मुंबई महानगरीय रेल सेवा और सरकारी उदासीनता

mumbai Local trainsमुंबई नगरीय रेल सेवा में प्लेटफॉर्म और बोगी के बीच समानांतर गैप के कारण लगातार हो रहे मानवीय हादसों को देखते हुए जनवरी 2014 में बांबे हाईकोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए रेल मंत्रालय को आदेश दिया था कि वह सभी प्लेटफार्मों की ऊंचाई बढ़ाए ताकि मुंबई नगरीय ट्रेन सेवा के यात्रियों की जान माल की हानि को रोका जा सके और सुरक्षित यात्रा का विश्वास बहाल किया जा सके।

मुंबई में 273 प्लेटफार्म मध्य रेलवे के अंतर्गत हंै तो 145 प्लेटफाम पश्चिमी रेलवे के अधीन है। पहले चरण में मध्य रेलवे ने 83 प्लेटफार्म और पश्चिमी रेलवे के 145 प्लेटफॉर्म का उद्धार कार्य मई 2016 तक पूरा होना था लेकिन अभी तक केवल 51 प्रतिशत प्लेटफार्म का ही कार्य पूर्ण हो सका है यह दोनों जोनल रेलवे की जिम्मेदारी है कि वह हाईकोर्ट के आदेशों को अमली जामा पहनाएं।

दूसरी ओर रेल मंत्रालय का कहना है कि उसके पास कार्य कराने के लिए अधिकतम मात्र तीन घंटे का समय रोजाना निकल पाता है ऐसे में समयबद्धता के साथ कार्य करने में परेशानी है। पिछले दस वर्षो के दौरान मुंबई नगरीय रेल सेवा में यात्रा के दौरान 124 यात्रियों की जान जा चुकी है जबकि 564 यात्री घायल हुए हैं। यह वारदातें प्लेटफार्म और बोगी के बीच दूरी के कारण हुई हैं। मुंबई नगरीय रेल सेवा में सिमेंस कोच की सेवाएं ली जा रही हैं जिसका निर्माण इंटीग्रल कोच फैक्ट्री चेन्नई में किया गया है।

इन कोचों के सेवा में आने के बाद यात्री समूह और एसोसिएशन ने दावा किया है कि रोजाना औसतन एक दर्जन लोगों की मौत और दो दर्जन से ज्यादा घायल होते हैं। इस तरह 8000 से लेकर 10,000 मानव मौतें हर साल हो रही हैं। सभी संगठनों का कहना है कि कोच और प्लेटफार्म के बीच खतरनाक दूरी होने के कारण ये घटनाएं घटित हो रही हैं।

जहां तक रेलवे में मुआवजा दावा निराकरण का प्रश्र है 2005 से 15 तक की अवधि में 11032 मुआवजा दावा विभिन्न रेलवे दावा अधिकरणों में दर्ज हुए लेकिन इसमें से केवल 7240 मामलों का ही निपटारा किया जा सका है। यह सरकार की उदासीनता ही कही जाएगी कि मुआवजा दावा में से भी 35 प्रतिशत मामले अभी तक निपटाए जा सके हैं यानी 3792 क्लेम अब तक पेंडिंग हैं।

अगर अखिल भारतीय स्तर पर देखा जाए तो पिछले पांच वर्षों के दौरान रेलवे ने 13.65 करोड़ का मुआवजा प्रदान किया है। यह मुआवजा दावा उन यात्रियों के थे जो या तो यात्रा के दौरान या घायल हुए थे या दुर्घटना में मारे गए थे। मुआवजा समय पर नहीं मिलने का प्रमुख कारण यह है कि सरकार के पास वह आधारभूत संरचना उपलब्ध नहीं है जो समय पर मृतक यात्रियों के आश्रितों को मुआवजा प्रदान कर सके या त्वरित निर्णय कर सके। बड़े अंतर का सवाल ऐसा कारक है जो कंपेसेशन क्लेम को एक घायल या मृतक यात्री के संदर्भ में रेलवे की संबंधित ईकाई की कार्यप्रणाली को प्रदर्शित करता है।

रेलवे को अपनी संस्थागत कमजोरियों को दूर करके अपने तंत्र में ऐसा सुधार लाना चाहिए कि उसे किसी प्रकार ऐसी दुर्घटना जैसी स्थिति पैदा न हो और अगर ऐसा हो भी जाए तो उसका निदान समय पर हो जाए जैसे मृतक के मामले में ज्यादा देर नहीं किया जाना चाहिए। ऐसे दावों का अभिकरणों में धूल फांकना सरकार की निष्क्रियता को ही प्रदर्शित करता है। ऐसे मामलों का निपटारा एक नियत समय में किया जाना चाहिए।

रेलवे ने रेल सेवा में सुधार के लिए पर्याप्त संख्या में सीसीटीवी कैमरे लगाने की योजना बनाई है जो कि देश के विभिन्न रणनीतिक महत्व वाले रेलवे स्टेशनों पर लगाए जाने हैं। खासकर मुंबई में अतिव्यस्त रेलवे स्टेशनों पर जहां संसार में सबसे ज्यादा रेल यात्री रोजाना एक नया रिकार्ड बनाते हैं।

मुंबई की लाइफ लाइन कही जाने वाली महानगरीय रेल सेवा का विस्तार 465 किलोमीटर में है और यहां रोजाना 2342 ट्रेनें 75 लाख यात्रियों को गंतव्य तक पहुंचाती हैं। यह दुनिया का सबसे व्यस्ततम और भीड़भाड़ वाला उपनगरीय रेल सेवा है जो कि सुबह 4 बजे से प्रारंभ होकर देर रात 1 बजे रात तक जारी रहती है तो कुछ ट्रेन सेवाएं तो 2.30 तक चलती हैं।

लेखक – एम.वाई. सिद्दीकी – पूर्व प्रवक्ता कानून एवं रेल मंत्रालय
अंग्रेजी से अनुवाद- शशिकान्त सुशांत, पत्रकार
Mumbai Metro Rail