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Friday, July 30, 2021

जनतंत्र की सुरक्षा के लिए निरंतर जागते रहो : राम नाईक

Emergency, the Governor, Ram Naik,लखनऊ – आपातकाल स्वतंत्र भारत के इतिहास का काला अध्याय था। आपातकाल को 40 वर्ष पूर्ण हो गये है। दो पीढि़यों का समय बीत गया है मगर आपातकाल की चर्चा आज भी प्रासंगिक है। अगर आपातकाल न देखा होता तो शायद वे राजनैतिक जीवन में प्रवेश करके चुनाव न लड़ते। 
 
प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक ने आज इण्डियन फेडरेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्टस द्वारा प्रेस क्लब में आयोजित एक कार्यक्रम ‘आपातकाल की याद‘ में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि आपातकाल का संदेश है ‘जनतंत्र की सुरक्षा के लिए निरंतर जागते रहो’, इसकी प्रासंगिकता कल थी, आज भी है और भविष्य में भी रहेगी। उन्होंने कहा कि सतत् जागरूकता लोकतंत्र की मांग है। राज्यपाल ने आपातकाल के दौर को याद करते हुए विस्तार से संस्मरण व अपने अनुभव बतायें। आपातकाल के कारण देश का काफी नुकसान हुआ। आपातकाल उनके जीवन में नया मोड़ लेकर आया। वे इस्पात फर्नीचर उद्योग में देश के दूसरे सबसे प्रतिष्ठित संस्थान खीरा स्टील वक्र्स, मुंबई में कम्पनी सेक्रेटरी व अकाउंटेंट के पद पर कार्यरत थे। 
 
1969 में भारतीय जनसंघ के कार्य हेतु उन्होंने पाँच साल के लिए नौकरी से अवकाश ले लिया था। 1974 में पार्टी का कार्य करते हुए उन्हें पाँच साल हो गये थे। 25-26 जून, 1975 में देश में आपातकाल घोषित कर दिया गया। जिसके बाद जनसंघ तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कई कार्यकर्ता गिरफ्तार कर लिये गये। वे संगठन का संयोजक सचिव थे मगर पुलिस की हिट लिस्ट में होने के बावजूद उन्हें गिरफ्तार नहीं किया गया क्योंकि पुलिस की नजर में वे ‘आक्रामक‘ कार्यकर्ता न होकर एक साधारण कार्यकर्ता थे। 
 
श्री नाईक ने बताया कि आपातकाल में राजनैतिक दृष्टि से उन्हें दो प्रकार की जिम्मेदारी दी गयी थी। पहली, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं जनसंघ के जो कार्यकर्ता गिरफ्तार हो गये थे उनके परिवार का ध्यान रखना। दूसरी जिम्मेदारी जनसंघ, समाजवादी पार्टी, कांग्रेस (ओ) और सर्वोदय मण्डल के बीच समन्वय करना था। वे सभी प्रमुख पार्टियों व जयप्रकाश नारायण के बीच समन्वय का कार्य करते थे। व्यवस्था देखने के साथ-साथ आपातकाल के विरोध में अपने एक कांग्रेसी दोस्त के घर में गोपनीयता बनाये रखने के लिए अलग-अलग हैण्ड राईटिंग में हैण्डबिल तथा स्टेन्सिल तैयार करते थे। 
राज्यपाल ने बताया कि एक बार उन्होंने अपने एक सहयोगी बबन कुलकर्णी, महासचिव, मुंबई जनसंघ को अपनी स्कूटर से हैण्डबिल व स्टेन्सिल लेकर मुलुंड जाने के लिए दादर स्टेशन पर छोड़ा। आधे घण्टे के बाद फोन पर श्री कुलकर्णी की हार्ट अटैक के कारण निधन की सूचना मिली। श्री कुलकर्णी के पास जो ब्रीफकेस था उसे एक दोस्त के माध्यम से वापस मंगवाया क्योंकि उसमें हैण्डबिल में आपातकाल में अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा जेल में लिखी कविता ‘टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते‘ लिखी थी। 
 
राज्यपाल ने विस्तार से बताते हुए कहा कि 1976 में मंुबई विधान परिषद से दो सीटों के लिए स्नातक चुनाव होना था। चुनाव में जीत के लिए बुद्धजीवियों को आगे करने की दृष्टि से डाॅ0 वसन्त कुमार पंडित जो ज्योतिष विज्ञान के मूर्धन्य विद्वान थे, का नाम प्रस्तावित किया गया था। डाॅ0 पंडित ने आपातकाल से एक माह पूर्व साप्ताहिक पत्रिका आर्गनाइजर में प्रकाशित अपने एक लेख में लिखा था कि माह जून में देश में कुछ विशेष घटित होने वाला है। दूसरे प्रत्याशी प्रो0 जी0बी0 कानीटकर थे जो उनके राजनैतिक गुरू भी थे। उन्होंने सत्याग्रह किया था और वे जेल में थे। आपातकाल के विरोध में शरयू कोल्हटकर का उल्लेख करते हुए बताया कि शरयू के पति एक लगनशील कार्यकर्ता थे जिनकी मृत्यु हार्ट अटैक से हो गयी थी। दूसरे दिन मतदान था फिर भी शरयू ने पति के खोने के बावजूद मतदान किया। इससे सहजता से अनुमान लगाया जा सकता था कि आम जनता आपातकाल का किस हद तक विरोध करती थी। जनसंघ ने दोनों सीटें 70 प्रतिशत से अधिक वोट पाकर जीती, जिसके कारण यह माना गया कि बुद्धिजीवी वर्ग आपातकाल के विरोधी हैं।
 
श्री नाईक ने बताया कि आपातकाल के दिनों में उनकी सक्रियता के चलते एक दिन उनके घर पर पुलिस द्वारा दबिश दी गई। पूरे घर की तलाशी हुई मगर पुलिस के हाथ कोई कागज नहीं लगा। आपातकाल का अखिल भारतीय स्तर पर सत्याग्रह आयोजित करके विरोध करने का निर्णय हुआ। मुंबई का समन्वयक होने के कारण यह जिम्मेदारी उनकी बनती थी। मुंबई में सैकडों कार्यकर्ताओं ने सत्याग्रह किया। उन्होंने पत्रकारों का भी सत्याग्रह करवाया जिसमें मिड डे, महाराष्ट्र टाईम्स, इण्डियन एक्सप्रेस जैसे बडे़ समाचार पत्र थे, जिसका बहुत अच्छा प्रभाव पड़ा। 
 
 
अन्ततः प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल की समाप्ति का निर्णय किया और चुनाव घोषित हो गये। पूरे देश में बदलाव आया। मुंबई की लोकसभा की सभी छः सीटांे पर जनसंघ की जीत हुई। जनसंघ, कांग्रेस (ओ), समाजवादी पार्टी आदि पार्टियाँ मिलकर जनता पार्टी की सरकार बनी तथा उन्हें जनता पार्टी का मुंबई से पहला अध्यक्ष बनाया गया। 
 
राज्यपाल ने बताया कि तीन माह बाद महाराष्ट्र विधानसभा का चुनाव होना था। जनसंघ के अलिखित नियम के अंतर्गत जनसंघ का संगठन मंत्री चुनाव नहीं लड़ सकता था। वे संगठन मंत्री थे। अटल बिहारी वाजपेयी, नानाजी देशमुख और अन्य कार्यकर्ताओं के आग्रह पर उन्होंने चुनाव लडकर बोरीवली से सबसे ज्यादा मतों से विजयी हुए। मुंबई की 34 की 34 सीट हमारी जनता पार्टी को मिली। यह चुनाव उन्होंने आपातकाल से निर्मित परिस्थिति के कारण ही लड़ा था। यही से उनके राजनैतिक जीवन में नया मोड़ आया। वे तीन बार विधायक रहे तथा पाँच बार लोकसभा का सदस्य निर्वाचित हुए। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में कई मंत्रालयों में वे मंत्री रहे तथा पाँच साल तक पेट्रोलियम मंत्री रहने का अवसर केवल उन्हें ही प्राप्त है। उन्होंने कहा कि अगर आपातकाल न होता तो वे चुनावी राजनीति के क्षेत्र में नहीं होते। 
 
इस अवसर पर के0 विक्रम राव, अध्यक्ष, इण्डियन फेडरेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्टस, वरिष्ठ पत्रकार हसीब सिद्दीकी अध्यक्ष श्रमजीवी पत्रकार संघ, सिद्धार्थ कलहंस, विश्वदेव राव प्रभारी सोशल मीडिया सेल इण्डियन फेडरेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्टस व अन्य वरिष्ठ पत्रकारगण उपस्थित थे। राज्यपाल ने इस अवसर पर जमुना प्रसाद बोस, श्याम कुमार व अन्य पत्रकारों को अंग वस्त्र देकर सम्मानित भी किया।
रिपोर्ट :- शाश्वत तिवारी 

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