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Saturday, September 26, 2026

सत्ता के सारे मोहरे चुक चुके हैं तो नारा हिन्दू राष्ट्र का !

दुनिया के सबसे पुराने लोकतांत्रिक देश अमेरिका में 16 फीसदी लोग किसी धर्म को नहीं मानते । लेकिन दुनिया के सबसे बडे लोकतांत्रिक देश भारत में सत्ता ही खुद को हिन्दू राष्ट्र बनाने मानने की कुलबुलाहट पाल रही है । ब्रिटेन में करीब 26 फीसदी लोग किसी धर्म को नहीं मानते । लेकिन भारत में सत्ताधारी पार्टी खुले तौर पर ये कहने से नहीं हिचक रही है कि भारत को हिन्दू राष्ट्र हो जाना चाहिये। यूरोप-अमेरिका के तमाम देशों में हर धर्म के लोगो की रिहाइश है।

नागरिक हैं। लेकिन कहीं धर्म के नाम पर देश की पहचान हो ये अवाज उठी नहीं । दुनिया के एक मात्र हिन्दू राष्ट्र नेपाल की पहचान भी दशक भर पहले सेक्यूलर राष्ट्र हो गई। यानी जैसे ही राजशाही खत्म हुये। चुनाव हुये । संविधान बना । उसके बाद नेपाल के 80 फीसदी से ज्यादा नेपाल में रहने वाले हिन्दुओ ने ये अवाज दुबारा नहीं उठायी कि वह नेपाल को हिन्दु राष्ट्र बनाना चाहते हैं। और भारत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हो या हिन्दू महासभा, उसने भी नेपाल के हिन्दू राष्ट्र के तमगे को खूब जीया । इस हद तक की हिन्दुत्व का सवाल आने पर बार बार नेपाल का जिक्र हुआ ।

लेकिन नेपाल में भी जब राजशाही खत्म हुई और हिन्दू राष्ट्र का तमगा वहां की चुनी हुई सरकार ने खत्म किया तो फिर हिन्दुत्व के झंडाबरदरार संगठनों ने कोई आवाज उठाने की हिम्मत नहीं की । लेकिन भारत में सवाल तो इस लिहाज से उलझ पड़ा है । एक तरफ योदी आदित्यनाथ को हिन्दुत्व का झंडाबरदार दिखाया जा रहा है दूसरी तरफ मोदी इस पर खामोशी बरत रहे हैं। एक तरफ योगी के जरीये हिन्दू महासभा के उग्र हिन्दुत्व की थ्योरी की परीक्षा हो रही है।

दूसरी तरफ आरएसएस गोलवरकर से लेकर शेषाद्री तक के दौर में भारत और भारतीय के सवाल से आगे बढ़ना नहीं चाह रहे हैं । एक तरफ योगी के सीएम बनने से पहले मोदी के लिये योगी भी फ्रिंज एलीमेंट ही थे । और मोदी ने पीएम उम्मीदवार बनने से लेकर अभी तक के दौर में बीजेपी के बाहर अपना समर्थन का दायरा इतना बड़ा किया कि वह पार्टी से बड़े दिखायी देने लगे ।

दुनिया के तमाम देशों में भारत के प्रफोशनल्स की चर्चा है । और उसके साथ ही शिक्षा से लेकर हेल्थ सर्विस और पीने के पानी से लेकर भूखे भारत का सच संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट तक में दिखायी दे रहा है और ऐसे मोड़ पर भारत में सत्ता के लिये चुनावी जीत उस सोशल इंजीनियरिग पर जा अटकी है, जो जाति-प्रथा को बनाये रखने पर जोर देती है। और वोटो का ध्रुवीकरण धर्म की उस सियासत पर जा टिका है, जहां 20 करोड़ मुसलमानों की कोई जरुरत सत्ता में रहने के लिये सत्ताधारी पार्टी को है ही नहीं । तो फिर आगे का रास्ता जाता किधर है ।

लेकिन मोदी के समर्थन के दायरे में ज्यादातर वही फ्रिंज एलीमेंट आये जो बीजेपी के सत्ता प्रेम में बीजेपी के कांग्रेसीकरण का होना देख मान रहे थे । और मोदी ने दरअसल दिल्ली कूच की तैयारी में बीजेपी के उस प्रोफेशनल पॉलिटिक्स को ही दरकिनार किया, जिसके आसरे सिर्फ चुनाव की जीत हार राजनीतिक मुद्दों पर टिकती । तो इन हालातो में सवाल तीन है ।

पहला क्या गोरक्षा के नाम पर अलवर में जो हुआ उस तरह की घटना के पीछे कहीं फ्रिंज एलीमेंट को कानूनी जामा तो नहीं पहनाया जा रहा है। दूसरा अगर कानून व्यवस्था के दायरे में फ्रिंज एलीमेंट पर नकेल कसी जायेगी, जैसी हिन्दू वाहिनी के रोमियो स्कावयड पर नकेल कसी जा सकती है तब योगी के महंत का औरा सीएम के संवैधानिक पद से कैसे टकरायेगा और उसके बाद हालात बनेंगे कैसे। और तीसरा योगी के हिन्दुत्व राग से उत्साही समाज से मोदी पल्ला कैसे झाडेंगे ।

ये ऐसे सवाल है जो मोदी और योगी को एक दौर के वाजपेयी और आडवाणी की जोडी के तौर पर बताये जा सकते हैं । लेकिन समझना ये भी होगा वाजपेयी-आडवाणी की जोड़ी चुनावी हिसाब-किताब को सीटो के लिहाज से नहीं बल्कि परसैप्शन के लिहाज से देश को प्रभावित करती थी । यानी वाजपेयी नरम हैं आडवाणी कट्टर है, ये परसेप्शन था । लेकिन मोदी नरम है और योगी कट्टर हैं ये परसैप्शन के आधार पर चल नहीं सकता क्योंकि योगी के हाथ में देश के सबसे बडे सूबे की कमान है। और वहां उन्हें गवर्नैंस से साबित करना है कि उनका रास्ता जाता किधर है।

लेकिन समझना ये भी होगा कि एक वक्त जनसंघ के अधिवेशन में ही जब हिन्दू राष्ट्र की प्रस्तावना रखी गयी तो तब के सरसंघचालक गुरु गोलवरकर ने ये कहकर खारिज किया कि जनसंघ को संविधान के आधार पर काम करना चाहिये। और सच यही है कि उसके बाद ही दीन दयाल उपाध्याय ने एकात्म-मानवतावाद की थ्योरी को आत्मसात किया। और जनसंघ ने भी एकात्म-मानवतावाद को ही अपनाया। और तो और दत्तोपंत ठेंगडी ने भी इसी बात की वकालत की थी कि संघ को भी हिन्दुत्व से इतर उस रास्ते को पकड़ना होगा जिसपर हिन्दुत्व धर्म नहीं बल्कि जीवन पद्दति के तौर पर उभरे।

यूं आरएसएस के पन्नों को पलटने पर ये भी साफ होता है कि पचास के दशक में हिन्दु राजाओं को भी सेकुलर के तौर पर ही गुरुगोलवरकर ने मान्यता दी । मसलन सम्राट अशोक को हिन्दू राजा नहीं बल्कि सेकुलर राजा के तौर पर ही माना जाता है। तो नया सवाल ये भी निकल सकता है कि फिर एक वक्त के फ्रिंज एलीमेंट माने जाने वाले योगी आदित्यनाथ को संवैधानिक पद, वह भी सीएम की कुर्सी पर क्यों बैठाया गया । क्या ये पहल गौरवशाली हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना तले पनपी । हो जो भी लेकिन 21 वीं सदी में जब भारत की पहचान एक बडे बाजार से लेकर उपभोक्ता समाज के तौर पर कहीं ज्यादा है ।

दुनिया के तमाम देशों में भारत के प्रफोशनल्स की चर्चा है । और उसके साथ ही शिक्षा से लेकर हेल्थ सर्विस और पीने के पानी से लेकर भूखे भारत का सच संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट तक में दिखायी दे रहा है और ऐसे मोड़ पर भारत में सत्ता के लिये चुनावी जीत उस सोशल इंजीनियरिग पर जा अटकी है, जो जाति-प्रथा को बनाये रखने पर जोर देती है। और वोटो का ध्रुवीकरण धर्म की उस सियासत पर जा टिका है, जहां 20 करोड़ मुसलमानों की कोई जरुरत सत्ता में रहने के लिये सत्ताधारी पार्टी को है ही नहीं । तो फिर आगे का रास्ता जाता किधर है । क्योंकि हिन्दुस्तान का वैभवशाली अतीत भी भारत को हिन्दू राष्ट्र के तौर पर कभी ना तो पहचान दे पाया और ना ही उसका प्रयास किया गया ।

और मुगलिया सल्तनत से लेकर अंग्रेंजों के दौर में भी हिन्दुओ की तादाद 80 फीसदी रही । लेकिन हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना को बदलने के बदले हर सत्ता ने यहां की जीवन पद्दति को अपनाया और संसाधनों की लूट के जरीये अय्याशी की । और राजनीति की इसी अय्याशी को लेकर आजादी के बाद महात्मा गांधी ने आजादी के बाद कांग्रेस की सत्ता को लेकर सवाल भी उठाये । लेकिन आजादी के बाद के 70 बरस के दौर में देश के हर राजनीतिक दल ने सत्ता भोगी। और गरीब हिन्दुस्तान पर लोकतंत्र की दुहाई देकर राज करने वाले नेताओ के सरोकार कभी आम जनता से जुडे नहीं। तो आखिरी सवाल यही है कि क्या हिन्दू राष्ट्र की दुहाई भारत की अंधेरे गलियों में अतीत की रोशनी भर देती है । या फिर सत्ता के सारे मोहरे चुक चुके हैं तो नारा हिन्दू राष्ट्र का है।

:- पुण्य प्रसून बाजपेयी

punya-prasun-bajpaiलेखक परिचय :- पुण्य प्रसून बाजपेयी के पास प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में 20 साल से ज़्यादा का अनुभव है।  प्रसून  देश के इकलौते ऐसे पत्रकार हैं, जिन्हें टीवी पत्रकारिता में बेहतरीन कार्य के लिए वर्ष 2005 का ‘इंडियन  एक्सप्रेस गोयनका  अवार्ड फ़ॉर एक्सिलेंस’ और प्रिंट मीडिया में बेहतरीन रिपोर्ट के लिए 2007 का रामनाथ  गोयनका अवॉर्ड मिला।

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