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असादुद्दीन ओवैसी भारी पड़े राज ठाकरे पर

Owaisi VS Raj Thakre

नई दिल्ली [ TNN ] महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में ‘बाहरी’ कही जा रही हैदराबाद के सांसद असादुद्दीन ओवैसी की पार्टी मजलिस-ए-इतेहादुल मुस्लिमीन ने शानदार एंट्री करते हुए दो सीट जीत कर सबको चौंका दिया है। जबकि मराठा मानुष की राजनीति करने वाले राज ठाकरे की पार्टी मनसे एक सीट पर सिमट गई।

ओवैसी की पार्टी एमआईएम ने औरंगाबाद मध्य और मुंबई में बाईकुला सीट पर क्रमश: शिवसेना और भाजपा के प्रत्याशी को हराया। पूर्व पत्रकार इम्तियाज जलील औरंगाबाद मध्य से जीते तो बाईकुला सीट से एमआईएम प्रत्याशी वारिश युसुफ पठान जीते।

एमआईएम ने कुल 24 सीटों पर चुनाव लड़ा जिसमें उसे 2 पर जीत मिली जबकि राज ठाकरे की पार्टी ने 219 प्रत्याशी उतारे थे जहां केवल एक सीट नसीब हुई। मनसे की ओर से जुन्नार में केवल एस बी सोनावाणे ही जीत हासिल कर सके। 2009 विस चुनाव में मनसे ने 13 सीटें जीती थीं।

2006 में शिवसेना से अलग होकर महाराष्ट्र नव निर्माण सेना (मनसे) का गठन करने के बाद यह उनका तीसरा प्रमुख चुनाव था। लेकिन इस बार भी उनके नाम के अलावा मनसे में लोगों को ऐसा कुछ नहीं दिखा, जिससे कि उन्हें वोट देते।

पिछली बार तो भी उन्हें महाराष्ट्र विधानसभा में 13 सीटें मिली थीं, लेकिन इस बार भाजपा-शिवसेना गठबंधन टूटते ही यह लगभग तय हो चुका था कि मनसे सर्वाधिक नुकसान उठाने वाली है।

मनसे सबसे नई और कम अनुभवी थी, जिसका खामियाजा उसे भुगतना पड़ा। जानकारों के मुताबिक राज की सबसे बड़ी ताकत उनका व्यक्तिगत करिश्मा है, जिसने कार्यकर्ताओं को उनसे जोड़कर रखा है।

उनकी लोकप्रियता का आलम यह है कि चुनावों से पूर्व राज्य के भावी मुख्यमंत्री के सवाल को लेकर हुए सर्वे में पृथ्वीराज चव्हाण और उद्धव ठाकरे के बाद राज सबकी पसंद थे। लेकिन मनसे की सबसे बड़ी समस्या यह है कि उसके पास राज के अलावा कोई और मजबूत नेता नहीं है।

नई पार्टी होने के कारण राज का संगठन भी पूरे राज्य में खड़ा नहीं हो पाया है। राज के मजबूत गढ़ मुंबई, पुणे और नासिक माने जाते हैं। लेकिन इस बार वे ढहते नजर आए। सबसे खराब स्थिति तो नासिक में रही, जहां मनसे सभी 15 विधानसभा सीटों पर हार गई।

पार्टी सूत्रों की बात पर विश्वास करें तो लोकसभा चुनावों में मिली बुरी हार के बाद से पार्टी कार्यकर्ताओं का उत्साह एकदम ठंडा पड़ गया था। मुख्यमंत्री पद की दावेदारी पर राज के डांवांडोल रुख से कार्यकर्ता असमंजस में थे।

उत्तर भारतीय विरोधी छवि के साथ राज इन चुनावों के बाद बिल्कुल अकेले पड़ गए हैं। ऐसे में अब राज के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने संगठन को नए सिरे से जमाने की है।

अगर भविष्य में उन्हें हाशिये पर नहीं रह जाना है तो नई शुरुआत करनी होगी। चुनाव से पूर्व माना जा रहा था कि राज अगर किंग नहीं भी बनते हैं तो कम से कम किंगमेकर की भूमिका में जरूर रहेंगे।- एजेंसी

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