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Saturday, September 19, 2026

नाम परिवर्तन: लोक लुभावन या लोक हितकारी?

हमारे देश की राजनैतिक शैली का इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि जब हमारे सियासतदानों के पास जनता को दिखाने या बताने के लिए अपनी कोई उपलब्धियां नज़र नहीं आतीं या वे मतदाताओं से किए गए अपने वादों व आश्वसनों पर खरे नहीं उतर पाते उस समय यह चतुर बुद्धि नेता कोई न कोई ऐसे रास्ते तलाश कर लेते हैं जो जनता की मूल समस्याओं तथा उसकी रोज़मर्रा की ज़रूरतों से अलग हटकर सीधे तौर पर उसकी भावनाओं तथा उसके जज़्बात पर प्रभाव डालने वाले हों। धर्म-जाति,रीति-रिवाज,परंपराओं-आस्था,विश्वास,मंदिर-मस्जिद,भाषा,रंग-नस्ल-भेद जैसे विषय ऐसी ही श्रेणी में आते हैं जो किसी भी व्यक्ति को सीधे तौर पर लाभ तो नहीं पहुंचाते परंतु उन्हें भावनाओं में ज़रूर बहा ले जाते हैं। ऐसा ही एक खोखला व निरर्थक विषय है किसी भी स्थान के नाम परिवर्तन का। किसी भी वस्तु अथवा स्थान को किसी भी नाम से पुकारे जाने का म$कसद या उसका कोई भी नाम रखने का अर्थ केवल यही होता है ताकि उस वस्तु अथवा स्थान विशेष का नाम लेने के बाद दूसरा व्यक्ति यह समझ सके कि किस वस्तु अथवा स्थान की बात की जा रही है। गोया नामकरण का अर्थ केवल पहचान बनाए रखना मात्र ही होता है। हां कुछ प्रसिद्ध आदर्श महापुरुषों,दानी सज्जनों,राजनेताओं अथवा शहीदों के नाम पर जो नामकरण किए जाते हैं उनके पीछे यह मकसद ज़रूर रहता है ताकि उस श$ि सयत का नाम जीवित रह सके और आने वाली नस्लें उसके बारे में जान सकें।

परंतु चाहे वे राष्ट्रीय राजनैतिक दल हों या क्षेत्रीय राजनैतिक दल,हमारे देश की सस्ती व हल्की राजनीति करने वाले लगभग सभी राजनैतिक दल इस प्रकार की लोक लुभावनी सियासत के हमेशा से ही शिकार रहे हैं। यहां आप किसी एक विचारधारा को भी इसके लिए जि़ मेदार नहीं ठहरा सकते। मिसाल के तौर पर वामपंथी पार्टियों को देश में ऐसी राजनैतिक विचारधारा रखने वाली पार्टी के रूप में जाना जाता है जो लोक लुभावनी बातें करने के बजाए जनहितकारी बातों पर ज़्यादा य$कीन रखती हैं। परंतु यह वामपंथी ही थे जिनके शासनकाल में कलकत्ता का नाम बदलकर कोलकाता कर दिया गया था। कोलकता शब्द बंगाली अस्मिता का प्रतीक समझा गया तथा बंगाली उच्चारण के अनुरूप माना गया। आ$िखर कलकत्ता से कोलकता हो जाने के बाद कोलकाता वासियों का क्या भला हुआ? इसी प्रकार 1995 में जब महाराष्ट्र की क्षेत्रीय हिंदूवादी राजनैतिक पार्टी शिवसेना ने महाराष्ट्र विधानसभा में जीत हासिल की और सत्ता संभाली उसी समय शिवसेना ने ब बई का नाम बदलकर मुंबई कर दिया। इनका तर्क था कि अंग्रेज़ों ने मुंबई का नाम बिगाडक़र बा बे कर दिया था। इनके अनुसार मुंबई का नाम मुंबा देवी के नाम पर पड़ा था। इसी प्रकार 1996 में मद्रास का नाम बदलकर चेन्नई किया गया था। यह भी तमिल भाषा व तमिल संस्कृति को बढ़ावा देने के नाम पर किया गया।

नाम परिवर्तन किए जाने के लिए न तो कभी देश की जनता कोई आंदोलन करती है न ही इसके लिए किसी प्रकार के आक्रोश जताने या धरना-प्रदर्शन की कोई नौबत आती है। यह सब केवल शातिर दिमा$ग सियासतदानों की ही एक सधी हुई चाल होती है जिसे चलकर सत्ताधारी लोग जनता के बीच लोकप्रियता हासिल करने का एक माध्यम तलाश कर लेते हैं। उत्तर प्रदेश में जब मायावती की सरकार सत्तारुढ होती है तो उसे दलित समाज से जुड़े आदर्श महापुरुषों ंके नाम पर जि़लो,शहरों व $कस्बों के नामकरण करने की चिंता सबसे अधिक सताती है। इतना ही नहीं वे डा० अंबेडकर तथा ज्योतिबा फुले के साथ अपनी व अपनी पार्टी के चुनाव चिन्ह हाथी की मूर्तियां लगवाने तथा इसके नाम पर पार्क-उद्यान आदि का नामकरण करने से भी नहीं चूकतीं। इसी प्रकार जब समाजवादी पार्टी की सरकार बनती है तो वह मायावती द्वारा बदले गए नामों में पुन: परिवर्तन करने लग जाती है। दलितों को,समाजवादियों को या उत्तर प्रदेश,महाराष्ट्र या कोलकता की जनता को नाम परिवर्तन की इस प्रक्रिया से न तो एक समय की रोटी नसीब हो पाती है न ही एक कप चाय इस उपलक्ष में हासिल हो पाती है। इतना ही नहीं बल्कि जो नाम लोगों की ज़ुबान पर चढ़ चुके हैं नाम परिवर्तन किए जाने के बावजूद प्राय: लोग उन जगहों को उसके प्रचलित नामों से पुकारते भी रहते हैं। गोया नाम परिवर्तन की कवायद का असर ज़्यादातर का$गज़ों, $फाईलों या रिकॉर्ड अथवा सरकारी गज़ट आदि में ही दिखाई देता है।

कांग्रेस पार्टी के शासनकाल में ाी अधिकांशत: नेहरू-गांधी परिवार के सदस्यों के नाम पर ही अनेक संस्थाओं,योजनाओं,सेतुओं,बांधों तथा मार्गों आदि के नाम रखे गए। इसी प्रकार आजकल भारतीय जनता पार्टी भी नाम परिवर्तन की अपनी भड़ास निकालने में व्यस्त है। कभी दिल्ली स्थित औरंगजेब रोड का नाम बदलकर एपीजे अब्दुल कलाम मार्ग किया जा रहा है तो कभी मु$गलसराय स्टेशन का नाम बदलकर दीनदयाल उपाध्याय नगर किया जा रहा है। रेलवे के साधारण डिब्बों पर सामान्य अथवा साधारण कोच के बजाए दीनदयाल कोच भगवा रंग से लिखा जाने लगा है। गुडग़ांव का नाम बदलकर गुरुग्राम किया जा चुका है। इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयाग किए जाने की $खबर है। जबकि प्रयाग नाम इलाहाबाद में पहले से ही प्रचलित,स्वीकार्य तथा सरकारी रिकॉर्ड में भी देखा जा सकता है। प्रयाग रेलवे स्टेशन व प्रयाग घाट आदि पहले से ही इलाहाबाद में मौजूद हैं। परंतु इसके बावजूद चर्चा इसी बात की है कि इलाहाबाद का नाम ही मिटा दिया जाएगा। इस प्रकार भाजपा के निशाने पर सैकड़ों ऐसे नाम हैं जिन्हें पार्टी के नेता बदलने की $िफरा$क में हैं। पिछले दिनों ऐसी ही एक कोशिश दिल्ली विश्वविद्यालय के अंतर्गत् आने वाले दयाल सिंह कॉलेज के साथ की गई। दयाल सिंह मजीठिया भारत-पाक विभाजन से पूर्व का एक ऐसा प्रतिष्ठित नाम है जिन्होंने शिक्षा तथा बैंकिग के क्षेत्र में कई ऐसे काम किए जिन्हें भारत व पाकिस्तान कभी $फरामोश नहीं कर सकते। उन्होंने पंजाब नेशनल बैंक की बुनियाद रखी जो आज तक पूरे विश्व में अपनी शाखाएं संचालित कर रहा है। उन्होंने अविभाजित भारत में दर्जनों शिक्षण संस्थाओं के लिए ज़मीनें तथा मोटी धनराशियां दान कीं। दिल्ली-पंजाब व हरियाणा क्षेत्र में प्रचलित ट्रिब्यून न्यूज़ पेपर्स के भी मजीठिया संस्थापक थे।

दयाल सिंह कॉलेज दिल्ली की ज़मीन भी उन्होंने ही दान में दी थी। अब खबर है कि सरकार दयाल सिंह कॉलेज का नाम बदल कर ‘वंदे मातरम’ कॉलेज करने पर विचार कर रही है। हालांकि सरकार की इन कोशिशों में सिख समुदाय के लोगों ने अभी से पलीता लगा दिया है। यहां तक कि दिल्ली के अकाली-भाजपा गठबंधन के विधायक मनजिंदर सिंह सिरसा भी खुलकर कॉलेज ट्रस्ट सोसायटी के विरुद्ध मैदान में आ गए हैं और उन्होंने पुलिस में सोसायटी के विरुद्ध शिकायत ाी दर्ज करवा दी है। कई सिख नेता यह आरोप भी लगा रहे हैं कि भाजपा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के इशारे पर एक सधे हुए एजेंडे पर चलते हुए अल्पसं यक हितों के विरुद्ध कार्य कर रही है। और उसी के तहत वह सरकारी शिक्षण संस्थाओं,शहर के प्रमुख भवनों तथा प्राचीन मार्गों,शहरों तथा जि़लों के नामों का हिंदूकरण करने पर आमादा है। महान शिक्षाविद् दयाल सिंह मजीठिया के नाम तथा उनकी विरास्त को मिटाने की कोशिश करना ऐसा ही एक कुत्सित प्रयास है। इन नेताओं का आरोप है कि बहुत आश्चर्य है कि पाकिस्तान तो दयाल सिंह मजीठिया के नाम पर कॉलेज तथा पुस्तकालय चलाने का फैसला कर रहा है तो दिल्ली में उन्हीं का नाम मिटाने की कोशिश की जा रही है जो बेहद शर्मनाक है। लिहाज़ा किसी भी सरकार को लोकलुभावन फैसलों के बजाए लोकहितकारी $फैसलों की ओर ज़्यादा तवज्जो देनी चाहिए।

लेखक:-  निर्मल रानी

निर्मल रानी 
1618/11, महावीर नगर,
अम्बाला शहर,हरियाणा।
फोन-09729-229728

 

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