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Thursday, August 27, 2026

कांग्रेस: नकारा नेतृत्व की नाकामी से डूब रही नैय्या

लगातार दो लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के हाथों करारी हार झेलने वाली कांग्रेस पार्टी से अपेक्षा तो यह की जा रही थी कि वह हार के सदमे से उभर कर अपने आप को महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभाओ के चुनाव में भाजपा को कड़ी टक्कर देने के लिए तैयार करने की कोशिश में कोई कसर बाकी नहीं रखेगी ,परंतु आश्चर्य की बात तो यह है कि चुनाव के पहले ही शायद उसने यह मान लिया है कि अब उसे आगे आने वाले चुनाव में ऐसी ही पराजय स्वीकार करने के लिए मानसिक रूप से तैयार रहना होगा। कांग्रेस पार्टी के एक वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद द्वारा हाल ही में दिए गए बयान से तो ऐसा ही प्रतीत होता है। सलमान खुर्शीद ने हाल ही में ऐसी दो टूक बयानबाजी करने से कोई परहेज नहीं किया कि कांग्रेस पार्टी आज जिस दौर से गुजर रही है, उसमें महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव में पार्टी की जीत की कोई संभावना नहीं है। सलमान खुर्शीद ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से राहुल गांधी के इस्तीफे से उपजी परिस्थितियों को पार्टी के संकट में इजाफा करने वाला बताते हुए कहा कि कांग्रेस के पास कोई पूर्णकालिक अध्यक्ष नहीं है और कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी केवल फौरी कामकाज देख रही है। इसका मतलब है कि कांग्रेस में कोई नेता नीति और नियति नहीं बची है।

सलमान खुर्शीद के इस बयान में भले ही कड़वी सच्चाई छुपी हो, परंतु उनके इस बयान पर पार्टी में विवाद चल गया है। कांग्रेस के प्रवक्ता राशिद अल्वी इसे घर को आग लग गई, घर के चिराग से कहावत का जिक्र करते हुए कहा कि राहुल गांधी गलत नहीं थे। उन्हें कुछ नेताओं का समर्थन नहीं मिला, इसलिए उन्होंने इस्तीफा दिया। उधर सलमान खुर्शीद सफाई दे रहे हैं कि मेरी चिंता में विश्वास भी है कि हम फिर वापस आएंगे। अब सवाल यह उठता है कि क्या सलमान खुर्शीद का यह भरोसा ज्यादा दिनों तक टिक पाएगा। कांग्रेस के युवा नेता एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने सलमान खुर्शीद के बयान पर सीधे-सीधे कोई प्रतिक्रिया व्यक्त करने से बचते हुए कहा कि कांग्रेस को आत्ममंथन की जरूरत है। गौरतलब है कि सिंधिया पहले भी कह चुके हैं कि कांग्रेस को ऐसे युवा और ऊर्जावान अध्यक्ष की जरूरत है, जो सबको साथ लेकर चल सके। इसमें भी दो राय नहीं हो सकती कि सिंधिया स्वयं भी मध्य प्रदेश में कांग्रेसी अध्यक्ष बनने की महत्वाकांक्षा पाले हुए और उनके समर्थकों ने इसके लिए अभियान भी छेड़ रखा है। लोकसभा चुनाव के बाद से ही कांग्रेस नेताओं के द्वारा ऐसे बयान दिए जाने का सिलसिला प्रारंभ हो गया था कि पार्टी को आत्मचिंतन करने की जरूरत है, परंतु विगत चार माह में पार्टी की किसी भी गतिविधि से यह संकेत नहीं मिलते हैं कि पार्टी आत्म चिंतन के लिए तैयार है। इसके लिए किसी शुभ घड़ी की प्रतीक्षा करने की जरूरत नहीं है क्या। यह आत्म चिंतन लोकसभा चुनाव में मिली शर्मनाक हार के तत्काल बाद ही शुरू नहीं हो जाना चाहिए था। यह चिंतन तो राहुल गांधी के अध्यक्ष अध्यक्ष रहते हुए भी किया जा सकता था।

दरअसल अध्यक्ष पद से राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद काफी समय तो पार्टी ने उनकी मान मनोबल करने से ही जाया कर दिया। जब राहुल गांधी इस्तीफे पर अड़े रहे तब अध्यक्ष पद के लिए दूसरे नामों पर विचार प्रारंभ हुआ और नए अध्यक्ष की खोज का यह सिलसिला सोनिया गांधी पर जाकर समाप्त हो गया। इससे यह सच्चाई तो एक बार फिर सामने आ गई है कि न तो कांग्रेस गांधी परिवार की छत्रछाया से मुक्त होने के लिए मानसिक रूप से तैयार हो पाई है और ना ही गांधी परिवार पार्टी की बागडोर परिवार से इधर किसी और नेता को सौंपने के लिए तैयार है। स्वयं राहुल गांधी भी इस महत्वाकांक्षा से मुक्त नहीं है। वे स्वयं कुर्सी से हटने के बाद भी पार्टी पर नियंत्रण के मोह में लगे हुुुए है। इसका परिणाम यह हुआ कि पार्टी पिछले चार महीनों से अनिर्णय की स्थिति से गुजर रही है। सलमान खुर्शीद ने जो कहा कुछ कहा वह कड़वा सच है और पार्टी के नेताओं को इस सच को स्वीकारने का साहस दिखाना चाहिए

दरअसल इस सच को स्वीकार कर पिछले चार महीनों में पार्टी ने उन कारणों को दूर कर लिया होता, जो उसके पराभव का कारण है तो वह महाराष्ट्र एवं हरियाणा में हारी हुई लड़ाई के लिए विवश नहीं होती। पार्टी ने पराजय के कारण दूर करना तो दूर की बात है पराजय के कारणों की खोज करने की जहमत तक नहीं उठाई और ना ही ऐसी कोई रुचि दिखाई ,जिससे यह संकेत मिल सके की वह अपना खोया हुआ गौरव पुनः अर्जित करने के लिए कृत संकल्पित है। लगातार 19 वर्षों पर पार्टी के अध्यक्ष पद की बागडोर संभालने वाली सोनिया गांधी ने पार्टी में एकजुटता बनाए रखने की मंशा से अंतरिम अध्यक्ष पद तो स्वीकार कर लिया है ,परंतु अब वह पहले जैसी सक्रिय नहीं है। राहुल गांधी द्वारा हरियाणा में की गई नियुक्ति को रद्द कर उन्होंने जो नई नियुक्तियां की है ,उसका पार्टी को क्या लाभ मिलेगा यह तो राज्य विधानसभा चुनाव के नतीजे घोषित होने पर ही पता चलेगा, परंतु फिलहाल तो नई नियुक्तियों ने असंतोष को ही बढ़ावा ही दिया है, जिसका असर पार्टी के चुनाव अभियान पर स्पष्ट दिखाई दे रहा है।

गौरतलब है कि राहुल गांधी ने राष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक तंवर को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया था ,परंतु सोनिया गांधी ने उन्हें कुर्सी से हटा कर अपनी वफादार कुमारी शैलजा को पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष पद की बागडोर सौंपी है। इससे नाराज होकर तंवर ने पार्टी से किनारा कर लिया। इसी तरह राहुल गांधी के अध्यक्ष कार्यकाल में हासिये पर डाल दिए गए पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा को सोनिया गांधी ने भावी मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट करने का जो फैसला किया, उससे भी पार्टी की राज्य इकाई में असंतोष फैला हुआ है। पार्टी के अंदर यह असंतोष केवल हरियाणा तक ही सीमित नहीं है, महाराष्ट्र में भी संजय निरुपम ने टिकट वितरण के प्रति असंतोष जताते हुए पार्टी छोड़ने की धमकी दी थी। संजय निरुपम ने अपना असंतोष वरिष्ठ कांग्रेसी नेता मल्लिकार्जुन खड़गे पर पर निशाना साध कर व्यक्त किया है, जो सोनिया गांधी के करीबी माने जाते हैं । मल्लिकार्जुन खरगे ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह द्वारा विजयादशमी पर पर्व पर राफेल विमान की शस्त्र पूजा किए जाने को दिखावा बताया था ,जिस पर संजय निरुपम ने निशाना साधते हुए कहा कि शस्त्र पूजा आडंबर नहीं बल्कि सदियों से चली आ रही वैदिक परंपरा है। खड़गे नास्तिक है, इसलिए उन्हें यह तमाशा लगता है। जाहिर सी बात है कि कांग्रेसी नेताओं द्वारा एक दूसरे के खिलाफ बयानबाजी का यह सिलसिला जल्द थमने के कोई आसार नहीं है।

यह भी आश्चर्यजनक बात है कि महाराष्ट्र में कांग्रेस एवं राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के बीच चुनावी गठबंधन होने के बावजूद दोनों दलों के नेता एक दूसरे पर तंज करने में कोई संकोच नहीं कर रहे हैं। हाल ही में जब महाराष्ट्र में पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने कांग्रेस एवं राकपा के विलय का सुझाव दिया तो राकपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद पवार ने इस सुझाव को खारिज करते हुए कहा कि उनकी पार्टी न थकी है और न ही चुकी है। पवार ने राज्य विधानसभा चुनाव में अपनी पार्टी के अच्छे प्रदर्शन का भरोसा भी जताया। शिंदे और पवार के बीच की इस बयानबाजी ने शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे को उन पर निशाना साधने का मनचाहा अवसर उपलब्ध करा दिया। कांग्रेस पार्टी के अंदर एक-दूसरे के विरुद्ध जो बयानबाजी विगत दिनों मध्यप्रदेश में देखने को मिली थी ,उसने भी राज्य की कमलनाथ सरकार की मुश्किलें ही बनाई थी। इस बयानबाजी को रोकने के लिए पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को स्वयं हस्तक्षेप करना पड़ा था।

यह भी कम आश्चर्य की बात नही है कि जब महाराष्ट्र एवं हरियाणा विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी को प्रतिष्ठा बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है, तब भी यह बयानबाजी थमती नहीं दिख रही है। उससे भी बड़ा आश्चर्य तब हुआ ,जब दोनों राज्यों में पार्टी के प्रचार अभियान में सक्रिय भूमिका निभाने के बजाए राहुल गांधी विदेश यात्रा पर चले गए। इससे पार्टी कार्यकर्ताओं के मनोबल पर क्या प्रभाव पड़ा होगा ,यह समझना कठिन नहीं है। ऐसे में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की इस टिप्पणी को कैसे गलत कहा जा सकता है कि मतदाता उस पार्टी को वोट देना क्यों पसंद करेंगे ,जिसके नेता चुनाव के समय छुट्टियां मनाने विदेश चले जाते हैं। दरअसल कांग्रेस पार्टी ऐसी आलोचना के लिए दूसरे दलों को दोष कैसे दे सकती है ,जब उसके नेता ही इन चुनावों में पार्टी की जीत की संभावनाओं को बलवती बनाने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा दिखा रहे हैं। निश्चित रूप से इन दो राज्यों के चुनाव में पार्टी के प्रदर्शन का असर आगामी कुछ माह में होने वाले दिल्ली और झारखंड विधानसभा के चुनाव पर भी पड़ेगा ,लेकिन पार्टी नेतृत्व को शायद इसलिए इसकी कोई चिंता नहीं क्योंकि शायद वह अंदर ही अंदर यह मान चुकी है कि चुनाव में हारना उसकी नियति बन चुका है। ऐसा ना होता तो महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभाओं के चुनाव में उसकी सशक्त मौजूदगी दिखाई देती। निश्चित रूप से यह भी आश्चर्य की बात है कि पार्टी के नेतृत्व को अपना खोया हुआ गौरव पुनः अर्जित करने की कोई ललक नहीं है।।

:-कृष्णमोहन झा

(लेखक IFWJ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और डिज़ियाना मीडिया समूह के राजनैतिक संपादक है)

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