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Monday, October 26, 2026

मध्यप्रदेश में सत्ता परिवर्तन का एक वर्ष, सत्ता से बाहर क्यों हुई थी कांग्रेस !

मध्यप्रदेश के राजनीतिक इतिहास में एैसा पहली बार हुआ जब जनता के द्वारा चुनी गयी किसी सरकार के एक नहीं दो नहीं 22 विधायको ने अपनी पार्टी से बगावत करके सरकार को सत्ता से बहार कर दिया। ये एैसा घटनाक्रम है जिसकी दूर-दूर तक किसी ने कल्पना नहीं की थी। 2003 में प्रदेश की सत्ता से बहार हुयी कांग्रेस पार्टी एक लंबे संघर्ष करते हुए 15 साल बाद प्रदेश की सत्ता में वापिस आयी थी। किन्तु सत्ता के संचालन में मनमानी, दिशाहीन नेतृत्व और पार्टी के भीतर ही बड़े नेताओं के मध्य वर्चस्व की जंग ने सरकार को गहरा नुकसान पहुचाया हैं।

कमलनाथ का यह सौभाग्य था कि उनके प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद कांग्रेस प्रदेश की सत्ता में वापिस हुयी, किन्तु मंख्यमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल कांग्रेस के विधायक और कांग्रेस के कार्यकर्ताओं की भावनाओं को दरकिनार कर जिस तरह से वह छिंदवाड़ा में अपनी राजनीति करते है उसी तरह से उन्होंने मुख्यमंत्री के रूप में सरकार चलाने का प्रयास किया जिसका दुष्परिणाम यह रहा कि कांग्रेस विपक्ष में और विपक्षी भाजपा सत्ता में आ गयी। हालांकि ये बात भी कटु सत्य है कि भाजपा ने जिस तरह से कांग्रेस की कमजोर कढ़ियों को तोडकर सत्ता में वापसी का नया मापदण्ड स्थापित किया है यह भले ही आज उनको अच्छा लगें पर आने वाले भविष्य में उसको भी इसके दुष्परिणाम भोगने पड़ेंगे क्योंकि मुख्यमंत्री के रूप में शिवराजसिंह चौहान घोषणाओं का अंबार खड़ा कर रहे हैं। जमीनी सच्चाई अलग है, सत्ता के संचालन में पशीने छूट रहे है।

उल्लेखित है कि म.प्र. में 1993 से 2003 तक लगातार 10 वर्ष कांग्रेस की सरकार रहीं और मुख्यमंत्री के रूप में दिग्विजय सिंह भी इतने ही समय तक पद पर बने रहे। किन्तु बाद के 5 साल में जिस तरह से दिग्विजय ने नौकरशाही को सर पर चढ़ाकर अपने ही पार्टी के विधायक एवं नेताओं को दरकिनार कर सत्ता का संचालन करने का प्रयास किया । उसका ही परिणाम था कि कांग्रेस 2003 में 41 विधायक पर आकर रूक गयी। दिग्विजय की कार्यप्रणाली कभी भी रचनात्मक नहीं रही सयोंग की बात है कि प्रदेश में कमलनाथ सरकार में भी दिग्विजय का अत्यधिक हस्ताक्षेप ने सरकार के भीतर कांग्रेस को गुटो में बांट दिया और उनके अनाप -शनाप बयानबाजी ने सरकार को नुकसान पहुचाने का कार्य किया ।

फाईल फोटो
ज्योतिरादित्य सिन्धिया जो प्रदेश में कांग्रेस के भविष्य के रूप में देखे जा रहे थे। उनको जिस तरह से कमलनाथ एवं दिग्विजय ने हासियें पर डालने का कार्य किया फिर कांग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व ने भी जिस तरह से सिंधिया को गंभीरता से नहीं लिया उसका ही परिणाम निकला कि कांग्रेस में अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर आशंकित सिंधिया ने काँग्रेस में अपने समर्थको के माध्यम से बगावत कराकर सरकार गिराने के बाद भाजपा का दामन थाम लिया। इसके पहले जिस तरह की बयानबाजी दोनो तरफ से होती रही उसने भी समस्या को सुलझाने की जगह उलझाने का कार्य किया। जिसका परिणाम आज सबके सामने है।
काँग्रेस के नेताओं का कहना है कि दिग्विजय अपने पुत्र को प्रदेश की राजनीति में स्थापित करने के चक्कर में सिंधिया को कांग्रेस में हासियें पर करने के लिए प्रयासरत रहे। राजा-महाराजा की इस लड़ाई में कमलनाथ सरकार का बंटा धार हो गया। इतना ही नहीं मुख्यमंत्री के रूप मेें कमलनाथ का कार्यकाल भी सत्ता के अहम में डूब गया था। वह अपने ही विधायक और कार्यकर्ताओं से सीधे मुंह बात नहीं कर रहे थे। इसलिए जब सरकार गिरी तो काँग्रेस कार्यकर्ताओं का यही जवाब था अच्छा हुआ इन पर सत्ता का घमंड सर चढ़ गया था।

भाजपा में जाने के बाद सिंधियां एवं उनके गुट को भाजपा इसलिए हाथोहाथ ले रही है क्योंकि सरकार की वापसी में उन्हीं का योगदान हैं सिंधिया को राज्य सभा सदस्य बनाया गया, उसके बाद जितने लोगो ने बगावत किया उन सभी को उपचुनाव में टिकिट दी गयी और आज मंत्रीमंडल में सिंधिया समर्थको की वजनदारी साफ देखी जा सकती है, जो सिंधिया कांग्रेस में हासियें पर ढकेले जा रहे थे वहीं सिंधिया भाजपा मेँ आने के बाद प्रदेश की राजनीति में प्रथम पंक्ति में आकर खड़े है। यह भी निश्चित लग रहा है कि भविष्य में जब भी केन्द्रीय मंत्रीमंडल में फेरबदल होगा सिंधिया को उसमें जरूर शामिल किया जाएंगां। निगम एवं अन्य नियक्तियों में सिंधियां समर्थको ंको प्राथमिकता दी जाएंगी यह साफ देखा जा सकता है। सिंधिया के लोगो को प्राथमिकता से भाजपा के भीतर ही भले ही असंतोष हो पर बगावत करने की ताकत किसी में नहीं है।

मार्च 2020 में प्रदेश में हुएं अचानक सत्ता परिवर्तन में कांग्रेस सरकार को समर्थन दे रहे बालाघाट जिले के वारासिवनी विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय विधायक प्रदीप जायसवाल जिनकी टिकिट 2018 में अंतिम समय में कांटकर कांग्रेस ने उनको बागी बनकर चुनाव लड़ने के लिए मजबूर कर दिया। और जब कांग्रेस सरकार को समर्थन देने की बात आयी तो जायसवाल ने कमलनाथ के साथ अपने संबंधों को ध्यान में रखते हुए पूरा समर्थन भी दिया जिसके एवज में उन्हें खनिज मंत्री बनाया गया , पर जब सरकार गिरी तो उनके समक्ष बड़ा सवाल यही खड़ा हुआ कि अगर वह सत्ता के साथ नहीं जाते तो निर्दलीय विधायके के रूप में क्षेत्रीय विकास के लिए वह कुछ कर नहीं पाएंगे। ये सारे गुणाभाग के बाद कांग्रेस सरकार के जाते ही जायसवाल ने अपने रणनीति बदली और वह भाजपा सरकार के साथ आ गएं उसका लाभ उनको यह मिला कि उन्हे म.प्र. खनिज विकास निगम का अध्यक्ष बना दिया जिन्हे केबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त है

। राजनीति के इस पावर के साथ जायसवाल क्षेत्र में विकास के उन सभी कार्यो को पूर्ण करने में लगे है जो कहीं न कहीं क्षेत्रीय विकास को मजबूत करेंगा। हालांकि वह स्वयं इस बात को कहने में संकोच नहीं करते की मेरा भविष्य जो भी पर वारासिवनी का भविष्य सुरक्षित है उसमें कहीं कोई कमी नहीं आएंगी।

जायसवाल के इस कदम को भले की कांग्रेसी सत्ता की लालच की संज्ञा दे पर जायसवाल का दो टूक कहना है कि मैने कांग्रेस नहीं छोड़ी, कांग्रेस ने ही मुझे दूर किया ये अलग बात है कि 2018 के चुनाव में जनता के सहयोग से जीत हासिल कर ली अन्यथा मेरा भविष्य तो कांग्रेस ने खराब ही कर दिया था, इसलिए मुझ पर आरोप लगाने के पहले कांग्रेस को खुद अपने गिरेबान में झांककर देखना चाहिए।

म.प्र. में वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में फिलहाल भाजपा सरकार के पास इतना समर्थन है कि 2023 तक वह अपना कार्यकाल आसानी से पूरा करेगी , उसमें कही कोई दिक्कत नहीं आएंगी। लेकिन कांग्रेस पार्टी जो अपनी गलतियों से सबक नहीं लेती आज भी पुराने तौर तरीके पर ही निर्भर है नेताओं में वर्चस्व की जंग कमजोर संगठन दिशाहीन नेतृत्व और कार्यकर्ताओं में निराशा के हालात साफ देखे जा सकते है।

कमलनाथ के पास कार्य करने की कोई ठोस रणनीति नहीं दिखती तो दूसरी तरफ दिग्वििजय की अपनी ढपली अपना राग के चलते पार्टी में बडे नेताओं की अलग-अलग दिशाएं साफ दिखती है वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस का केन्द्रीय नेतृत्व भी म.प्र. में दूर-दूर तक हस्ताक्षेप करते हुए नहीं दिखता। इसलिए काँग्रेस का जो भविष्य है वह जबानी तौर पर भले ही उज्जवल लगे पर वास्तविकता ठीक इसके विपरीत है। भविष्य के नगर निगम, नगरपालिका, जिला पंचायत, जनपद पंचायत चुनाव कांग्रेस और भाजपा दोनो के राजनीतिक भविष्य का तय करेंगें।
– रहीम खान

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