तमिलनाडुः सजा खूब लेकिन बहुत कम

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तमिलनाडु में चुनाव के दौरान एक एतिहासिक घटना हुई, जिसकी तरफ हमारे तमाशा-चैनलों और अखबारों ने बहुत कम ध्यान दिया। वह घटना यह थी कि दो विधानसभा क्षेत्रों का चुनाव स्थगित हो गया। ऐसे स्थगन तो कई बार हुए हैं लेकिन तमिलनाडु में हुआ यह स्थगन अपूर्व था। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। ये चुनाव स्थगित हुए-पैसा बांटने के लिए! मतदाताओं को नोट दो और उनसे वोट लो। आप कह सकते हैं कि यह कौन बड़ी बात है? यह तो हर चुनाव में होता है और हर चुनाव-क्षेत्र में होता है। पैसे, शराब, साड़ियां, कपड़े, गहने और क्या-क्या चीजें नहीं बांटी जाती हैं। लेकिन अब तक जो भी चुनाव स्थगित हुए हैं, वे मतदान-केंद्रों पर कब्जे, उम्मीदवारों की हत्या, व्यापक हिंसा, मतपत्रों की धांधली आदि के कारण हुए हैं लेकिन चुनाव-आयोग ने पहली बार यह साहसिक कदम उठाया है।

चुनावी भ्रष्टाचार को रोकने वाला यह सबसे जरुरी कदम है। आयोग ने पहले 16 मई का चुनाव 23 को किया और फिर उसे 21 मई को स्थगित करके 13 जून को करना पड़ा। अरावाकुरिची और तंजाउर विधानसभा क्षेत्रों के चुनाव स्थगन पर राज्यपाल के रोज़याह ने आपत्ति की। उन्होंने कहा कि उन दोनों क्षेत्रों के दो विधायक राज्यसभा के चुनाव में मतदान नहीं कर सकेंगे। आयोग ने इस आपत्ति को रद्द कर दिया। बिल्कुल ठीक किया।

इन दोनों क्षेत्रों में न केवल उम्मीदवारों के घरों से नकद करोड़ों रु. पकड़े गए बल्कि शराब की सैकड़ों बोतलें, चांदी के सिक्के और मतदाताओं को रिश्वत में बांटी जाने वाली कई चीज़ें भी पकड़ी गईं। ये तब पकड़ी गईं, जब पहली बार चुनाव स्थगित हो चुका था। याने उन उम्मीदवारों को न तो कोई शर्म-लिहाज थी और न ही कानून का डर! एक उम्मीदवार के अनुसार इन विधानसभा क्षेत्रों में लगभग 100 करोड़ रु. पहले ही बंट चुके थे।

ऐसे में आयोग को इतना अधिकार होना चाहिए कि इन रिश्वत बांटने वाले उम्मीदवारों को जीवन-भर के लिए वह चुनाव लड़ने से वंचित कर दे और उन्हें कम से कम दस-दस साल की सजा दे। जो भी पार्टी-कार्यकर्त्ता रिश्वत देते पकड़े जाएं, उन्हें भी दो-दो साल की सजा अवश्य दी जाए। रिश्वत लेने वाले मतदाताओं के खिलाफ भी कुछ न कुछ कानूनी कार्रवाई जरुरी है।

हमारे लोकतंत्र की जड़ें खोखली करने का काम यह चुनाव भ्रष्टाचार ही करता है। यहीं से सारे भ्रष्टाचारों की शुरुआत होती है। अरबों रु. का काला धन यहीं सबसे ज्यादा काम आता है। नेताओं को जो धन्ना-सेठ चुनाव में पैसा देते हैं, वे उनसे ब्याज समेत वसूलते हैं। नेताओं की देखा देखी अफसर भी हाथ साफ करते हैं। सारी व्यवस्था में फैलते-फैलते ये रोगाणु कैंसर बन जाते हैं। चुनाव आयोग ने इसकी जो सजा दी है, वह सराहनीय है लेकिन वह बहुत कम है।

लेखक:- वेद प्रताप वैदिक