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Monday, September 7, 2026

क्रिसमस मनाने की परम्परा कैसे, कब और कहां शुरू हुई

दुनियाभर में मनाए जाने वाले क्रिसमस की दास्तां बहुत ही रोचक है। क्रिसमस ईसाइयों के सबसे ख़ास त्यौहारों में से एक है। इसे ईसा मसीह के जन्म की ख़ुशी में मनाया जाता है। क्रिसमस को बड़े दिन के रूप में भी मनाया जाता है। क्रिसमस से 12 दिन का उत्सव क्रिसमस टाइड शुरू होता है। ‘क्रिसमस’ शब्द ‘क्राइस्ट्स और मास’ दो शब्दों से मिलकर बना है, जो मध्य काल के अंग्रेज़ी शब्द ‘क्रिस्टेमसे’ और पुरानी अंग्रेज़ी शब्द ‘क्रिस्टेसमैसे’ से नक़ल किया गया है। 1038 ईस्वी से इसे ‘क्रिसमस’ कहा जाने लगा। इसमें ‘क्रिस’ का अर्थ ईसा मसीह और ‘मस’ का अर्थ ईसाइयों का प्रार्थनामय समूह या ‘मास’ है। सोलहवीं सदी के मध्य से ‘क्राइस्ट’ शब्द को रोमन अक्षर एक्स से दर्शाने की प्रथा चल पड़ी। इसलिए अब क्रिसमस को एक्समस भी कहा जाता है।

भारत सहित दुनिया के ज़्यादातर देशों में क्रिसमस 25 दिसम्बर को मनाया जाता है, क्योंकि इन हिस्सों में 1582 में पोप ग्रेगोरी द्वारा बनाए गए कैलेंडर का इस्तेमाल होता है। इसके हिसाब से 25 दिसम्बर को ही क्रिसमस आता है, लेकिन रूस, मिस्त्र, अरमेनिया, इथोपिया, गॉर्गिया, युक्रेन, जार्जिया, सर्बिया और कजाकिस्तान आदि देशों में लोग 7 जनवरी को क्रिसमस मनाते हैं, क्योंकि पारंपरिक जुलियन कैलेंडर का 25 दिसम्बर यानी क्रिसमस का दिन गेगोरियन कैलेंडर और रोमन कैलेंडर के मुताबिक़ 7 जनवरी को आता है। क़ाबिले-ग़ौर है कि इटली में 6 जनवरी को क्रिसमस मनाया जाता है। यहां ‘द फ़ीस्ट ऑफ़ एपिफ़ेनी’ नाम से इसे मनाया जाता है। माना जाता है कि यीशू के पैदा होने के बारहवें दिन तीन आलिम उन्हें तोहफ़े और दुआएं देने आए थे।

हालांकि पवित्र बाइबल में कहीं भी इसका ज़िक्र नहीं है कि क्रिसमस मनाने की परम्परा आख़िर कैसे, कब और कहां शुरू हुई। एन्नो डोमिनी काल प्रणाली के आधार पर यीशु का जन्म 7 से 2 ईसा पूर्व के बीच हुआ था। 25 दिसम्बर यीशु मसीह के जन्म की कोई ज्ञात वास्तविक जन्म तिथि नहीं है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि ईसा मसीह के जन्म की सही तारीख़ के बारे में पता लगाना काफ़ी मुश्किल है। सबसे पहले रोम के बिशप लिबेरियुस ने ईसाई सदस्यों के साथ मिलकर 354 ईस्वी में 25 दिसम्बर को क्रिसमस मनाया था। उसके बाद 432 ईस्वी में मिस्र में पुराने जुलियन कैलेंडर के मुताबिक़ 6 जनवरी को क्रिसमस मनाया गया था। उसके बाद धीरे-धीरे पूरी दुनिया में जहां भी ईसाइयों की तादाद ज़्यादा थी, यह त्यौहार मनाया जाने लगा। छठी सदी के आख़िर तक इंग्लैंड में यह एक परम्परा का रूप ले चुका था।

ग़ौरतलब है ईसा मसीह के जन्म के बारे में व्यापिक स्वीकार्य ईसाई पौराणिक कथा के मुताबिक़ प्रभु ने मैरी नामक एक कुंवारी लड़की के पास गैब्रियल नामक देवदूत भेजा। गैब्रियल ने मैरी को बताया कि वह प्रभु के पुत्र को जन्म देगी और बच्चे् का नाम जीसस रखा जाएगा। वह बड़ा होकर राजा बनेगा, और उसके राज्य की कोई सीमा नहीं होगी।

देवदूत गैब्रियल, जोसफ़ के पास भी गया और उसे बताया कि मैरी एक बच्चे को जन्म देगी, और उसे सलाह दी कि वह मैरी की देखभाल करे और उसका परित्याग न करे। जिस रात को जीसस का जन्म हुआ, उस वक़्त लागू नियमों के मुताबिक़ अपने नाम पंजीकृत कराने के लिए मैरी और जोसफ़ बेथलेहेम जाने के लिए रास्ते में थे।

उन्होंने एक अस्तबल में शरण ली, जहां मैरी ने आधी रात को जीसस को जन्म दिया और उसे एक नांद में लिटा दिया। इस प्रकार जीसस का जन्म हुआ। क्रिसमस समारोह आधी रात के बाद शुरू होता है। इसके बाद मनोरंजन किया जाता है। ख़ूबसूरत रंगीन लिबास पहने बच्चे ड्रम्स, झांझ-मंजीरों के आर्केस्ट्रा के साथ हाथ में चमकीली छड़ियां लिए हुए सामूहिक नृत्यु करते हैं।

क्रिसमस का एक और दिलचस्प पहलू यह है कि ईसा मसीह के जन्म की कहानी का संता क्लॉज़ की कहानी के साथ कोई रिश्ता नहीं है। वैसे तो संता क्लॉज़ को याद करने का चलन चौथी सदी से शुरू हुआ था और वे संत निकोलस थे, जो तुर्किस्तान के मीरा नामक शहर के बिशप थे। उन्हें बच्चों से बहुत प्यार था और वे ग़रीब, अनाथ और बेसहारा बच्चों को तोहफ़े दिया करते थे।

पुरानी कैथोलिक परंपरा के मुताबिक़ क्रिसमस की रात को ईसाई बच्चे अपनी तमन्नाओं और ज़रूरतों को एक पत्र में लिखकर सोने से पूर्व अपने घर की खिड़कियों में रख देते थे। यह पत्र बालक ईसा मसीह के नाम लिखा जाता था। यह मान्यता थी कि फ़रिश्ते उनके पत्रों को बालक ईसा मसीह तक पहुंचा देंगे। क्रिसमस ट्री की कहानी भी बहुत ही रोचक है। किवदंती है कि सर्दियों के महीने में एक लड़का जंगल में अकेला भटक रहा था। वह सर्दी से ठिठुर रहा था। वह ठंड से बचने के लिए आसरा तलाशने लगा। तभी उसकी नजर एक झोपड़ी पर पड़ी। वह झोपडी के पास गया और उसने दरवाजा खटखटाया।

कुछ देर बाद एक लकड़हारे ने दरवाज़ा खोला। लड़के ने उस लकड़हारे से झोपड़ी के भीतर आने का अनुरोध किया। जब लकड़हारे ने ठंड में कांपते उस लड़के को देखा, तो उसे लड़के पर तरस आ गया और उसने उसे अपनी झोपड़ी में बुला लिया और उसे गर्म कपड़े भी दिए। उसके पास जो रूख-सूखा था, उसने लड़के को बभी खिलाया। इस अतिथि सत्कार से लड़का बहुत ख़ुश हुआ।

हक़ीक़त में वह लड़का एक फ़रिश्ता था और लकड़हारे का इम्तिहान लेने आया था। उसने लकड़हारे के घर के पास खड़े फ़र के पेड़ से एक तिनका निकाला और लकड़हारे को देकर कहा कि इसे ज़मीन में बो दो। लकड़हारे ने ठीक वैसा ही किया जैसा लड़के ने बताया था। लकड़हारा और उसकी पत्नी इस पौधे की देखभाल करने लगे। एक साल बाद क्रिसमस के दिन उस पेड़ में फल लग गए। फलों को देखकर लकड़हारा और उसकी पत्नी हैरान रह गए, क्योंकि ये फल, साधारण फल नहीं थे बल्कि सोने और चांदी के थे। कहा जाता है कि इस पेड़ की याद में आज भी क्रिसमस ट्री सजाया जाता है। मगर मॉडर्न क्रिसमस ट्री की शुरुआत जर्मनी में हुई।

उस वक़्त एडम और ईव के नाटक में स्टेज पर फ़र के पेड़ लगाए जाते थे। इस पर सेब लटके होते थे और स्टेज पर एक पिरामिड भी रखा जाता था। इस पिरामिड को हरे पत्तों और रंग-बिरंगी मोमबत्तियों से सजाया जाता था। पेड़ के ऊपर एक चमकता तारा लगाया जाता था। बाद में सोलहवीं सदी में फ़र का पेड़ और पिरामिड एक हो गए और इसका नाम हो गया क्रिसमस ट्री। अट्ठारहवीं सदी तक क्रिसमस ट्री बेहद लोकप्रिय हो चुका था। जर्मनी के राजकुमार अल्बर्ट की पत्नी महारानी विक्टोरिया के देश इंग्लैंड में भी धीरे-धीरे यह लोकप्रिय होने लगा। इंग्लैंड के लोगों ने क्रिसमस ट्री को रिबन से सजाकर और आकर्षक बना दिया।

उन्नीसवीं सदी तक क्रिसमस ट्री उत्तरी अमेरिका तक जा पहुंचा और वहां से यह पूरी दुनिया में लोकप्रिय हो गया। क्रिसमस के मौक़े पर अन्य त्यौहारों की तरह अपने घर में तैयार की हुई मिठाइयां और व्यंजनों को आपस में बांटने और क्रिसमस के नाम से तोहफ़े देने की परम्परा भी काफ़ी पुरानी है। इसके अलावा बालक ईसा मसीह के जन्म की कहानी के आधार पर बेथलेहम शहर के एक गौशाला की चरनी में लेटे बालक ईसा मसीह और गाय-बैलों की मूर्तियों के साथ पहाड़ों के ऊपर फ़रिश्तों और चमकते तारों को सजा कर झांकियां बनाई जाती हैं, जो तक़रीबन दो हज़ार साल पुरानी ईसा मसीह के जन्म की याद दिलाती हैं।

दिसम्बर का महीना शुरू होते ही दुनियाभर में क्रिसमस की तैयारियां शुरू हो जाती हैं । गिरजाघरों को सजाया जाता है। भारत में अन्य मज़हबों के लोग भी क्रिसमस के जश्न में शामिल होते हैं। क्रिसमस के दौरान प्रभु की प्रशंसा में लोग कैरोल गाते हैं। वे प्रेम और भाईचारे का संदेश देते हुए घर-घर जाते हैं। भारत में ख़ासकर गोवा में कुछ लोकप्रिय चर्च हैं, जहां क्रिसमस बहुत उत्साह के साथ मनाया जाता है। इनमें से ज़्यादातर चर्च ब्रि‍टिश और पुर्तगाली शासन के दौरान बनाए गए थे।

इनके अलावा देश के कुछ बड़े चर्चों मे सेंट जोसफ़ कैथेड्रिल, आंध्र प्रदेश का मेढक चर्च, सेंट कै‍थेड्रल, चर्च ऑफ़ सेंट फ्रांसिस ऑफ़ आसीसि और गोवा का बैसिलिका व बोर्न जीसस, सेंट जॊन्स चर्च इन विल्डरनेस और हिमाचल में क्राइस्ट चर्च, सांता क्लॊज बैसिलिका चर्च, और केरल का सेंट फ्रासिस चर्च, होली क्राइस्ट चर्च, महाराष्ट्र में माउन्टल मैरी चर्च, तमिलनाडु में क्राइस्ट द किंग चर्च व वेलान्कन्नी चर्च, और आल सेंट्स चर्च और उत्तर प्रदेश का कानपुर मेमोरियल चर्च शामिल हैं। क्रिसमस पर देश भर के सभी छोटे-बड़े चर्चों में रौनक़ रहती है। यह हमारे देश की सदियों पुरानी परंपरा रही है कि यहां सभी त्यौहारों को मिलजुल कर मनाया जाता है। हर त्यौहार का अपना ही उत्साह होता है- बिलकुल ईद और दिवाली की तरह।
-फ़िरदौस ख़ान
(लेखिका स्टार न्यूज़ एजेंसी में संपादक हैं)
ईमेल : editor.starnewsagency@gmail.com

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