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Wednesday, October 28, 2026

कश्मीर: पाकिस्तान को बहुत भारी पड़ेगा भारत से पंगा

जम्मू कश्मीर को अनुच्छेद 370 और 35A से मुक्त कर वहां शांति कायम करने और विकास के नए रास्ते खोजने की मोदी सरकार की पहल पर पाकिस्तान का नकारात्मक रवैया बदलने की दूर दूर तक कोई संभावना नजर नहीं आती। भारत सरकार को पूरा हक है कि वह अपने देश के किसी भी हिस्से में रहने वाले बाशिंदो की भलाई के लिए जो भी कदम जरूरी हो, उन पर अमल करें। यह पूरी तरह देश का आंतरिक मामला है, परंतु पाकिस्तान हमेशा भारत के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप की नीति पर ही चलता रहा है। जम्मू कश्मीर के विकास में बाधा बनने वाले अनुच्छेद 370 को खत्म करने के फैसले का विरोध करके उसने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि उसके सुधरने की उम्मीद करना बेईमानी है।

जब से मोदी सरकार ने जम्मू कश्मीर के हित में यह फैसला किया है ,तभी से पाकिस्तान बौखलाया हुआ है। भारतीय उच्चायुक्त को वापस भेजना, समझौता एक्सप्रेस रद्द करने और द्विपक्षीय व्यापार पर रोक लगाने के जो फैसले इमरान सरकार ने किए हैं, वह उसकी बौखलाहट को ही उजागर करते हैं। पाकिस्तान अब सारे विश्व में गुहार लगा रहा है कि कोई तो उसके समर्थन में आए ,परंतु दुनिया में कोई भी देश ऐसा नहीं है ,जिसने पाकिस्तान के साथ खड़े दिखने और मोदी सरकार के विरोध में खड़ा दिखने में दिलचस्पी दिखाई हो। पाकिस्तान को कश्मीर मुद्दे का अंतरराष्ट्रीयकरण करने की किसी भी कोशिश में उसे किंचित मात्र भी सफलता नहीं मिली है ,परंतु वह अपनी हरकतों से बाज आने के लिए तैयार नहीं है।

जम्मू कश्मीर को अनुच्छेद 370 से आजाद करने के मोदी सरकार के साहसिक फैसले के विरोध में समर्थन हासिल करने के लिए उसने हाल में ही जिन देशों के दरवाजे खटखटाए हैं, उन सभी देशों की सरकारों ने पाकिस्तान को यह टका सा जवाब दे दिया है कि भारत के आंतरिक मामले में वह हस्तक्षेप नहीं करेंगे। अमेरिका से इमरान खान को सबसे ज्यादा उम्मीद थी , परंतु राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उनसे साफ कह दिया कि वे इस मामले में मध्यस्थता करने के लिए तैयार नहीं है। रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने इस मामले में भारत सरकार के ताजे फैसले के विरोध में कोई भी टीका टिप्पणी करने से इनकार करते हुए साफ कह दिया है कि जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाना भारत का आंतरिक मामला है। संयुक्त अरब अमीरात से भी पाकिस्तान को निराशा हाथ लगी है। चीन के साथ अपनी पुरानी दोस्ती पर नाज करने वाले पाकिस्तान को वहा से भी ऐसी कोई मदद नहीं मिली, जिससे उसकी निराशा कुछ कम हो सके। चीन ने केवल लद्दाख को केंद्रशासित प्रदेश बनाए जाने पर असहमति जाहिर की है, परंतु मोदी सरकार का खुलकर विरोध करने से परहेज किया है। चीन की रुचि तो भारत के साथ द्विपक्षीय व्यापार का विस्तार करने में है।

पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने हाल में ही बकरीद की नमाज पढ़ने के लिए पाकिस्तानी कब्जे वाले शहर मुजफ्फराबाद की यात्रा की थी। वह अपने साथ अपने देश के कई राजनीतिक दलों के नेताओं को भी लेकर गए थे। इन नेताओं में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के मुखिया बिलावल भुट्टो भी शामिल थे। शाह महमूद कुरैशी ने इस मौके पर जो कुछ कहा उसका केवल एक ही मतलब है कि भारत की ताकत और कूटनीति के कारण पाकिस्तान को दुनिया में अपने अलग-थलग पड़ जाने की कड़वी हकीकत का भली-भांति एहसास हो चुका है। कुरैशी ने पाकिस्तान की बेबसी को यह कहकर उजागर कर दिया कि पाकिस्तानियों और कश्मीरियों को यह समझ लेना चाहिए कि कोई आपके साथ नहीं खड़ा है। उन्होंने साफ -साफ शब्दों में कह दिया कि उन्हें मूर्खों के स्वर्ग में नहीं रहना चाहिए और इस हकीकत को स्वीकार कर लेना चाहिए कि पाकिस्तान का साथ देने के लिए कोई देश तैयार नहीं है। पाकिस्तान को जिन मुस्लिम देशों से समर्थन की उम्मीद थी, वह भी उसका साथ देने के लिए तैयार नहीं है। कुरैशी ने यह भी कहा कि अब इस मसले को आगे ले जाना कठिन है।

भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने मोदी सरकार के साहसिक फैसले के बाद चीन की जो यात्रा की थी ,उसको लेकर पाकिस्तान बेहद परेशान है। पाकिस्तान को इस खबर ने परेशान कर दिया है कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग अक्टूबर में भारत का दौरा करेंगे। चीन दरअसल यह चाहता है कि वह खुलकर भारत की आलोचना करने से परहेज करें, ताकि एक साथ भारत और पाकिस्तान दोनों को साध सके । इसलिए उसने जम्मू कश्मीर के मसले पर विचार करने हेतु संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बंद कमरे में अनौपचारिक बैठक का अनुरोध किया था। स्थाई सदस्य के रूप में चीन के अनुरोध को स्वीकार करते हुए सुरक्षा परिषद की बंद कमरे में अनौपचारिक बैठक तो बुला ली गई ,परंतु उसे अपने प्रयोजन में कामयाबी हाथ नहीं लगी। पाकिस्तान ने चिट्ठी लिखकर सुरक्षा परिषद से मांग की थी कि उसे भी बैठक में बुलाया जाए, ताकि वह बैठक में अपना पक्ष रख सके, परंतु उसे वहां निराशा ही हाथ लगी। बैठक में सुरक्षा परिषद के पांच स्थाई सदस्यों के अलावा 10 अस्थाई सदस्यों को बैठक में भाग लेने का अधिकार था। इसलिए पाकिस्तान मन मसोसकर रह गया, क्योंकि वह सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य नहीं है। इस अनौपचारिक बैठक में चीन ने पाकिस्तान का पक्ष लेने की जो कोशिश की उसमें स्थाई और अस्थाई सदस्य देशों का समर्थन नहीं मिला। चीन बैठक में पूरी तरह अलग-थलग पड़ गया। वैसे भी सुरक्षा परिषद की यह अनौपचारिक बैठक थी, जिसकी कार्रवाई को न तो सार्वजनिक किया जाता है और ना रिकॉर्ड में रखा जाता है।

पाकिस्तान से अपने आर्थिक हित साधने की मंशा से चीन ने संयुक्त सुरक्षा परिषद में जो भारत विरोधी माहौल बनाने की कोशिश की थी, वह तो बेकार जाना ही थी ,परंतु पाकिस्तान को एक बार फिर इस कड़वी हकीकत का एहसास हो गया कि दुनिया के देशों में चीन को छोड़कर और कोई दूसरा देश उसके पक्ष में खड़े दिखने के लिए तैयार नहीं है। दरअसल सारे देश इस बात से वाकिफ हैं कि यदि वह भारत के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप करेंगे तो भारत को भी उसके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने से रोकने का कोई नैतिक अधिकार नहीं होगा।सुरक्षा परिषद की अनौपचारिक बैठक के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि कश्मीर का मसला भारत और पाकिस्तान को आपसी बातचीत से सुलझाना चाहिए। रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने पहले ही कह दिया था कि वह कश्मीर मसले को भारत का आंतरिक मामला मानते हैं। कुल मिलाकर पाकिस्तान ने चीन के माध्यम से कश्मीर मामले का अंतरराष्ट्रीय करण करने की जो कोशिश की थी, उसमें उसे मुंह की खाना पड़ी। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थाई प्रतिनिधि अकबरउद्दीन ने बैठक के बाद साफ शब्दों में कहा कि कश्मीर के बारे में निर्णय का अधिकार केवल भारत को है और जम्मू कश्मीर की सामाजिक, आर्थिक प्रगति सुनिश्चित करने के लिए जो उचित होगा, वह भारत सरकार करेगी। किसी भी तीसरे देश को इसमें हस्तक्षेप का अधिकार नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि जब तक पाकिस्तान आतंकवाद की सप्लाई बंद नहीं करता ,तब तक उसके साथ द्विपक्षीय वार्ता शुरू करने का सवाल ही नहीं उठता।

कुल मिलाकर पाकिस्तान को हर जगह से टका सा जवाब मिल रहा है। चीन उसकी आखिरी उम्मीद था ,परंतु संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में उसे भी मुंह की खानी पड़ी। अब पाकिस्तान के पास एक ही चारा बचा है कि वह कश्मीर मुद्दे को हवा देने के बजाय इस हकीकत को स्वीकार कर ले कि उसे भारत के आंतरिक मामलों में दखल देने की नीति से तौबा कर लेना चाहिए। बेहतर तो यही होगा कि वह खुद के घर मे पल रहे आतंकी संगठनों को संरक्षण देना बंद कर उनके विरुद्ध वास्तव में कठोर कार्रवाई करें। अभी तक वह केवल दिखावे के लिए आतंकी संगठनों के सरगनाओं के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई करता रहा है। सारी दुनिया में हाथ पैर मार लेने के बाद भी अगर कोई देश उसका साथ देने के लिए तैयार नहीं है तो इसकी केवल यही एक वजह है कि पाकिस्तान की नियत और इरादे कभी नेक नहीं रहे है। भारत ने आतंकवाद के खिलाफ जो अभियान प्रारंभ किया है ,उसमें सभी उसके साथ खड़े है। पाकिस्तान को यह बात अच्छी तरह समझ आ जाना चाहिए कि भारत से पंगा लेना बहुत महंगा पड़ेगा।

:-कृष्णमोहन झा
(लेखक IFWJ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और डिज़ियाना मीडिया समूह के राजनैतिक संपादक है)

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