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Tuesday, October 13, 2026

नियमों को ताक पर रखकर बनाया डायरेक्टर

करनाल [ TNN ] देश को कृषि और पशुपालन के क्षेत्र में नई सौगातें दे रहा आई.सी.ए.आर. का एक बड़ा मामला आर.टी.आर्ई. के माध्यम से मिली जानकारी के बाद सामने आया है। जिसके बाद यहां पर बड़े संस्थानों में होने वाली नियुक्तियों और एक्सटैंशन की प्रक्रिया पर सवालिया निशान खड़े हो गए हैं। आई.सी.ए.आर. ने नियमों को ताक पर रखकर डा. ए.के. श्रीवास्तव को एन.डी.आर.आई. जैसे प्रतिष्ठित संस्थान का  डायरेक्टर बना दिया। इतना ही नही बाद में उन्हें 5 साल का एक्सटैंशन और दे दिया। जब यह मामला सामने आया तो आई.सी.ए.आर. के बड़े अधिकारियों के हाथ-पांव फूल गए हैं। इस मामले में सबसे ज्यादा सवाल आई.सी.ए.आर. के महानिदेशक डा. एस. अयप्पन पर उठ रहे हैं। इस खुलासे के बाद यह भी साफ हुआ है कि किस तरह से प्रतिभाशाली और योग्य वैज्ञानिकों के साथ आई.सी.ए.आर. में खिलवाड़ किया जा रहा है।

करनाल के एन.डी.आर.आई. में उस वैज्ञानिक को  डायरेक्टर बना दिया गया, जिस पर शेर-ए-कश्मीर विश्वविद्यालय जम्मू में रहते हुए कई गड़बड़ी के आरोप लगे। यहां तक कि न तो नियुक्ति में और न ही एक्सटैंशन में सी.बी.सी. ओर विजिलैंस की क्लीयिरैंस रिर्पोट ली गई। आर.टी.आई. कार्यकत्र्ता ने अब तक जो जानकारियां ली। आमतौर पर नियम है कि  डायरेक्टर जैसे पदों पर नियुक्ति से पहले आवेदक के बारे में विजिलैंस की क्लीरियैंस जरूरी है। यह फोरमैट में साफ तौर पर लिखा हुआ है। जो आरोप लगे हैं। उसकी बानगी कुछ इस प्रकार हैं कि 21 जनवरी 2011 को आई.सी.ए.आर. के मुख्य विजिलैंस अधिकारी राजेश रंजन ने शेर-ए-कश्मीर यूनिवर्सिटी जम्मू के कुलपति बी.मिश्रा को पत्र लिखा।

इसमें ए.के. श्रीवास्तव के बारे में लिखा गया है कि इनके खिलाफ धारा-120 बी, 468, 471, आर.पी.सी. तथा 5 (डी) सैक्शन 5 के बाद (2) जे.एंड के पी.सी.एक्ट, एस.वी.टी. 2006, एफ.आई.आर. नंबर 19/2009 मिली है। इसके बाबत कई शिकायतें उन्हें मिली हैं। इनमें से एक शिकायत प्रधानमंत्री कार्यालय से भी शामिल है। इसमें बताया गया है कि जम्मू-कश्मीर सरकार ने मुकद्दमा चलाने के लिए डा. श्रीवास्तव तत्कालीन डी.आर.आई. कम पी.जी.एस. शेर-ए-कश्मीर यूनिवर्सिटी जम्मू, वर्तमान में एन.डी.आर.आई. के डायरैक्टर हैं। उन्होंने इन धाराओं के तहत अपराध किया है। इसमें उन्होंनें उनसे सूचित करने को कहा कि आपके पास कोई सरकारी आदेश है, जिसमें यह लिखा है कि डाक्टर श्रीवास्तव को इस मामले से बाहर कर दिया जाए या नही। इस आदेश की तत्काल कापी उनके पास भेजी जाए। उसके बाद 28 जनवरी 2011 को जम्मू-कश्मीर विजिलैंस विंग ने यूनिवर्सिटी को एक पत्र भेजा। जिसमें उनसे निवेदन किया कि वह इस घोटाले का रिकार्ड जो 20 फाईलों में हैं। उसको उन्हें दें। जिससे कि न्यायालय में आरोपियों के खिलाफ चालान प्रस्तुत किया जा सके।

7 जनवरी 2011 को शेर-ए-कश्मीर यूनिवर्सिटी के कुलपति डा. बी.मिश्रा ने जम्मू-कश्मीर सरकार के मुख्य सचिव को पत्र लिखा कि हमने उस अनियमितताओं और घोटालों की जांच से इन अधिकारियों को बाहर कर दिया है। विभागीय जांच इनके खिलाफ की जा रही है। मैने इनके खिलाफ मुकद्दमा नही चलाया है। उसके बावजूद भी उन्होंने इस पत्र के अंतिम कालम जी में साफ तौर पर लिखा कि इन तथ्यों को नकारा नही जा सकता। इन्होंने भर्ती करने में अनियमितताएं बरती हैं। इनको पूर्णतय आरोप से मुक्त नही किया जा सकता। हम यदि विभागीय जांच करवाएंं तो कुछ तथ्य इनके खिलाफ मिल सकते हैं। हम बाद में विजिलैंस को सूचित कर देंगे। इसके बाद 13 मई 2011 को शेर-ए-कश्मीर यूनिवर्सिटी के वी.सी. बी. मिश्रा को फिर से आई.सी.ए.आर. के मुख्य विजिलैंस अधिकारी राजेश रंजन ने पत्र लिखा। जिसमें उनसे जवाब मांगा गया। इसमें उन्होंने कहा कि आपने पहले लिखा है कि यह मामला काफी गंभीर हैं और आपने इसकी जांच को प्रोत्साहित भी किया था। 3 मई 2013 को आर.टी.आई. मांगने पर 26 अप्रैल 2013 को जानकारी मिली, जिसमें एक पत्राचार डीन जी.ए.डी.वी.ए.एस.यू. लुधियाना और राज्य सूचना अधिकारी के बीच हुआ था।

जिसके अनुसार यह कहा गया कि डाक्टर श्रीवास्तव ने एन.डी.आर.आई. के  डायरेक्टर तथा जम्मू कश्मीर में शेर-ए-कश्मीर यूनिवर्सिटी में आवेदन करते समय प्रोपर चैनल नही बरता। उनके यहां से कोई आवेदन फोरवर्ड नही हुआ। 15 मई 2013 को एक जवाब फिर मिला। जिसमें डीन जी.ए.डी.बी.ए.एस.यू. लुधियाना के हवाले से जानकारी मिली। इसमें कहा गया कि डाक्टर श्रीवास्तव ने एक्सट्रा ऑर्डनरी लीव ली। उन्होनें फिर से यह भी कहा कि प्रोपर चैनल आवेदन नही किया गया। लेकिन बाद में यह सब दबा दिया गया। उसके बाद गंभीरता की परतें उस समय खुल गई। जब उन्हें एक्सटैंशन भी दे दिया गया। जो लाईन में थे। उनका भविष्य खत्म हो गया। उसके बाद 17 मई 2010 को एक ओर जानकारी मिली। जिसके अनुसार कहा गया कि आई.सी.ए.आर. ने एक कमेटी की नियुक्ति की थी। जिसको एन.डी.आर.आई. में डायरैक्टर के रूप में डा. ए.के. श्रीवास्वत के कार्यकाल को आंकलन के लिए नियुक्त किया गया था। उस कमेटी ने जो जवाब दिया, उसके अनुसार प्रश्र नंबर-3 जिसमें पूछा गया कि क्या आवेदक की योग्यता को जांचने के लिए कोई स्कोर कार्ड रखा जाता है। इस पर कमेटी ने नकारात्मक जवाब दिया। प्रश्र नंबर-4 में पूछा गया कि क्या निर्णय लेते समय कानूनी सलाह ली गई।

उस पर भी नकारात्मक जवाब मिला। उसके बाद आश्चर्य तो तब हुआ जब कमेटी ने तपाक से जवाब दे दिया कि कमेटी बनाने में विजिलैंस या सी.बी.सी. की कलीरियंस भी नही ली गई। इसके साथ ही गर्वनिंग बॉडी के अधिकारियों की क्लीरियंस भी ली गई या फिर नही। इस पर भी जवाब मिला नही। यहां उल्लेखनीय है कि डा. ए.के. श्रीवास्तव जम्मू-कश्मीर की मीडिया की सुर्खियों में जब आए तब उन पर नियुक्तियों में अनियमितताएं बरतनें तथा खरीद फरोख्त में कानून का उल्लंघन करने के आरोप लगे। हालांकि यह मामला ऑडिट रिर्पोट में भी सामने आ गया। इन सब के बावजूद भी इस सब को दबा दिया गया।

क्या कहते हैं कृषि मंत्री :- कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह से जब बातचीत की गई तो उन्होंने कहा कि यह गंभीर मामला है और इसकी जांच करवाई जाएगी। जो भी अधिकारी इसमें दोषी पाए जाऐंगे। उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

क्या कहते हैं महानिदेशक :- आई.सी.ए.आर. के महानिदेशक तथा डी.ए.आर.ई. के सचिव डा. एस. अयप्पन से जब इस मामले में बातचीत के दौरान उनसे पूछा गया कि डा. ए.के.श्रीवास्तव करनाल एन.डी.आर.आई. के निदेशक कैसे लगे और उन्हे एक्सटैंशन कैसे मिला। तब वह बोले कि यह मामला विजिलैंस देखती हैं। जब उन्हें बताया गया कि सूचना अधिकार अधिनियम के तहत आपने जवाब दिया है कि आपकी कोई विजिलैंस कमेटी ही नही है। तब विजिलैंस क्लीयर हुआ कैसे बताया जाए। इस बात पर वह बगले झांकने लगे ओर बोले कि मैं इस समय मीटिंग में हूं और इस मामले को देखता हूँ ।

रिपोर्ट :- अनिल लाम्बा

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