्यशाला का आयोजन किया गया। जिसका समापन सुश्री कलापिनी कोमकली के निर्गुण गायन से किया गया।
हैदर रज़ा की प्राथमिक शिक्षा मंडला जिले के छोटे से गाँव ककैया में हुई,अपनी विशिष्ट बिंदु शैली की प्रेरणा हैदर रज़ा को इसी स्कूल से मिली थी। हैदर रज़ा ने प्राथमिक शिक्षा मंडला से हासिल कर दमोह जिले से हाईस्कूल उत्तीर्ण किया। चित्रकारी के शौंक के चलते उच्च शिक्षा हासिल करने के लिये उन्होंने नागपुर कालेज में दाखिला लिया इसके बाद वो मुंबई पहुंचे और उनकी कला और प्रतिभा को देखते हुये उन्हें फ्रेंच स्कॉलरशिप पर फ्रांस जाने का मौका मिला। यहां उनकी कला को नया निखार मिला। फ्रांस उनको इतना भाया कि वो 60 साल तक पेरिस में रहे लेकिन इस दौरान भारत आते जाते रहते थे। वे अपने को इंडियन फ्रेंच और फ्रेंच इंडियन मानते थे,उनका कहना था कि चित्रकारी कैसे करना है ये उन्हें फ्रांस ने सिखाया लेकिन क्या चित्रकारी करना है यह भारत ने सिखाया।
फ्रांस में उन्होंने शोहरत की नई बुलंदियों को छुआ इसके बावजूद वो मंडला की माटी और नर्मदा का किनारा कभी नहीं भूले। उन्हें पेरिस के साथ साथ कई यूरोपीय और अमेरिकी विश्व विद्यालयों में चित्रकारी के गुर सिखाने बुलाया जाता था।भारत सरकार ने उन्हें तीनों पद्म सम्मान से सम्मानित किया है लेकिन भारत रत्न से वे वंचित रहे हालांकि फ़्रांस सरकार ने उन्हें सर्वोच्च नागरिक सम्मान से सम्मानित किया था। हैदर रजा को उनकी इच्छा  मुताबिक मंडला कब्रिस्तान में उनके पिता के कब्र के पास सुपुर्द ए ख़ाक किया गया ।
हैदर रजा मंडला से प्राथमिक शिक्षा हासिल करने के बाद उन्होंने दमोह से हाई स्कूल पास कर उन्होंने नागपुर स्कूल ऑफ आर्ट और जे जे स्कूल ऑफ आर्ट मुम्बई से कला की पढ़ाई की। 1950 मे वे पेरिस चले गए और वही विवाह कर बस गए लेकिन इस दौरान उन्हें भारत की नागरिकता नही छोड़ी। भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री, पद्मभूषण और पद्मविभूषण जैसे सम्मानों से नवाजा। फ्रांस मे उन्हें वहां का सर्वोच्च नागरिक सम्मान प्रदान किया गया। पेंटिंग मे बिंदु शैली ईजाद करने वाले हैदर रज़ा की प्रसिद्धि का अंदाज़ इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनकी पेंटिंग “ला टेरे” 18 करोड़ 61 लाख और “सौराष्ट्र” 16 करोड़ 42 लाख रुपये मे बिकी थी।

@सैयद जावेद अली 
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