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Tuesday, April 16, 2024

‘हिंदी दिवस’- क्यों एक दिन के सम्मान में सीमित हो गई हमारी राष्ट्र भाषा


हिंदी भाषा को पूर्ण भावात्मक लिपि यानी भाव से परिपुर्ण कहा गया है। दुनिया मे और कोई दूसरी भाषा ऐसी नही जोकि आपकी भावनाओं को दर्शा सकें।

अंग्रेजी भाषा के बढ़ते चलन और हिंदी की अनदेखी को रोकने के लिए 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने एकमत होकर यह निर्णय लिया की हिंदी ही भारत की राष्ट्र भाषा होगी।

इस महत्वपूर्ण निर्णय के महत्व को प्रतिपादित करके तथा हिंदी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा के अनुरोध पर 1953 से संपूर्ण भारतवर्ष में 14 सितंबर को प्रत्येक बर्ष हिंदी दिवस के रुप में मनाया जाने लगा।

किसी भी राष्ट्र की पहचान उसकी भाषा और उसकी संस्कृति से होती है। आप कही भी जाऐ हर देश की एक अपनी भाषा और अपनी एक अलग संस्कृति है। वही भारत में सबसे ज्यादा बोली जानें वाली हमारी मातृभाषा हिंदी है। जिसको हमारे देश के लगभग ७७% लोग हिंदी लिखते, पढ़ते, बोलते और समझते हैं।

वैसे तो हमारी मातृभाषा हिंदी को दर्जा आजादी के ठीक दो साल बाद १४ सिंतबर1949 को मिला और उस दिन को ही हिन्दी-दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।

हालांकि इससे पहले विश्व में हिन्दी प्रचारित- प्रसारित करने के उद्देश्य से विश्व हिन्दी सम्मेलन का आयोजन आरंभ किया गया था। प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन १० जनवरी, १९७५ को नागपुर में आयोजित हुआ था। अत: १० जनवरी का दिन ही विश्व हिन्दी दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया।

हिंदी भाषा की खास बात यह है कि इसमें जिस शब्द को जिस प्रकार से उच्चारित किया जाता है, उसे लिपि में लिखा भी उसी प्रकार जाता है। 14 सितंबर, 1949 के दिन हिंदी को राजभाषा का दर्जा मिला। देश के 77% लोग हिंदी लिखते, पढ़ते, बोलते और समझते हैं। हिंदी उनके कामकाज का भी हिस्सा है।

हिन्दी दिवस सभी विद्यालयों, महाविद्यालयों, शिक्षण संस्थानों में पूरे विश्वास के साथ मनाया जाता है। उस दिन सभी अध्यापक अपने विद्यर्थियों को हिन्दी दिवस पर हिन्दी भाषा के बारे में भाषण देते हुए हिन्दी दिवस की शुभकामनाएं देते है और विद्यार्थियों को हिन्दी मे भाषण बोलने व लिखने को कहा जाता है और यही सिलसिला प्रत्येक शिक्षण संस्थानों में प्रत्येक बर्ष किया जाता है।

हिन्दी माध्यम के विद्यार्थियों को हिन्दी दिवस यानी 14 सितंबर आने का इंतजार रहता है, लेकिन दिलचस्प बात यह है कि अंग्रेजी माध्यम विद्यालयों के विद्यार्थियों के लिए यह दिन एक पर्व के रूप में नही वल्कि एक दण्ड के रूप में आता है।

अंग्रेजी माध्यम के विद्यर्थियों में हिंदी बोलने व लिखने का ज्ञान हिंदी माध्यम के विद्यार्थियों की अपेक्षा काफी कम होता है।

जिस कारण उन्हें हिन्दी दिवस कुछ खास रास नही आता, और हिन्दी मे भाषण देना तक तो ठीक है लेकिन हिन्दी भाषा मे कुछ लिखवाना उनके लिए दण्ड देने के समान होता है और दिलचस्प है कि ऐसा हर साल होने के बाद भी कुछ भी बदलाव नही होता।

फिर भी कम से कम दिन के लिए ही सही अंग्रेजी माध्यम के विद्यार्थियों को हिन्दी बोलने के लिए प्रेरित तो किया जाता है। इस दिवस को हम सिर्फ़ साल में एक बार ही मानते है हिन्दी भाषा की महत्वत्ता जर्जर होती जा रही है।

हम सब हिंदी दिवस को मनाते है लेकिन यह कभी नही सोचते कि आख़िर क्यो हमे इस दिवस को मनाने की ज़रूरत पड़ी। क्यों हम अपनी ही मातृभाषा को बोलने को बोलने की लिए कोई दिन निश्चित करें, क्यो हमसे हमारी ही भाषा को छीन लिया गया, क्यों आज हमें अपनी भाषा को बोलने में शर्म आती है क्यों ? शायद इसका जबाब किसी के पास नही है

हिंदी दिवस वाले दिन बड़े-बड़े भाषणों में बड़े-बड़े पंडालों में खड़े होकर हिंदी भाषा को संबोधित करते हैं। उसका महत्व बताते हैं फिर क्यों नहीं पूरी साल उसका पालन किया जाता है। क्यों हमारी हिंदी भाषा डरी डरी सहमी सी बन चुकी है।

हम अपनी बात हिंदी में खुलकर कह सकते फिर क्यों हम अंग्रेजी में वार्तालाप करें, क्यों अंग्रेजी माध्यम के अध्यापक हिन्दी माध्यम के विद्यार्थी को हीन भावना से देखते है।

केवल अंग्रेजी ना बोलने पर क्यों हम उसकी तुलना कमजोर विद्यार्थियों में कर क्यो। उनका उपहास किया जाता है और फिर 1 दिन सिर्फ 1 दिन के लिए क्यों हम महान बन जाते हैं।

क्यों हम अपने भाषणों में हिंदी का व्याख्यान करते हैं क्यों हम उसी दिन सिर्फ हिंदी बोलते हैं यह सिर्फ एक औपचारिकता नही तो फिर और क्या है इस औपचारिकता को वास्तविकता में बदलने की जरूरत है।

@संदीप चंद्रा

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