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Monday, July 27, 2026

(रक्षा बंधन पर विशेष) आज भी प्रासंगिक है राखी का पर्व

Raksha bandhan history in hindi

प्राचीनकाल से हिन्दुओं समाज की कार्यकुशलता और पर्व त्योहारों की निरन्तरता के पीछे उनकी ‘पर्व व्यवस्था’ की अवधारणा महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती रही है। भारत के प्रत्येक प्रदेश में जाति और वर्ण में, अपने अपने त्योहार संयुक्त रूप से एवं अलग-अलग मनाने की परम्परा सदियों से चली आ रही है। हिन्दुओं ने समाज में कार्य विभाजन के आधार पर जिस वैज्ञानिक प्रणाली को विकसित किया था वह वर्ण व्यवस्था के नाम से प्रचलित रही है। समाज में हर वर्ण का कार्य बंटा हुआ था। इसी तरह प्रत्येक वर्ण का अपना एक-एक मुख्य त्योहार भी माना जाता था भले ही पूरा देश उन त्योहारों को पूरे उत्साह के साथ मानता था और कहीं कोई भेदभाव दिखाई नहीं देता था।

पर्व व्यवस्था के अनुसार श्रावणी ब्राह्मणों का, दशहरा क्षत्रियों का, दीपावली वैश्यों और होली शुद्रों का मुख्य पर्व मानकर मनाने की प्रथा थी। प्राचीन काल से श्रावणी अर्थात् रक्षा बन्धन प्रति वर्ष सावन की पूर्णिमा को मनाया जाता है। पौराणिक युग, मध्य काल और वत्र्तमान समय में रक्षाबन्धन का त्योहार अलग-अलग रूपों में दिखाई देता है। यद्यपि इसकी निरन्तरता में कहीं व्यवधान दृष्टिगोचर नहीं होता।

ऐसा विश्वास किया जाता है कि देवासुर संग्राम में जब देवता निरन्तर पराजित होने लगे तब इन्द्र ने अपने गुरु बृहस्पति से कोई ऐसा उपाय करने की प्रार्थना की जिससे उन्हें रण में विजय श्री प्राप्त हो। कहा जाता है कि देव गुरु बृहस्पति ने श्रावण पूर्णिमा के दिन ऑक के रेशों की राखी बनाकर, रक्षा विधान सम्बन्धी मंत्रों का पाठ करते हुए, इन्द्र की कलाई पर रक्षा कवच के रूप में बांध दिया। इस प्रकार मानव संस्कृति में पहला रक्षा सूत्र बांधने वाला बृहस्पति देवगुरु के पद पर प्रतिष्ठित था। तब से ब्राह्मणों द्वारा अपने यजमानों को राखी बांधने का प्रचलन प्रारम्भ हुआ मानते हैं।

यह भी कहा जाता है कि युद्ध प्रयाण के समय देवराज इन्द्र की कलाई पर उनकी पत्नी इन्द्राणी ने गायत्री मंत्र का पाठ किया और राखी बांधते हुए कहा कि मेरे सत का प्रतीक यह धागा रणक्षेत्र में आपकी रक्षा करेगा। इस प्रकार रक्षक सूत्र ने देवताओं में जिस आत्म विश्वास को जगाया उसी के फलस्वरूप देवता युद्ध में विजयी रहे। यहां पर स्पष्ट करना आवश्यक है कि राखी बांधने वाला स्वयं रक्षा करने में सक्षम होता था इसलिए रक्षा का वरदान देता था। बाद में यह परम्परा बदलते हुए वत्र्तमान रूप में आ गई जिसमें राखी बांधने वाला उस व्यक्ति से अपनी रक्षा का आश्वासन चाहता है जिसे वह राखी बांधता है। ऐसी मान्यता है कि मंत्र द्वारा पवित्र किए हुए रक्षा कवच को जो व्यक्ति श्रावणी के दिन धारण करता है, वह वर्ष भर स्वस्थ और सुखी रहता है। उसे किसी तरह की व्याधि नहीं सताती।

द्वापर काल में जब भगवान श्रीकृष्ण के हाथ में चोट लगी तब द्रौपदी ने अपने आंचल का किनारा फाड़ कर उनके हाथ पर बांध दिया। इसे भगवान श्रीकृष्ण ने अपने ऊपर उधार माना एवं द्रौपदी चीर हरण के समय द्रौपदी की लाज बचा कर अपना उधार चुकाया। इस प्रसंग को भी राखी का प्रारम्भ माना जाता है। ईसा से पूर्व जब सिकन्दर ने सम्राट पुरू पर आक्रमण किया तो एक यूनानी स्त्री, कुछ लोगों की मान्यता है कि स्वयं सिकन्दर की पत्नी, ने पोरस को राखी बांध कर सिकन्दर को न मारने का वचन ले लिया था। फलतः युद्ध में अवसर मिलने पर भी पोरस ने सिकन्दर का वध नहीं किया क्योंकि बहन की राखी भाई को उसके सुहाग का स्मरण करवाती रही। कुछ लोगों का मत है कि पोरस को राखी बांधने वाली स्त्री रूखसाना सिकन्दर की बहन थी।

धीरे धीरे जब भारतीय समाज को अक्रान्ताओं द्वारा पद दलित किया गया तो नारी असुरक्षित होने लगी और उसकी सुरक्षा का दायित्व पिता, भाई और पति पर आ गया। पति की रक्षा के लिए पति की कलाई पर राखी बांधने वाली नारी अपनी रक्षा के लिए भाई की कलाई पर राखी बांधने लगी। दुर्भाग्य यह है कि आज बहन भाई द्वारा भी रक्षित नहीं रही और बहिनें भी भौतिकता की चमक दमक से चमत्कृत होने लगीं।

समय-समय पर राखी ने भारतीय जन मानस को आन्दोलित ही नहीं किया बल्कि इतिहास के प्रवाह तक को बदल डाला है। इसने धर्म, रक्त, भाषा और जातीयता की सीमाओं को लांघकर लोगों को भावनात्मक बंधन में बांधा है। राखी के कच्चे धागों ने लौह बन्धनों से भी अधिक सशक्त भूमिका का निर्वाह किया है। इस सन्दर्भ में कर्णवती-हुमायूं, रानी बेलुनादियार-टीपू सुलतान, चांद बीबी-महाराणा प्रताप, रामजनी-शाह आलम सानी की कथायें सर्वविदित हैं। राखी के बंधन का सफल भावनात्मक प्रयोग लार्ड कर्जन के काल में विश्व कवि रविन्द्र नाथ टैगोर ने किया। कवियित्री महादेवी वर्मा ने मैथिलीशरण गुप्त और उनके भाईयों, सुमित्रानन्दन पंत, इलाचन्द्र जोशी, प्रेमचन्द, जयशंकर प्रसाद और महाप्राण निराला को राखी के मोहपाश में बांधा हुआ था।

विश्व प्रसिद्ध बनारस हिन्दु विश्व विद्यालय तो राखी के धागों के कारण ही अस्तित्त्व में आया। पंडित मदनमोहन मालवीय जी ने काशी नरेश को राखी बांधी और बदले में विश्वविद्यालय स्थापित करने के लिए भूमि दक्षिणा में प्राप्त की। वास्तव में राखी एक ऐसा पावन बंधन है जिसके स्नेह सूत्र में बंधा कठोर से कठोर हृदय द्रवित हो उठता है। आजकल ऐसा लगने लगा है कि राखी का संबंध मात्र शरीर की रक्षा के आश्वासन से है अथवा सब लोगों, विशेष रूप से भाई बहन, के मिल बैठने का पर्व है। राखी के बहाने वर्ष में एक बार ही सही भाई बहन के मिलन से किसे इंकार हो सकता है। परन्तु यह संबंध भौतिक दृष्टि से रक्षा का नहीं है। यदि ऐसा होता तो राखी केवल ऐसे सबल लोगों को बांधी जाती जो रक्षक की भूमिका का निर्वाह करने में सक्षम होता। राखी मात्र भाईयों को नहीं बांधी जाती फिर बड़ी बहन का नन्हें मुन्ने भाईयों का अथवा छोटे छोटे लड़के और लड़कियों का राखी बांधने का औचित्य ही नहीं रहता।

आजकल की भौतिक चकाचैंध ने बहनों-भाईयों, ब्राह्मणों और यजमानों को अपने बंधन में बांध लिया है। अत्यन्त स्नेह और सादगी का यह त्योहार भी दिखावे और लेन-देन के चक्रव्यूह में फंसता जा रहा है। ब्राह्मण यजमानों को दक्षिणा के लालच में राखी बांधते हैं तो बहन भाई अपनी सम्पन्नता के दिखावे में अधिक रूचि लेते हैं। इतना होने पर भी भारत में अभी परस्पर रिश्तों में मिठास बाकी है और लोग भावनात्मक रूप से परस्पर जुड़े हुए हैं। ऐसे त्योहार इन रिश्तों को सुदृढ़ता प्रदान करते हैं। आज भी इस त्योहार की प्रासंगिकता बनी हुई है। इसमें समता, एकता, संरक्षण एवं स्नेह के समन्वय के साथ-साथ भाई-बहन का पवित्रतम सनातन संबंध जुड़ा हुआ है।

रक्षा बंधन का त्योहार ऐसे अवसर पर मनाया जाता है जब ग्रीष्म ऋतु से तप्त वसुन्धरा सहसा हरि वसना होकर अपनी उर्वरा शक्ति का परिचय देती है। आकाश की अनन्तता को सावन के मेघ सगुण बनाते हैं। आकाश में बिजली भी अपने भाई-बहनों की कलाई सजाने के लिए आई जान पड़ती है। पवन की गति में सिहरन और लास्य का संचार होता है। चारों ओर जलाशय जल से आप्लावित होकर गन्धमयी धरा को रसवन्ती बना देते हैं और सारे वातावरण में मादकता लहराने लगती है। यह वर्षा के उत्कर्ष का महीना होता है। इसी मास में हरियाली तीज भी मनाई जाती है। भारतीय जन जीवन में श्रावण मास का अपना ही महत्त्व हैं विश्व के किसी भी अन्य देश में वर्षा के समय ऐसे उत्सव नहीं मनाये जाते।

ज्योतिष की दृष्टि से इस मास में सूर्य चन्द्र राशि में प्रवेश करता है और चन्द्रमा स्वयं पुष्य नक्षत्र और अश्लेषा नक्षत्रों में होता है। इसको वर्षा का उत्तम नक्षत्र माना जाता है। अंकुरित बीजों में पत्ते और अन्य रूपों का उदय होता है। अनेकानेक व्याधियों का उपचार करने वाली औषधियां इस ऋतु में प्राप्त होती हैं एवं उनका शोधन किया जाता है। निरन्तर वर्षा और आद्र्रता के कारण वात और कफ जनित रोगों का प्रकोप हो जाता है इस मास में।

आश्चर्य की बात यह है कि आज रक्षा-बन्धन का जो स्वरूप है उस भाई बहन के पावन स्नेह बंधन की कोई कथा वैदिक पौराणिक युग के साहित्य में उपलब्ध नहीं हैं। ऐसा लगता है कि भाई बहन के सम्बन्धों में राखी का युग तब आया जब भारत पर विदेशी आक्रमण होने लगे। तब यह राखी एक भिन्न संस्कृति के आक्रमण से भारतीय संस्कृति की रक्षा का साधन बनी। आक्रमक संस्कृति में संगोत्री विवाह का प्रचलन था जो भारतीय संस्कृति में वर्जित था इस प्रकार राखी संगोत्री, संपिडी विवाह सम्बन्धों की वर्जना बनी। ऐसे सम्बन्धों से रक्षा का बंधन बनी।

आज रक्षा बन्धन का त्योहार पूरे देश में धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन बहनें प्रातः स्नान कर कांसे के थाल में मिठाई, कुमकुम अक्षत और रंग-बिरंगी राखियां स़जा कर लाती हैं। अपनी शुभ कामनाएं और स्नेह राखी के रूप में भाईयों के दाहिनें हाथ पर बांधती हैं, तिलक कर मुंह मीठा करवाती है। भाई धन-वस्त्र आदि भेंट स्वरूप देकर अपना दाहिना हाथ बहिनों के सिर पर रख कर रक्षा का आश्वासन देते हैं। भाई बहन के प्रेम का ऐसा अनूठा उदाहरण विश्व में कहीं अन्यत्र उपलब्ध नहीं है।

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