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Saturday, September 19, 2026

अपना वजूद खोती हरियाणा की खाप पंचायतें

भारतीय न्यायालयों के समानांतर अपनी आक्रान्ता छवि से कभी अपने फतवे जारी कर अलग से सत्ता कायम करने वाली हरियाणा की खाप पंचायतें आज अपना ही वजूद बचाने को विवश हो गयी हैं .मुग़ल काल से चली आ रही ये गोत्रीय खाप पंचायतें अलग अलग क्षेत्र में बसे बहुमत वाले गोत्र के आधिपत्य में अपने अपने क्षेत्र विशेष की सभी जातियों तथा सभी अल्प गोत्रीय व्यक्तियों के समूह पर अपने गोत्र के हित में निर्धारित नियमों व शर्तों को थोप कर राज करती रही हैं .

कहने को तो ये खाप पंचायतें अपने क्षेत्र विशेष की सभी जातियों व सभी गोत्र के लोगों की सामूहिक पंचायतें यानी सर्वजातीय खाप कहलाई जाती हैं और आज भी ऐसा ही प्रचारित किया जा रहा है , परन्तु वास्तविकता इसके एकदम विपरीत देखने को मिलती है .इन खापों के प्रधान अपने गोत्र विशेष से ही बनाए जाते हैं ,अन्य गोत्र या जाति का व्यक्ति प्रधानगी नहीं पा सकता . हरियाणा में प्रमुख खाप पंचायतें यथा – मलिक गोत्र की गठ्वाला खाप , लोहारू बावनी के बावन –बाढडा के पच्चीस तथा जींद के पास के सात गाँव को मिलाकर स्योरण गोत्र की चौरासी खाप , दादरी के सांगवान गोत्र के चालीस गाँव के क्षेत्र को सांगवान खाप , निकट लगते राजस्थान के पूनिया गोत्र के ३६० गाँव के क्षेत्र को पूनिया खाप कहा जाता है .

आमतौर पर किसी खाप क्षेत्र में निवास करने वाले बहुमतीय गोत्र के इलावा अन्य जातियों तथा अल्प गोत्रीय लोगों को दोयम दर्जे का नागरिक समझा जाता रहा है तथा उन्हें अरड़ – फरड़ कहकर हतोत्साहित किया जाता रहा है . इन खाप पंचायतों में जातीय बहिष्कार तथा गाँव निकाला के आदेशों का प्रहार ज्यादातर इन्हीं अरड़ – फरड़ लोगों को झेलना पड़ा है . गोत्र आधारित खाप पंचायतों का चलन प्रारम्भ से ही जाट जाति में ही ज्यादा रहा है .जिस प्रकार हिन्दू धर्म में शुद्र वर्ग को हिन्दू होते हुए भी हिंदुत्व के विशेष अधिकार कभी भी प्रदान नहीं किये गए , हमेशा ही दुत्कार मिला , उसी प्रकार खापों द्वारा भी बहुमतिये गोत्र को ही विशेष अधिकार मिले और अन्य अल्प गोत्रीय जाट या अन्य जातियां शुद्र समान ही मानी जाती रही . राजनैतिक पार्टियों ने भी खाप प्रणाली का खूब फायदा उठाया और विधान सभा , लोक सभा तथा जिला परिषद् व ब्लाक समिति के चुनावों में भी खाप के अगुआओं को टिकेट दी जाने लगी .

१९९० के बाद जब ओ बी सी के लिए रिजर्वेशन शुरू हुई और जाटों ने भी आरक्षण की मांग रखी तो आरक्षित वर्ग को लगा कि अब उनको मिले हक़ में जाट डाका डालेंगे , तो धीरे धीरे इन अन्य पिछड़ी जातियों में भी जाटों के प्रति वैमनस्य पैदा होना शुरू हो गया . स्वर्ण जातियों की उपरी सतह ( ब्राह्मण , बनिया ,राजपूत ) में पहले से ही जाटों में बढती राजनैतिक चेतना के कारण जलन शुरू हो चुकी थी .फूट डालो राज करो की नीति वाली राजनीति के चलते जाट

गैर जाट के धड़े बनने प्रारम्भ हो गए और गोत्रीय खाप पंचायतों की सत्ता क्षीण होने लगी . सदियों से खापों के फतवों से प्रताड़ित अल्प गोत्रीय जाट तथा अन्य जातियां इन खापों के स्वम्भू कानूनों को तोड़ने लगे . खापों द्वारा निर्देशित फतवों के विरुद्ध जा कर युवक /युवतियां अंतरजातीय या खाप द्वारा निषिद्ध गोत्रों में भी विवाह करने लगे . काले सांप की तरह फुफकारती खापों के गाँव निकाला या जातीय बहिष्कार या ओनर किल्लिंग का विरोध कोर्ट स्तर पर भी उठने लगा .

एक एन जी ओ शक्ति वाहिनी द्वारा दायर खाप पंचायतों के हस्तक्षेप पर रोक लगाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने हाल में फरवरी माह के प्रथम सप्ताह में अपनी कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि –जहाँ विवाह योग्य दो बालिग अपनी सहमति से विवाह करना चाहते हों , वहां किसी भी व्यक्ति या समूह को हस्तक्षेप करने तथा बालिग जोड़े को प्रताड़ित करने का कोई अधिकार नहीं है .किसी को भी समाज या कानून के “ कानसाइंस कीपर” की भूमिका अदा करने की जरुरत नहीं है , चाहे वो समाज हो , माता –पिता हो या कोई अन्य और ऐसे सभी संबंधों का ध्यान कोर्ट रखेंगी .

कोर्ट के कड़े रुख तथा समाज में आ रहे बदलाव के कारण अब इन खापों को लगने लगा है कि उनकी खोखली हो चुकी जड़ों को किसी ऐसी खाद की जरुरत है जो उन्हें मृत्यु शैया पर जाने से पहले ही संबल दे सके . इसी लाइन पर वर्क आउट करते हुए अब खाप पंचायतें अपने राजनैतिक आकाओं का आसरा ले रही हैं . मलिक गोत्र की गठ्वाला खाप के पुरोधा दादा घासी राम मलिक की इसी फरवरी ,२०१८ में आयोजित जयंती समोराह में बिहार के राज्यपाल सतपाल सिंह मलिक , केंद्रीय इस्पात मंत्री बिरेंदर सिंह तथा हरियाणा के कृषि मंत्री ओमप्रकाश धनखड़ की मौजूदगी खापों की राजनेताओं संग गल बहियाँ कर अपना प्रभाव बढाने तथा अपना अस्तित्व कायम रखने की एक अहम कोशिश ही माना जा रहा है .

समाज में अपनी उपस्थिति दर्ज करने तथा अपनी समाज हित की छवि प्रदर्शित करने हेतु अब खापें नकारात्मक की बजाय कुछ ऐसे निर्देश जारी करने लगी हैं जिससे किसी को कोई आपति न हो और खाप का रुतबा भी दिख जाए . इसी कड़ी में मलिक खाप ने भी एक छः सूत्री प्रस्ताव पारित किया है जिसमे कन्या भ्रूण हत्या , घूँघट प्रथा , मृत्यु भोज , विवाह समारोह में बन्दूक चलाना , दहेज़ लेना देना तथा डी जे बजाने पर प्रतिबन्ध लगाने की बात कही गयी है . इनमे से शिक्षा के प्रसार तथा खापों की दाब ढीली पड़ने के कारण घूँघट तथा मृत्यु भोज जैसी कुरीतियाँ तो पहले ही काफी हद तक कमजोर हो गयी हैं .

विवाह समारोहों में बन्दूक से हवाई फायर करने की कारवाई कोई सामजिक प्रथा नहीं है बल्कि यह कुछ तथाकथित धनाढ्य लोगों का एक दिखावा करने का प्रपंच मात्र है ,आम आदमी का इससे कोई लेना देना नहीं हैं . दहेज़ की मार से बचने के लिए ही भ्रूण हत्या का दंश समाज को झेलना पड़ रहा है ,इस क्षेत्र में समाज को जरूर जागरूक करने व नियंत्रात्मक कानूनों की अनुपालना में कड़ाई बरतने की आवश्यकता है .

खाप पंचायतों पर मुख्य दाग है अंतरजातीय या निषिद्ध गोत्रों में विवाह की प्रक्रिया पर इन खापों का अड़ियल रवैया अपनाना तथा ऐसे कड़े फतवे जारी करना ,जिनका अंत ‘आनर किल्लिंग’ के कदम में ही परिणति है . अब बदलते समय तथा शिक्षा के प्रादुर्भाव के कारण युवक /युवतियां अपना साथी स्वयं चुनने का अधिकार माँगने लगे हैं , जिसमे कई बार अलग जाति तथा खापों द्वारा निषिद्ध गोत्र व्यवस्था इसमे अवरोध पैदा करती है तथा प्रेमी जोड़े को या तो स्वयं जीवन लीला समाप्त करनी पड़ती है या खापों /समाज के दवाब में आनर किल्लिंग का दंश झेलना पड़ता है . हाँ, हाई सोसाइटी के लोगों पर इसका न कोई प्रभाव है और ना ही खाप की हिम्मत पड़ती है कि उसमे हस्तक्षेप करें . इसलिए यदि उच्च श्रेणी के व्यक्ति समाज की प्रगति में बाधक इन तथाकथित रीति रिवाजों को अमान्य कर पहल करें तो एक शुभ संकेत समाज को मिलता है . भूतपूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय बंसीलाल की सांसद पुत्री श्रुति चौधरी के अंतरजातीय विवाह का उदाहरण एक प्रकाश स्तम्भ का काम कर सकता है .

हरियाणा में चिंताग्रस्त स्तर तक घट चुके लिंगानुपात के कारण विवाह योग्य लड़कियों की संख्या लड़कों की तुलना में काफी कम है तथा ऐसे माहौल में खापों द्वारा अंतरजातीय विवाह का विरोध तथा लम्बी निषिद्ध गोत्रीय सूचि की कड़ाई से अनुपालना ने समाज में एक अजीब स्थिति पैदा कर दी है . हर गाँव में २० से ३५ वर्ष के बीच की आयु के सैंकड़ों युवक विवाह के लिए तरस रहे हैं , जिसके परिणाम प्रदेश में बढ़ते बलात्कारों के रूप में परिलक्षित हो रहे हैं . अब लड़के दूसरे प्रदेशों यथा बिहार , बंगाल , आसाम तथा अन्य से दलालों के माध्यम से खरीद कर लड़कियाँ लाने को बाध्य हो रहे हैं . ऐसे दस से बीस उदाहरण लगभग हर गाँव में देखने को मिल रहे हैं . इन खरीद कर लाई गयी लड़कियों को ‘मोलकी’ बोला जाता है . अधिकतर मामलों में ये मोल्कियां अवैध तरीकों से खरीद फरोक्त की जा रही हैं . दलाल इन्हें कुछ दिन के लिए एक को बेचकर पुन्न दूसरे को बेच देते हैं .

अगर प्रथम क्रेता कोई अड़चन पैदा करता है तो उसे गैर कानूनी खरीद –फरोक्त का हवाला देकर पुलिस केस का भय दिखाकर चुप करने को बाध्य कर जाता है . हरियाणा सरकार को इस और विशेष ध्यान देने की जरुरत है .सरकार सम्बंधित गाँव या क्षेत्र के थाना , ग्राम सचिव ,पटवारी , नम्बरदार तथा सरपंच को ऐसे विवाहों को तुरंत नोट कर एस डी एम या तहसीलदार के पास दर्ज करवाना सुनिश्चित करे ,क्योंकि ये विवाह एक बहुत बड़े सेक्स गिरोह को बढ़ावा दे रहे हैं . बार बार के खरीद फरोक्त के कारण युवकों में बहुत बड़े स्तर पर एड्स की महामारी को निमंत्रित किया जा रहा है .

हरियाणा में अन्य जातियों के अपेक्षा जाटों में निषिद्ध गोत्रों की सूचि काफी लम्बी है . यहाँ लगभग हर गाँव में न्यूनतम पांच गोत्र को टाला जाता है . खुद का , माँ का , दादी का ,नानी का तथा उस खाप का जिसके क्षेत्र में व्यक्ति निवास करता है . विवाह में लड़कियों की घटती उपलबध्ता के कारण चौथे गोत्र नानी के गोत्र को भी कुछ लोग त्याज्य गोत्र की श्रेणी से बाहर मानकर इस गोत्र में शादी करने लगे हैं ,परन्तु अभी भी सूची लम्बी है और निषिद्ध श्रेणी को कम करने की आवश्यकता महसूस की जा रही है . यहाँ प्रश्न उठता है कि जब उसी प्रदेश में रहने वाले सबसे समझदार माने जाने वाले बनिया जाति तथा जाट समकक्ष राजपूत जाति के लोग केवल एक या दो गोत्र ही निषिद्ध मानते हैं तो जाट क्यों नहीं ?

हरियाणा की खाप पंचायतों की कार्यप्रणाली पर प्रतिक्रिया पर टिपण्णी करते हुए हरियाणा के रोहतक से सोशल एक्टिविस्ट एवं जाट जाति से सम्बन्ध रखने वाली राजेश नांदल कहती हैं –“खाप पंचायतों द्वारा ऐसे निर्णय लिए जाने चाहिए जो हम सब के हित में हो यदि विवाह हेतु उतम वर मिले और तीसरा गोत्र अडचन बन जाए तो तीसरा छोड़ देना चाहिए. लेन देन पूर्ण रुप से खतम होना चाहिए . बेटियों को शिक्षित कर आत्मनिर्भर बनाया जाए और पैतृक संपत्ति का उसका हिस्सा भी उसे दे देना चाहिए, क्योंकि कुछ अभागी बेटियों को घर नसीब ही नहीं होता .सारी उम्र इधर उधर डोल कर जीवन समाप्त कर जाती है या मार खाती रहती है .”

उच्च स्तरीय बैंक अधिकारी तथा खाप पंचायतों पर विशेष रूचि रखने वाले रमेश राठी का मानना है कि –खाप निजी हित का मंच बन गयी हैं और बुजुर्गों की समाज हित कि आवाज गौण हो चुकी है .

युवा अमित कहते हैं ,” निर्णय लेते समय सही गलत की जगह अपने –पराये का ध्यान रखकर फैसले किये जाते हैं .”

अखिल भारतीय किसान सभा के हरियाणा प्रदेश सचिव एवं आर टी आई एक्टिविस्ट डॉ. बलबीर सिंह खाप पंचायतों को आड़े हाथ लेते हैं . “ वैवाहिक व आपराधिक मामलों में खापों का हस्तक्षेप हमेशा ही “समर्थ को नहीं दोष गोसाईं” की अवधारणा पर होता है . अगर व्यक्ति सामाजिक व आर्थिक तौर पर समर्थ है तो खांपे चूं नहीं करती ,यदि व्यक्ति सामाजिक व आर्थिक तौर पर कमजोर है तो खांपे देश निकाला व सबंध विच्छेद से कम कुछ स्वीकार नहीं के फैसले सुनाती हैं. यह अपवाद नहीं, सिद्धांत है . इसलिए खांपों की कोई नैतिक, सामाजिक और कानूनी हैशियत न हीं है तथा ना ही होनी चाहिये . कानून के मुताबिक समस्याओं का समाधान हो, यही सभ्य समाज की आवश्यकता है . तीन – चार गौत्र छोङ कर विवाह संबंध बनाना या ना बनाना व्यक्तिगत इच्छा पर है .

अतः खापें अगर अपना अस्तित्व बचाए रखना चाहती हैं तो वैज्ञानिक व समानता के आधार पर समाजिक कुरितियों को खत्म करने के लिए सिर्फ नैतिक जिम्मेदारी तक सीमित रहें, ठेकेदारी न लें अन्यथा इतिहास हो जाएंगी.”

लेखक @ जग मोहन ठाकन

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