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Sunday, October 17, 2021

चमकी बुखार: ठिठकती सरकार, सहमती जनता


उत्तर प्रदेश एवं बिहार में चमकी से सरकारें तो ठिठक ही रही है लेकिन यहां जनता बुरी तरह से सहमी हुई है यहाँ सरकारों को डॉक्टर मरीज एवं मरीजों के परिजनों के लिये संवेदनशील होना होगा। 1870 में सबसे पहले यह बीमारी जापान में आई इसलिये इसे जापानी इन्सेफेलाईटिस के नाम से जाना गया

स्वतंत्रता के 73 वर्षों में भारत में कई क्रान्तियाँ हुई है फिर बात चाहे औद्योगिक क्रान्ति की हो, दुग्ध क्रान्ति की हो, हरित क्रान्ति की हो या विज्ञान की जिसमें पृथ्वी के इतर ग्रहों पर पहुंच अपना परचम फहराने की हो या चिकित्सा के क्षेत्र में आशातीत सफलता प्राप्त करने की हो।

लेकिन विकास की इस दौड़ में आज भी मानव मूलभूत आवश्यकता स्वास्थ्य शिक्षा, पेयजल और इन पर भारी भरकम बजट के बाद भी ये दम तोड़ती ही नजर आ रही है। बड़े शहरों को छोड़ दे गाँव आज भी शुद्व पानी और स्वास्थ्य सुविधा को तरस रहे है। इसीलिए भारत में जनजनित बीमारियां ज्यादा है और प्रतिवर्ष हजारों असमय ही काल के गाल में समा रहे हैं।

भारत में बिहार और उत्तर प्रदेश ऐसे राज्य है जो एक्युट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम अर्थात् दिमागी बुखार, अर्थात् चमकी चमका रहा है। वही केरल को निपाह वायरस भी डरा रहा है। चिकित्सा के क्षेत्र में विकास के बावजूद इनकी जड़ तक हम ठीक-ठीक नहीं पहुंच पा रहे है। इसे विडम्बना ही कहेंगे बिहार और उत्तर प्रदेश में सरकारें होने वाली बच्चों की मौत पर सिर्फ दुःख ही प्रगट कर अपनी जवाबदेही से बचती नजर आ रही है, वही दूसरी और पश्चिमी बंगाल में डॉक्टरों पर मरीज के परिजनों द्वारा मारपीट ने पूरे भारत में तहलका मचाकर रख दिया है।

ऐसा भी नहीं है कि यह कोई पहली घटना हो, देश के विभिन्न भागों में ऐसी घटनाएं आम होती जा रही है। इलाज के दौरान् मरीज की मृत्यु का होना निःसंदेह परिजनों को विचलित करता है। यद्यपि डॉक्टर अपने मरीज को बचाने के लिए जी जान लगा देता है। लेकिन यहाँ पर्दे के पीछे तुष्टीकरण एवं राजनीति का रंग ज्यादा नजर आ रहा है।


उत्तर प्रदेश एवं बिहार में चमकी से सरकारें तो ठिठक ही रही है लेकिन यहां जनता बुरी तरह से सहमी हुई है यहाँ सरकारों को डॉक्टर मरीज एवं मरीजों के परिजनों के लिये संवेदनशील होना होगा। 1870 में सबसे पहले यह बीमारी जापान में आई इसलिये इसे जापानी इन्सेफेलाईटिस के नाम से जाना गया, कहते हैं भारत में सन् 1978 में पहली बार इस बीमारी के लक्षण सामने आये। भारत में 2013 में 18911 मामलों में 1475 मौतें हुई जिसमें बिहार 143, उत्तरप्रदेश 65, 2014 में कुल 12528 मामलों में 2012 मौतें हुई जिसमें 357 बिहार और 661 उत्तरप्रदेश 2015 में कुल 11584 मामले जिसमें 1501 मौत हुई बिहार 102, यूपी. 521, 2016 में कुल 13327 मामलों में 1584 मौत हुई जिसमें 127 बिहार में और 694 उत्तरप्रदेश, 2017 में कुल 15853 मामले जिसमें 1351 मौते हुई बिहार पैसठ यू.पी. 747, 2018 में कुल मामले 13066 मौतें 818, बिहार में 44, उत्तरप्रदेश में 255।


वास्तव में चमकी के लक्षण भी फ्लू जैसे ही होते है अर्थात् बुखार के साथ सिरदर्द, थकान, मतली, सुस्ती, उल्टी एवं माँसपेशियों में ऐठन आदि प्रमुख है। यद्यपि बैक्टीरिया, फंगस, परजीवी एवं स्पाइटोकेप्स भी एक कारण माना जाता है। जापान बुखार क्यूलेक्स मच्छर के काटने से होता है वही अन्य कारण में बैक्टीरिया, फंगस भी है, कुछ लोगों का मानना है कि यह लीची से हो रहा है, एक मेडिकल रिसर्च के अुनसार लीची में पाया जाने वाला एम.पी.सी.जी. (हायपोक्लाइसिन-ए) और मिथाइल साइक्लो प्रोपेग्लाइसिन शरीर में फेटी एसिट, मेटावाॅलिज्म में रूकावट पैदा करता है जिसके परिणाम स्वरूप ब्लड शूगर का लेबल नीचे चला जाता है और मस्तिष्क में ब्लड सप्लाई में रूकावट के कारण दौरे पड़ना शुरू हो जाते है, इसलिये डाॅक्टरों ने सलाह जारी की है कि खाली पेट लीची बच्चा न खाये यू तो ये बीमारी बिहार, उत्तरप्रदेश के अलावा असम, झारखण्ड, मणिपुर, तमिलनाडू, कर्नाटक और त्रिपुरा में भी देखी गई है।

यह भ्रम मात्र है। यहाँ डाॅक्टरों के सामने भी एक जैसे ही लक्षण कई बार समस्या बन जाते है और जब तक बात अर्थात् बीमारी सही पता चलती है तब तक मरीज चल बसता है। वही दूसरी ओर उस माँ से पूछो जिसे जिगर का टुकडा उसी के सामने दम तोड़ देता है। माँ के लिए यह असहनीय पीड़ा हैं, जिंदगी भर के लिए घाव छोड़ जाती है। मरने वाले बच्चों में गरीब वर्ग के ही बच्चे ज्यादा हैं वहीं सरकारे गरीबों के कल्याण की बातें करते नहीं थकती और बीमारी के शिकार भी यही ज्यादा होते हैं आखिर कमी कहां है।

दूसरी ओर हमारे नेता ऐसी विपरीत परिस्थिति में भी राजनीति करने से नही चूकते। यह भारत के लोकतंत्र का दुर्भाग्य ही है कि चुनाव में शिक्षा, स्वास्थ्य भी मुद्दा नहीं बन पाये। इसमें जनता का दोष ज्यादा है जो क्षणिक भाव में वह अपने विनाश का और नेताओं को सोने का सिंहासन दे पांच साल विलाप करती रहती है। कई बार तो ऐसा लगता है कि उसकी नियति ही ऐसी है। यहाँ कुछ यक्ष प्रश्न उठते है।


जब जनता सरकार को पूरा टैक्स देती है तो सुविधा में कमी क्यों? अस्पताल है तो दवा नही, दवा है तो आॅक्सीजन का सिलेण्डर नही, अमानक दवाओ की सप्लाई जवाबदेह कौन? दोषी कौन, जब ये बीमारी पहले भी फैली थी तो फिर इसका विशेष प्रशिक्षण डाॅक्टरो को क्यों नहीं दिया? मौतों का इंतजार क्यों? जाँच की रस्म कब तक? समय के साथ जाँच पर भी मिट्टी का पड़ना।

अब वक्त आ गया है जनता अपने सेवकों अर्थात् जनप्रतिनिधियों को अधिक जवाबदेह बनाए जनता के जागने से ही जवाबदेह शासन बनेगा।

लेखिका -डॉ. शशि तिवारी
शशि फीचर.ओ.आर.जी.सूचना मंत्र की संपादक हैं
मो. 9425677352

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